{
  "chapter": 1,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "1.1",
      "translation": "धर्म के क्षेत्र कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया, हे संजय?",
      "explanation": "अंधे राजा धृतराष्ट्र गीता का आरंभ अपने मंत्री संजय से यह पूछकर करते हैं कि कुरुक्षेत्र में क्या हुआ; संजय दूर से ही युद्ध देख सकते हैं। \"मेरे पुत्र\" (मामकाः) से उनका अर्थ कौरवों से है, और पाण्डव उनके भतीजे हैं। \"धर्मक्षेत्र\" यानी उचित आचरण और कर्तव्य का क्षेत्र; कुछ परंपराएँ इसे शाब्दिक पवित्र स्थल मानती हैं, तो कुछ इसे इस संकेत की तरह पढ़ती हैं कि यह युद्ध एक नैतिक संघर्ष है।"
    },
    {
      "id": "1.2",
      "translation": "तब राजा दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को व्यूह में सजी देखा और अपने आचार्य के पास जाकर उनसे यह बात कही।",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि कुरुक्षेत्र में क्या हुआ। वे बताते हैं कि धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन ने पाण्डवों की सेना को व्यूह में सजी देखा और अपने आचार्य (गुरु) द्रोण के पास जाकर बोलने लगा। इससे अगले श्लोकों में दोनों सेनाओं के बारे में उसके आकलन की भूमिका बनती है।"
    },
    {
      "id": "1.3",
      "translation": "हे आचार्य, पाण्डु के पुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए, जिसकी व्यूह-रचना आपके ही बुद्धिमान शिष्य, द्रुपद के पुत्र ने की है।",
      "explanation": "संजय बता रहे हैं कि युद्ध से ठीक पहले कौरव राजा दुर्योधन अपने आचार्य द्रोण से क्या कहता है। वह पाण्डवों की सेना दिखाता है, जिसका व्यूह द्रुपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने रचा है, जो स्वयं द्रोण का ही शिष्य रह चुका है। \"आपके शिष्य\" शब्द को प्रायः हल्के व्यंग्य की तरह पढ़ा जाता है, क्योंकि शत्रु-सेना का नेतृत्व द्रोण के ही सिखाए हुए व्यक्ति के हाथ में है।"
    },
    {
      "id": "1.4",
      "translation": "इस सेना में शूरवीर और महान धनुर्धर हैं, जो युद्ध में भीम और अर्जुन के समान हैं: युयुधान, विराट और महारथी द्रुपद…",
      "explanation": "संजय दुर्योधन के वे शब्द सुना रहे हैं जो वह अपने गुरु द्रोणाचार्य से कह रहा है। वह पाण्डवों की सेना के योद्धाओं के नाम गिनाना शुरू करता है, ताकि विरोधी पक्ष की शक्ति दिखा सके। \"महारथी\" (महारथ) उस श्रेष्ठ योद्धा को कहते थे जो अकेले अनेक योद्धाओं से लड़ सके। यह सूची अगले श्लोक में भी जारी रहती है।"
    },
    {
      "id": "1.5",
      "translation": "धृष्टकेतु, चेकितान और पराक्रमी काशिराज, पुरुजित्, कुन्तिभोज तथा मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य…",
      "explanation": "संजय बता रहे हैं कि दुर्योधन अपने आचार्य द्रोण के सामने पांडवों की सेना के प्रमुख वीरों के नाम गिना रहा है। इस श्लोक में वह पिछले श्लोक की सूची को आगे बढ़ाते हुए और योद्धाओं के नाम लेता है। यहाँ 'नरपुंगव' का अर्थ है 'पुरुषों में बैल', यानी श्रेष्ठ पुरुष। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।"
    },
    {
      "id": "1.6",
      "translation": "पराक्रमी युधामन्यु, बलशाली उत्तमौजा, सुभद्रा का पुत्र और द्रौपदी के पुत्र, ये सभी निश्चय ही महारथी हैं।",
      "explanation": "संजय बता रहे हैं कि दुर्योधन अपने आचार्य द्रोण से पांडव सेना के योद्धाओं के नाम गिना रहा है। इस श्लोक में यह सूची पूरी होती है। इसमें सुभद्रा के पुत्र अभिमन्यु (सौभद्र) और द्रौपदी के पाँच पुत्र भी हैं। महारथी (महारथ) उस श्रेष्ठ योद्धा को कहते हैं जिसके पास युद्ध में बहुत बल और कौशल होता है।"
