{
  "chapter": 15,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "15.1",
      "translation": "जिसकी जड़ें ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं, उस अश्वत्थ वृक्ष को अविनाशी कहा गया है; वेद के मंत्र उसके पत्ते हैं। जो इस वृक्ष को जान लेता है, वही वेद को जानने वाला है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूपक से नई शिक्षा शुरू करते हैं, जो जन्म-मृत्यु के चक्र वाले संसार का प्रतीक है। इसकी जड़ें ऊपर, परम स्रोत में हैं और शाखाएँ नीचे फैली हैं। वेद के मंत्र इसके पत्ते हैं, यानी वे इसी वृक्ष का पोषण करते हैं और इसी से जुड़े हैं। 'अव्यय' (अविनाशी) को टीकाकार इस अर्थ में लेते हैं कि संसार का यह प्रवाह अनादि काल से चलता आ रहा है, पर आगे के श्लोकों के अनुसार इसे वैराग्य से काटा जा सकता है, इसलिए यह स्थायित्व केवल प्रवाह का है।"
    },
    {
      "id": "15.2",
      "translation": "इसकी शाखाएँ नीचे और ऊपर फैली हुई हैं, जो गुणों से पोषित होकर बढ़ी हैं, और विषय उनकी कोंपलें हैं। मनुष्यलोक में नीचे की ओर भी इसकी जड़ें फैली हुई हैं, जो कर्म के बंधन में बाँधने वाली हैं।",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक के अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष का रूपक आगे बढ़ाते हैं, जो संसार के चक्र का प्रतीक है। इसकी शाखाएँ प्रकृति के तीन गुणों से बढ़ती हैं और इंद्रियों के विषय इसकी नई कोंपलें हैं, जो इंद्रियों को लुभाते हैं। मनुष्यलोक में फैली इसकी जड़ें कर्म के संस्कारों और फलों से जीव को बाँधती हैं। प्रतीकों के ब्योरे पर टीकाकारों में भेद है, पर सब इस वृक्ष को उलझाने वाले संसार के रूप में पढ़ते हैं।"
    },
    {
      "id": "15.3",
      "translation": "यहाँ इसका रूप वैसा दिखाई नहीं देता, न इसका अंत, न आदि और न ही इसका आधार। इस गहरी जड़ों वाले अश्वत्थ वृक्ष को अनासक्ति के दृढ़ शस्त्र से काटकर…",
      "explanation": "कृष्ण जन्म-मरण के चक्र (संसार) को उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूप में समझाना जारी रखते हैं। हम स्वयं इसके भीतर उलझे हैं, इसलिए इसका पूरा रूप, आदि, अंत या आधार सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देता। इसे काटने का उपाय वे अनासक्ति (असङ्ग) रूपी दृढ़ शस्त्र बताते हैं, और वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है। अद्वैत परंपरा इस वृक्ष को अंततः मायिक मानती है, जबकि भक्ति-परंपराएँ इसे वास्तविक पर बाँधने वाला मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "15.4",
      "translation": "तब उस पद की खोज करनी चाहिए, जहाँ पहुँचकर लोग फिर लौटकर नहीं आते, यह भाव रखते हुए कि “मैं उसी आदि पुरुष की शरण लेता हूँ, जिससे यह पुरातन प्रवृत्ति-धारा फैली है।”",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी संसार को गहरी जड़ों वाले वृक्ष के रूप में बताया, जिसे अनासक्ति (असङ्ग) के दृढ़ शस्त्र से काटना है। इसके बाद साधक को उस परम पद की खोज करनी है, जहाँ से पुनर्जन्म में वापसी नहीं होती। “मैं शरण लेता हूँ” (प्रपद्ये) को कुछ टीकाकार साधक का अपना संकल्प मानते हैं, तो कुछ उस आदि पुरुष के प्रति समर्पण का उपदेश, जिससे सृष्टि की यह पुरानी प्रवृत्ति चली है।"
    },
    {
      "id": "15.5",