    },
    {
      "id": "1.7",
      "translation": "हे द्विजश्रेष्ठ, अब हमारे पक्ष के जो विशिष्ट वीर हैं, उन्हें भी जान लीजिए। वे मेरी सेना के नायक हैं। आपकी जानकारी के लिए मैं उनके नाम आपको बताता हूँ।",
      "explanation": "संजय यहाँ दुर्योधन के शब्द सुना रहे हैं, जो अपने गुरु द्रोणाचार्य से बात कर रहा है। पांडव पक्ष के योद्धाओं को गिनाने के बाद अब वह अपने पक्ष के नायकों का परिचय देने लगता है। \"द्विजोत्तम\" (द्विज, यानी दो बार जन्मा) द्रोण जैसे विद्वान ब्राह्मण के लिए आदरसूचक संबोधन है। कुछ पाठक अपने वीरों की इस गिनती में दुर्योधन का आत्मविश्वास देखते हैं, तो कुछ इसे भीतर की बेचैनी को ढकने का प्रयास मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "1.8",
      "translation": "आप स्वयं, भीष्म, कर्ण और रणविजयी कृपाचार्य; अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त के पुत्र भी…",
      "explanation": "संजय के वर्णन में दुर्योधन अपने आचार्य द्रोण से बात कर रहा है। पांडवों के प्रमुख योद्धाओं को गिनाने के बाद वह अपने पक्ष के प्रमुख वीरों के नाम बताता है, और शुरुआत स्वयं द्रोण से करता है। यह सूची अगले श्लोक में भी चलती है, जहाँ वह कहता है कि और भी अनेक वीर उसके लिए प्राण देने को तैयार हैं।"
    },
    {
      "id": "1.9",
      "translation": "और भी बहुत से शूरवीर हैं, जो मेरे लिए अपने प्राण तक त्यागने को तैयार हैं। वे अनेक प्रकार के शस्त्रों से लैस हैं और सभी युद्ध-कला में निपुण हैं।",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि उनके पुत्र दुर्योधन ने आचार्य द्रोण से क्या कहा। पिछले श्लोक में प्रमुख सेनापतियों के नाम गिनाने के बाद दुर्योधन अब अपने पक्ष के अन्य अनेक योद्धाओं का उल्लेख करता है। वह जताता है कि वे उसके लिए प्राण देने को तैयार हैं और साथ ही शस्त्रों से सज्जित तथा युद्ध में प्रशिक्षित भी हैं।"
    },
    {
      "id": "1.10",
      "translation": "भीष्म द्वारा रक्षित हमारी वह सेना अपर्याप्त है, जबकि भीम द्वारा रक्षित इन पांडवों की यह सेना पर्याप्त है।",
      "explanation": "संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि दुर्योधन ने अपनी और पांडवों की सेना की तुलना कैसे की। यहाँ \"अपर्याप्त\" का सीधा अर्थ है कि सेना कम या अपूर्ण है, और \"पर्याप्त\" का अर्थ है कि वह काफ़ी है। कुछ व्याख्याकार इन शब्दों को उलटे अर्थ में लेते हैं: कौरव सेना असीम और पांडव सेना सीमित। वहाँ यह दुर्योधन का आत्मविश्वास माना जाता है, जबकि पहले अर्थ में उसकी चिंता झलकती है।"
    },
    {
      "id": "1.11",
      "translation": "इसलिए सभी मोर्चों के प्रवेश-मार्गों पर, अपने-अपने निर्धारित स्थान पर डटे रहकर, आप सब लोग केवल भीष्म की ही सब ओर से रक्षा करें।",
      "explanation": "संजय धृतराष्ट्र को सुना रहे हैं कि दुर्योधन अपने सेनापतियों से क्या कह रहा है। अपनी सेना की शक्ति का बखान करने के बाद वह आदेश देता है कि सब अपने-अपने नियत स्थान पर, हर प्रवेश-मार्ग (अयन) पर डटे रहें और प्रधान सेनापति भीष्म की रक्षा करें। कुछ व्याख्याकार इसे समझदारी भरी रणनीति मानते हैं, तो कुछ इसमें दुर्योधन की भीष्म पर निर्भरता की चिंता देखते हैं।"
    },
    {
      "id": "1.12",
      "translation": "दुर्योधन को हर्षित करने के लिए कुरुओं के वृद्ध, प्रतापी पितामह भीष्म ने सिंह के समान ऊँचे स्वर में गर्जना करके अपना शंख बजाया।",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का हाल सुना रहे हैं। दुर्योधन के भीष्म की रक्षा करने की बात कहने पर कुरुवंश के वृद्ध भीष्म सिंह की तरह गरजकर शंख बजाते हैं। इससे दुर्योधन का उत्साह बढ़ता है और युद्ध के आरंभ का संकेत मिलता है।"
    },
    {
      "id": "1.13",
      "translation": "तब शंख, भेरी, पणव, आनक और गोमुख जैसे वाद्य अचानक एक साथ बज उठे, और वह शोर घनघोर हो उठा।",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का दृश्य सुना रहे हैं। कौरवों के सबसे वयोवृद्ध भीष्म के शंख बजाते ही पूरी सेना शंख, नगाड़े, ढोल और सींग जैसे युद्ध-वाद्य एक साथ बजा देती है। इससे कानों को चीर देने वाला भारी शोर उठता है, जो युद्ध के आरंभ का संकेत है।"
    },
    {
      "id": "1.14",
      "translation": "तब सफ़ेद घोड़ों से जुते हुए विशाल रथ पर खड़े माधव (कृष्ण) और पाण्डुपुत्र (अर्जुन) ने अपने दिव्य शंख बजाए।",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वर्णन सुना रहे हैं। कौरव पक्ष के शंख-नगाड़ों के शोर के बाद अब पाण्डव पक्ष की बारी है। माधव (कृष्ण, मधुवंश के) और पाण्डुपुत्र अर्जुन अपने दिव्य शंख बजाकर उत्तर देते हैं, जो युद्ध के आरंभ का संकेत है।"
    },
    {
      "id": "1.15",
      "translation": "हृषीकेश ने पाञ्चजन्य बजाया और धनंजय ने देवदत्त; भयंकर कर्म करने वाले वृकोदर ने अपना विशाल शंख पौण्ड्र बजाया।",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि युद्ध के आरंभ में पांडव पक्ष ने शंखनाद से कैसे उत्तर दिया। हृषीकेश कृष्ण हैं (इन्द्रियों के स्वामी), धनंजय अर्जुन हैं, और वृकोदर भीम हैं, जो अपने भयंकर पराक्रम के लिए प्रसिद्ध हैं। हर योद्धा के शंख का अपना नाम है, और ये नाद युद्ध की तैयारी की घोषणा हैं।"
    },
    {
      "id": "1.16",
      "translation": "कुन्ती के पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया, और नकुल तथा सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक बजाए।",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि पाण्डव पक्ष ने शंख बजाकर युद्ध की घोषणा कैसे की। यहाँ वे सबसे बड़े पाण्डव युधिष्ठिर और जुड़वाँ भाइयों नकुल व सहदेव के शंखों के नाम बताते हैं। हर योद्धा के शंख का अपना नाम है, जो सेना की तत्परता और गर्व को दर्शाता है।"
    },
    {
      "id": "1.17",
      "translation": "महान धनुर्धर काशिराज, महारथी शिखंडी, धृष्टद्युम्न, विराट और कभी न हारने वाले सात्यकि भी…",
      "explanation": "संजय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वर्णन सुना रहे हैं। वे पांडव पक्ष के उन वीरों के नाम गिना रहे हैं जिन्होंने शंख बजाए। महारथी वह योद्धा है जो अकेले अनेक रथियों से लड़ सकता है। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।"
    },
    {
      "id": "1.18",
      "translation": "हे पृथ्वी के स्वामी! द्रुपद, द्रौपदी के पुत्रों और महाबाहु सुभद्रापुत्र (अभिमन्यु) ने सब ओर से अलग-अलग अपने-अपने शंख बजाए।",
      "explanation": "संजय राजा धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के युद्ध के आरंभ में पांडव पक्ष द्वारा शंख बजाए जाने का वर्णन जारी रखते हैं। यहाँ वे द्रुपद, द्रौपदी के पाँच पुत्रों और महाबाहु अभिमन्यु (सुभद्रा के पुत्र) का नाम लेते हैं। वे धृतराष्ट्र को \"पृथ्वीपति\" कहकर संबोधित करते हैं, और पिछले श्लोक से चला आ रहा वाक्य यहाँ पूरा होता है।"
    },
    {
      "id": "1.19",
      "translation": "वह भयंकर गूँज आकाश और पृथ्वी को गुँजाती हुई धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को चीर गई।",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र के युद्ध के आरंभ का वर्णन सुना रहे हैं। पांडव पक्ष के शंखों की ध्वनि आकाश और पृथ्वी में गूँज उठी और कौरवों (धृतराष्ट्र के पुत्रों) के हृदय दहल गए। इस श्लोक में केवल ध्वनि के प्रभाव का वर्णन है, इसलिए परंपराओं में अर्थ का कोई खास भेद नहीं है।"