      "translation": "जो मान और मोह से मुक्त हैं, जिन्होंने आसक्ति के दोष को जीत लिया है, जो सदा आत्मा में स्थित रहते हैं, जिनकी कामनाएँ निवृत्त हो चुकी हैं और जो सुख-दुःख नामक द्वंद्वों से छूट गए हैं, ऐसे विवेकी लोग उस अविनाशी पद को प्राप्त करते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा कि जहाँ से लौटना नहीं होता, उस पद की खोज करनी चाहिए; अब वे बताते हैं कि उसे कौन पाता है। ऐसे लोग अभिमान, मोह, आसक्ति (सङ्ग) और कामना से मुक्त होते हैं और सुख-दुःख के खिंचाव से छूटकर अध्यात्म, यानी आत्मा में, स्थिर रहते हैं। उस अविनाशी पद को अद्वैत परंपरा आत्मा का अपना स्वरूप मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ उसे कृष्ण का परम धाम मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "15.6",
      "translation": "वहाँ न सूर्य प्रकाश पहुँचाता है, न चंद्रमा, न अग्नि। जहाँ पहुँचकर लोग लौटकर नहीं आते, वही मेरा परम धाम है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने उन विवेकी लोगों की बात की जो अविनाशी पद पाते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि उस पद को, यानी उनके अपने परम धाम को, सूर्य, चंद्रमा या अग्नि प्रकाशित नहीं करते; टीकाकार इसे स्वयं-प्रकाश मानते हैं। वहाँ पहुँचने पर जन्म-मरण का चक्र (संसार) समाप्त हो जाता है। परंपराएँ इस धाम को कहीं कृष्ण का निजी लोक और कहीं निराकार आत्मा या ब्रह्म मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "15.7",
      "translation": "जीवों के इस संसार में जीव बना हुआ सनातन अंश मेरा ही है। वह प्रकृति में स्थित पाँच इन्द्रियों और छठे मन को अपनी ओर खींचता है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी अपने परम धाम का वर्णन किया, जहाँ से कोई लौटता नहीं। अब वे बताते हैं कि देहधारी जीव वास्तव में कौन है: वह उनका ही सनातन अंश है, जो प्रकृति में स्थित मन और पाँच इंद्रियों को अपनी ओर खींचता है। 'अंश' शब्द पर परंपराओं में भेद है: विशिष्टाद्वैत और द्वैत जैसी भक्ति-परंपराएँ इसे ईश्वर का वास्तविक, नित्य अंश मानती हैं, जबकि अद्वैत इसे एक ही आत्मा के अनेक रूपों में दिखने का लाक्षणिक कथन मानता है।"
    },
    {
      "id": "15.8",
      "translation": "देह का स्वामी जीव जब कोई शरीर पाता है और जब उसे छोड़कर जाता है, तब इन (मन और इंद्रियों) को साथ लिए चलता है, जैसे हवा गंध को उसके स्थान से उठाकर अपने साथ ले जाती है।",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हैं: जीव उनका सनातन अंश है और मन तथा पाँच इंद्रियों को अपनी ओर खींचता है। यहाँ वे कहते हैं कि जीव जब एक शरीर छोड़कर दूसरा पाता है, तब इन्हें साथ ले जाता है, जैसे हवा किसी स्थान से गंध उठाकर साथ ले जाती है। यहाँ 'ईश्वर' शब्द देह और इंद्रियों के स्वामी जीव के लिए है, परमेश्वर के लिए नहीं; इस पर टीकाकार प्रायः एकमत हैं।"
    },
    {
      "id": "15.9",
      "translation": "कान, आँख, त्वचा, जीभ और नाक तथा मन का आश्रय लेकर यह जीव विषयों का भोग करता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि देहधारी जीव इंद्रियों को साथ लेकर एक शरीर से दूसरे में जाता है, जैसे हवा गंध को ले जाती है। यहाँ वे कहते हैं कि वही पाँच इंद्रियों और मन के सहारे शब्द, रूप, रस जैसे विषयों का अनुभव करता है। व्याख्याकारों में भिन्नता है: कुछ आत्मा को केवल साक्षी मानकर भोग को आभासी समझते हैं, तो कुछ इंद्रियों के माध्यम से उसे वास्तविक भोक्ता मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "15.10",