    },
    {
      "id": "1.20",
      "translation": "तब धृतराष्ट्र के पुत्रों को युद्ध के लिए डटे हुए देखकर, जब शस्त्र चलने का समय आ ही गया था, कपिध्वज पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपना धनुष उठाया…",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को कुरुक्षेत्र का दृश्य सुना रहे हैं। शंखनाद हो चुका है और सेनाएँ युद्ध शुरू करने को तैयार हैं। अर्जुन को 'कपिध्वज' कहा गया है, क्योंकि उनके ध्वज पर हनुमान का चिह्न था; वे धनुष उठाते हैं और कृष्ण से कुछ कहने वाले हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।"
    },
    {
      "id": "1.21",
      "translation": "हे पृथ्वी के स्वामी (धृतराष्ट्र), तब उसने हृषीकेश से ये वचन कहे। अर्जुन ने कहा: \"हे अच्युत, मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए, …",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वर्णन सुना रहे हैं और उन्हें \"महीपति\" (पृथ्वी के स्वामी) कहकर पुकारते हैं। शस्त्र चलने ही वाले हैं और अर्जुन ने धनुष उठा रखा है। वे अपने सारथी कृष्ण से, जिन्हें यहाँ हृषीकेश (इंद्रियों के स्वामी) और अच्युत (जो कभी च्युत न हों) कहा गया है, रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहते हैं। उनकी बात अगले श्लोक में आगे चलती है।"
    },
    {
      "id": "1.22",
      "translation": "…ताकि मैं युद्ध की इच्छा से डटे हुए इन लोगों को देख सकूँ, और जान सकूँ कि इस युद्ध के उद्यम में मुझे किन-किन से लड़ना है।",
      "explanation": "अर्जुन अपने सारथी कृष्ण से पिछले श्लोक में शुरू हुई अपनी बात जारी रखता है। वह रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलने को कहता है, ताकि देख सके कि उसे किन योद्धाओं से लड़ना है। यही दृश्य आगे उसके मन की उलझन का कारण बनता है, जब वह अपने ही संबंधियों को वहाँ देखता है।"
    },
    {
      "id": "1.23",
      "translation": "जो लोग दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र-पुत्र को युद्ध में प्रसन्न करने की इच्छा से यहाँ इकट्ठे हुए हैं, लड़ने को तैयार उन लोगों को मैं देखना चाहता हूँ।",
      "explanation": "अर्जुन अपने सारथी कृष्ण से रथ को दोनों सेनाओं के बीच रोकने को कहता है, ताकि वह देख सके कि उसे किन-किनसे लड़ना है (पिछला श्लोक)। यहाँ वह उन योद्धाओं को देखना चाहता है जो धृतराष्ट्र के \"दुर्बुद्धि\" पुत्र दुर्योधन का पक्ष लेने आए हैं। अभी उसके शब्दों में दृढ़ता है; उसका संशय आगे के श्लोकों में प्रकट होता है।"
    },
    {
      "id": "1.24",
      "translation": "हे भारत (धृतराष्ट्र)! गुडाकेश (अर्जुन) के इस प्रकार कहने पर हृषीकेश (कृष्ण) ने उस उत्तम रथ को दोनों सेनाओं के बीच में लाकर खड़ा कर दिया…",
      "explanation": "संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का हाल सुना रहे हैं और उन्हें \"भारत\" (भरतवंशी) कहकर पुकारते हैं। गुडाकेश (\"निद्रा को जीतने वाला\" या \"घने केशों वाला\") अर्जुन ने कृष्ण से, जो यहाँ हृषीकेश (\"इन्द्रियों के स्वामी\") हैं, रथ को ऐसी जगह ले चलने को कहा था जहाँ से वे योद्धाओं को देख सकें। कृष्ण रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर देते हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में आगे चलता है।"
    },
    {
      "id": "1.25",
      "translation": "भीष्म, द्रोण और सभी राजाओं के सामने उन्होंने कहा, \"हे पार्थ, यहाँ इकट्ठे हुए इन कुरुवंशियों को देखो।\"",
      "explanation": "संजय धृतराष्ट्र को आगे का वृत्तान्त सुना रहे हैं। सारथी बने कृष्ण ने रथ को दोनों सेनाओं के बीच, भीष्म, द्रोण और अन्य राजाओं के सामने रोक दिया है। वे अर्जुन (पार्थ, यानी पृथा या कुन्ती के पुत्र) से कहते हैं कि सामने जुटे कुरुवंशियों को देखो; यहाँ \"कुरु\" में दोनों पक्षों के लोग आते हैं। इसी दृश्य से आगे अर्जुन को अपने ही सगे-संबंधियों को देखकर शोक होता है।"
    },
    {
      "id": "1.26",
      "translation": "वहाँ पार्थ ने अपने सामने खड़े पिताओं, पितामहों, आचार्यों, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों और मित्रों को भी देखा…",
      "explanation": "संजय धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि कृष्ण के \"इन कुरुओं को देखो\" कहने पर अर्जुन (पार्थ, यानी पृथा-कुंती के पुत्र) ने युद्धभूमि में क्या देखा। उसे सामने अपने ही बड़े-बुज़ुर्ग, गुरु और परिजन दिखाई देते हैं, और यहीं से उसके मन की उलझन शुरू होती है। यहाँ \"पितॄन्\" का अर्थ पिता की पीढ़ी के बड़े लोग, जैसे चाचा-ताऊ, भी लिया जा सकता है। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।"
    },
    {
      "id": "1.27",
      "translation": "उसने दोनों ही सेनाओं में ससुरों और हितैषी मित्रों को भी खड़े देखा। उन सब बंधुजनों को वहाँ डटे हुए देखकर वह कुंतीपुत्र…",
      "explanation": "संजय राजा धृतराष्ट्र को बता रहे हैं कि अर्जुन (कौन्तेय, यानी कुंती का पुत्र) ने युद्धभूमि में चारों ओर देखा तो उसे क्या दिखा। पिछले श्लोक से चल रही सूची यहाँ पूरी होती है: ससुर और हितैषी मित्र (सुहृद) भी दोनों सेनाओं में खड़े हैं, और ये सब उसके अपने बंधु हैं। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ यह दृश्य उसके मन में करुणा और शोक भर देता है।"
    },
    {
      "id": "1.28",
      "translation": "गहरी करुणा से भरा हुआ और विषाद में डूबता हुआ वह यह बोला। अर्जुन ने कहा: हे कृष्ण, युद्ध की इच्छा से यहाँ डटे हुए अपने इन स्वजनों को देखकर…",
      "explanation": "संजय धृतराष्ट्र को सुनाते हुए बताते हैं कि दोनों सेनाओं में अपने संबंधियों को देखकर अर्जुन की दशा कैसी हो गई। पहले आधे भाग में संजय का वर्णन है: अर्जुन करुणा (कृपा) से भर उठा है और विषाद में डूब रहा है। दूसरे भाग से अर्जुन के अपने शब्द कृष्ण से शुरू होते हैं, और वाक्य अगले श्लोक में चलता है। इस करुणा को लेकर परंपराओं में मतभेद है: कुछ इसे अर्जुन की भलमनसाहत मानते हैं, तो कुछ इसे भ्रमित करने वाला मोह, जो उसके धर्म (कर्तव्य) की समझ को ढक देता है।"
    },
    {
      "id": "1.29",
      "translation": "मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा मुँह सूख रहा है। मेरे शरीर में कंपकंपी हो रही है और रोंगटे खड़े हो रहे हैं।",
      "explanation": "अर्जुन अपने ही स्वजनों को युद्ध के लिए सामने खड़ा देखकर बताता है कि करुणा (कृपा) और शोक उसके शरीर पर कैसा असर डाल रहे हैं। इस श्लोक में पहले लक्षण गिनाए गए हैं: अंगों का ढीला पड़ना, मुँह सूखना, कंपकंपी और रोमांच। युद्ध के बारे में अपनी शंकाएँ कहने से पहले ही उसका संकल्प डगमगाता दिखता है।"
    },
    {
      "id": "1.30",
      "translation": "मेरे हाथ से गांडीव धनुष फिसल रहा है और मेरी सारी त्वचा जल रही है। मैं स्थिर खड़ा भी नहीं रह पा रहा हूँ, और मेरा मन मानो चक्कर खा रहा है।",
      "explanation": "अर्जुन कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में कृष्ण से बोल रहे हैं और बता रहे हैं कि दोनों सेनाओं में अपने स्वजनों को देखकर वे कितने विचलित हो गए हैं। गांडीव उनका प्रसिद्ध धनुष है, और उसका हाथ से छूटना उनके टूटे हुए धैर्य को दिखाता है। जलती त्वचा, डगमगाती देह और घूमता मन उन्हीं शारीरिक लक्षणों की सूची को आगे बढ़ाते हैं जो पिछले श्लोक में शुरू हुई थी।"
    },
    {
      "id": "1.31",
      "translation": "हे केशव, मुझे तो लक्षण भी उलटे ही दिखाई दे रहे हैं। और युद्ध में अपने ही स्वजनों को मारकर मुझे कोई कल्याण होता नहीं दिखता।",
      "explanation": "अर्जुन युद्धभूमि में अपने संबंधियों को देखकर व्याकुल है और कृष्ण (केशव) से कहता है कि उसे अशुभ लक्षण (निमित्त) दिख रहे हैं। साथ ही अपने ही लोगों को मारने में उसे कोई स्थायी कल्याण (श्रेयस्) नहीं दिखता। यहाँ से वह केवल अपनी घबराहट नहीं, बल्कि युद्ध के उद्देश्य पर ही प्रश्न उठाने लगता है।"
    },
    {
      "id": "1.32",
      "translation": "हे कृष्ण, मुझे न विजय चाहिए, न राज्य और न सुख। हे गोविन्द, हमें राज्य से क्या लेना, भोगों से क्या, या फिर जीवन से भी क्या?",
      "explanation": "युद्धभूमि में अपने स्वजनों को सामने खड़ा देखकर अर्जुन संदेह से भर जाता है और कहता है कि युद्ध के सामान्य फल अब उसके लिए अर्थहीन हो गए हैं। वह कृष्ण को गोविन्द (गायों के रक्षक, या इन्द्रियों के ज्ञाता) कहकर पूछता है कि अपने ही लोगों को मारकर मिली विजय, राज्य, सुख या जीवन का भी क्या मूल्य रह जाएगा।"
    },
    {
      "id": "1.33",
      "translation": "जिन लोगों के लिए हमने राज्य, भोग और सुख चाहे थे, वे ही अपने प्राण और धन का त्याग करके युद्ध में यहाँ खड़े हैं।",
      "explanation": "अर्जुन मोह और संशय में डूबा हुआ कृष्ण से कह रहा है कि उसे युद्ध का कोई अर्थ नहीं दिखता। राज्य और सुख अपने प्रियजनों के लिए ही चाहे जाते हैं, पर वही लोग यहाँ मरने को तैयार खड़े हैं। 'प्राण और धन त्यागकर' का आशय है कि उन्होंने युद्ध में सब कुछ दाँव पर लगा दिया है।"
    },
    {
      "id": "1.34",
      "translation": "आचार्य, पिता, पुत्र, और वैसे ही पितामह, मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा अन्य सम्बन्धी भी…",
      "explanation": "अर्जुन युद्धभूमि में कृष्ण से बोल रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने कहा कि जिनके लिए राज्य और सुख चाहे जाते हैं, वही प्राण और धन का मोह छोड़कर युद्ध में खड़े हैं; यहाँ वे गिनाते हैं कि वे कौन हैं: गुरु, बड़े-बुज़ुर्ग, पुत्र और रिश्तेदार। बात अगले श्लोक में पूरी होती है, जहाँ वे कहते हैं कि वे इन्हें मारना नहीं चाहते।"
    },
    {
      "id": "1.35",
      "translation": "हे मधुसूदन! ये लोग मुझे मार भी डालें, तब भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता — तीनों लोकों के राज्य के लिए भी नहीं, फिर इस पृथ्वी के लिए तो कहना ही क्या?",
      "explanation": "अपने गुरुजनों और संबंधियों को विरोधी पक्ष में देखकर शोक से भरे अर्जुन कृष्ण (मधुसूदन, मधु दैत्य के संहारक) से कहते हैं कि वे इन्हें मारना नहीं चाहते। चाहे ये लोग अर्जुन को ही मार डालें, और चाहे बदले में तीनों लोकों का राज्य मिलता हो, तब भी नहीं; फिर इस पृथ्वी के राज्य की तो बात ही क्या। यहीं से कर्तव्य (धर्म) और पारिवारिक संबंधों के बीच उनका नैतिक संकट शुरू होता है।"
    },
    {
      "id": "1.36",
      "translation": "हे जनार्दन, धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन-सी प्रसन्नता मिलेगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें केवल पाप ही लगेगा।",
      "explanation": "शोक से व्याकुल अर्जुन कृष्ण से कहता है कि धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने से कोई सुख नहीं मिलेगा। वह उन्हें आततायी कहता है, जिन्हें धर्मशास्त्र वध के योग्य मानते हैं, फिर भी उसे डर है कि उन्हें मारने से पाप लगेगा। कुछ टीकाकार इसे शास्त्र-नियम और ऊँचे कर्तव्य के बीच तौल मानते हैं, तो कुछ इसे भावनाओं से धुँधली हुई सोच मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "1.37",
      "translation": "इसलिए धृतराष्ट्र के पुत्रों को, जो हमारे अपने बंधु हैं, मारना हमारे लिए उचित नहीं है। हे माधव, अपने ही स्वजनों को मारकर हम सुखी कैसे होंगे?",
      "explanation": "युद्धभूमि में शोक से व्याकुल अर्जुन पिछले श्लोक की बात से निष्कर्ष निकालता है: आततायियों को मारने से भी पाप लगेगा, इसलिए उसे यह नहीं करना चाहिए। उसका तर्क है कि ये शत्रु उसके अपने बंधु हैं, और उन्हें मारकर सुख नहीं मिल सकता। माधव कृष्ण का एक नाम है, जिनसे वह बात कर रहा है।"
    },
    {
      "id": "1.38",
      "translation": "यद्यपि लोभ से विवेक खो बैठे ये लोग कुल के नाश से होने वाले दोष को और मित्रों से द्रोह करने के पाप को नहीं देखते…",
      "explanation": "अर्जुन कृष्ण को समझा रहे हैं कि वे अपने ही संबंधियों से युद्ध क्यों नहीं कर पा रहे। वे कहते हैं कि कौरव लोभ से इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें कुल के विनाश (कुलक्षय) की हानि और मित्रों से विश्वासघात का पाप दिखाई नहीं देता। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है, जहाँ अर्जुन कहते हैं कि जो यह दोष देख रहे हैं, उन्हें इस पाप से पीछे हट जाना चाहिए।"
    },
    {
      "id": "1.39",
      "translation": "परन्तु हे जनार्दन, जब हम कुल के नाश से उत्पन्न होने वाले दोष को स्पष्ट देख रहे हैं, तो हमें इस पाप से पीछे हटने की समझ क्यों न होनी चाहिए?",
      "explanation": "अर्जुन अपना तर्क आगे बढ़ा रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने कहा कि लोभ से भ्रमित कौरव कुल-नाश और मित्र-द्रोह का दोष नहीं देखते। यहाँ वे कहते हैं कि हम तो यह दोष देख रहे हैं, इसलिए हमें इस पाप से बचना चाहिए। जनार्दन श्रीकृष्ण का एक नाम है।"
    },
    {
      "id": "1.40",
      "translation": "कुल के नष्ट होने पर उसके सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, और धर्म के नष्ट हो जाने पर अधर्म सारे कुल को घेर लेता है।",
      "explanation": "अर्जुन कृष्ण को समझा रहा है कि वह अपने ही संबंधियों से युद्ध करने से क्यों पीछे हट रहा है। उसका तर्क है कि कुल के नष्ट होने पर परिवार की परंपरागत मर्यादाएँ और कर्तव्य (कुलधर्म) भी लुप्त हो जाते हैं। तब बचे हुए कुल पर अधर्म, यानी धर्म के विपरीत अव्यवस्था, हावी हो जाता है।"
    },
    {
      "id": "1.41",
      "translation": "हे कृष्ण, अधर्म के बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं; और हे वृष्णिवंशी, स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।",
      "explanation": "अर्जुन युद्ध न करने के पक्ष में अपना तर्क आगे बढ़ाता है। उसके अनुसार जब कुल की परंपराएँ टूटती हैं और अधर्म (धर्म यानी उचित आचरण का उलटा) फैलता है, तो कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं, और इससे वर्णसंकर, यानी वर्णों का मिश्रण, पैदा होता है। यह तर्क उस समय की सामाजिक धारणाओं को दिखाता है। इसे कितना शाब्दिक लिया जाए, इस पर पाठकों और टीकाकारों में मतभेद है, पर यहाँ यह अर्जुन का अपना कथन है, कृष्ण का नहीं।"
    },
    {
      "id": "1.42",
      "translation": "यह मिश्रण कुल का नाश करने वालों के लिए और स्वयं कुल के लिए भी नरक का ही कारण बनता है। पिंड और जल देने की क्रियाएँ बंद हो जाने से इनके पितर भी गिर जाते हैं।",
      "explanation": "अर्जुन अपने ही संबंधियों से युद्ध न करने के पक्ष में तर्क दे रहे हैं। वे कहते हैं कि वर्णसंकर (वर्णों का मिश्रण) कुल का नाश करने वालों और पूरे कुल, दोनों को नरक में ले जाता है। पितरों के लिए पिंड और जल की जो क्रियाएँ की जाती हैं, वे बंद हो जाती हैं, और अर्जुन के अनुसार इससे पितर अपने लोक से नीचे गिर जाते हैं।"
    },
    {
      "id": "1.43",
      "translation": "कुल का नाश करने वालों के इन दोषों से, जो वर्णसंकर को जन्म देते हैं, जाति और कुल के सनातन धर्म नष्ट हो जाते हैं।",
      "explanation": "अर्जुन अपने ही संबंधियों से युद्ध न करने के पक्ष में तर्क दे रहे हैं। उनके अनुसार कुल के नाश से वर्णसंकर (वर्णों का मिश्रण) होता है, और इससे जाति-धर्म तथा कुल-धर्म, यानी समाज और परिवार के पुराने कर्तव्य, नष्ट हो जाते हैं। यह सामाजिक व्यवस्था के बारे में अर्जुन की अपनी समझ है। परंपराएँ इस पर भिन्न मत रखती हैं कि यह कृष्ण का भी मत है या नहीं, क्योंकि आगे कृष्ण अर्जुन के तर्क को चुनौती देते हैं।"
    },
    {
      "id": "1.44",
      "translation": "हे जनार्दन! जिन मनुष्यों के कुलधर्म नष्ट हो जाते हैं, उन्हें अनिश्चित काल तक नरक में रहना पड़ता है — ऐसा हमने सुना है।",
      "explanation": "अर्जुन युद्ध के विरुद्ध अपना तर्क आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि जब कुल के कर्तव्य और परंपराएँ (कुलधर्म) नष्ट हो जाती हैं, तो लोगों को नरक में लंबे समय तक रहना पड़ता है। यह बात उन्होंने परंपरा से सुनी है (अनुशुश्रुम)। 'अनियतम्' का अर्थ प्रायः 'अनिश्चित, लंबे समय तक' लिया जाता है, पर कुछ लोग इसे 'निश्चित रूप से' समझते हैं।"
    },
    {
      "id": "1.45",
      "translation": "हाय! कितने आश्चर्य और दुख की बात है कि हम एक भारी पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं, क्योंकि राज्य के सुख के लोभ में हम अपने ही स्वजनों को मारने को तैयार हो गए हैं।",
      "explanation": "युद्धभूमि में शोक से घिरा अर्जुन पिछले श्लोक में कुलधर्म के नष्ट होने के दुष्परिणाम बता चुका है। यहाँ वह दोष स्वयं पर और अपने पक्ष पर लेता है और कहता है कि राज्य-सुख के लोभ में हम बड़े पाप की ओर बढ़ रहे हैं। इन शब्दों में शस्त्र छोड़ने से पहले की उसकी नैतिक पीड़ा झलकती है।"
    },
    {
      "id": "1.46",
      "translation": "यदि शस्त्र हाथ में लिए धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में मुझे मार डालें, जबकि मैं न तो प्रतिकार करूँ और न ही मेरे हाथ में कोई शस्त्र हो, तो वह मेरे लिए कहीं अधिक कल्याणकारी होगा।",
      "explanation": "अपने ही स्वजनों से युद्ध करने की सोचकर शोक में डूबे अर्जुन पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हैं, जहाँ उन्होंने इस हिंसा को भारी पाप कहा था। अब वे कहते हैं कि निहत्थे और बिना प्रतिकार के धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) के हाथों मारा जाना उन्हें मारने से बेहतर होगा। यही उनके मन की उलझन है, जिसके कारण अगले श्लोक में वे धनुष रख देते हैं।"
    },
    {
      "id": "1.47",
      "translation": "यह कहकर अर्जुन रणभूमि में बाण सहित धनुष त्यागकर रथ के आसन पर बैठ गया; उसका मन शोक से अत्यंत व्याकुल था।",
      "explanation": "संजय राजा धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का हाल सुना रहे हैं। पिछले श्लोक में अर्जुन ने कहा था कि निहत्थे रहने पर यदि धृतराष्ट्र के पुत्र उसे मार भी दें, तो वही उसके लिए अधिक कल्याणकारी होगा। यह कहकर वह धनुष-बाण छोड़कर रथ में बैठ जाता है। इसी के साथ पहला अध्याय पूरा होता है, और अर्जुन का यह विषाद आगे कृष्ण के उपदेश की भूमिका बनता है।"
    }
  ]
}