      "translation": "जब वह शरीर छोड़कर जाता है, जब वह शरीर में टिका रहता है, या जब वह गुणों से युक्त होकर भोग करता है, तब मूढ़ लोग उसे नहीं देख पाते; ज्ञान की आँख वाले ही उसे देखते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ देहधारी जीव की बात कर रहे हैं, जो इंद्रियों और मन का सहारा लेकर संसार का अनुभव करता है। चाहे वह देह से निकल रहा हो, देह में स्थित हो, या गुणों (प्रकृति के तीन घटक: सत्त्व, रजस् और तमस्) से जुड़कर भोग रहा हो, मोह में पड़े लोग उसे नहीं पहचान पाते। केवल जिनकी ज्ञान-दृष्टि (ज्ञानचक्षु) खुल चुकी है, वे उसे देखते हैं। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि यह केवल व्यक्तिगत आत्मा है या परमात्मा से अभिन्न आत्मा, पर सभी मानते हैं कि यह दर्शन ज्ञान से होता है, इंद्रियों से नहीं।"
    },
    {
      "id": "15.11",
      "translation": "प्रयत्न करने वाले योगी इस आत्मा को अपने भीतर स्थित देखते हैं। पर जिन्होंने अपने अंतःकरण को शुद्ध नहीं किया और जिनमें समझ नहीं है, वे प्रयत्न करके भी इसे नहीं देख पाते।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि केवल ज्ञान-चक्षु वाले ही आत्मा को देह छोड़ते, रहते या भोगते समय देख पाते हैं। यहाँ वे जोड़ते हैं कि केवल प्रयत्न काफ़ी नहीं है; योगी (साधना में अनुशासित व्यक्ति) का अंतःकरण भी शुद्ध और तैयार होना चाहिए, क्योंकि अकृतात्मा का अर्थ है जिसका मन संस्कारित नहीं हुआ। आचार्य इस शुद्धि में अलग-अलग बातों पर बल देते हैं, जैसे नैतिक अनुशासन, भक्ति या ज्ञान, पर इसकी आवश्यकता सभी मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "15.12",
      "translation": "सूर्य में जो तेज है, जो पूरे जगत को प्रकाशित करता है, और जो तेज चन्द्रमा में है तथा जो अग्नि में है — उस तेज को तुम मेरा ही जानो।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि साधना करने वाले योगी आत्मा को देख पाते हैं, पर अशुद्ध मन वाले नहीं। अब वे सबके देखने योग्य उदाहरण देते हैं: सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि का प्रकाश। वे कहते हैं कि यह तेज उन्हीं का है, यानी संसार की सारी रोशनी का स्रोत परमात्मा है। व्याख्याकारों में मतभेद है कि इसे इन वस्तुओं की आंतरिक शक्ति के रूप में पढ़ा जाए या उनसे परे रहकर उन्हें धारण करने वाले ईश्वर के रूप में।"
    },
    {
      "id": "15.13",
      "translation": "मैं पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सब प्राणियों को धारण करता हूँ, और रस-स्वरूप सोम बनकर सभी औषधियों (वनस्पतियों) का पोषण करता हूँ।",
      "explanation": "सूर्य, चंद्र और अग्नि के तेज की बात के बाद कृष्ण यहाँ बताते हैं कि उनकी शक्ति सारे जगत में व्याप्त है। वे पृथ्वी में प्रवेश कर प्राणियों को धारण करते हैं और रस-स्वरूप सोम (चंद्रमा, जिसे जीवनदायी रस का स्रोत माना गया है) बनकर वनस्पतियों को पुष्ट करते हैं। परंपराएँ इसे अलग ढंग से समझती हैं: कुछ इसे प्रकृति में ईश्वर की वास्तविक उपस्थिति मानती हैं, तो कुछ इसे ईश्वर के सबका आधार होने का काव्यात्मक संकेत।"
    },
    {
      "id": "15.14",
      "translation": "मैं वैश्वानर, यानी जठराग्नि, बनकर प्राणियों के शरीर में रहता हूँ। प्राण और अपान वायु के साथ मिलकर मैं चारों प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में पृथ्वी और चंद्रमा द्वारा पोषण की बात कहने के बाद कृष्ण यहाँ बताते हैं कि वे हर प्राणी के भीतर पाचन की अग्नि (वैश्वानर) के रूप में स्थित हैं। प्राण और अपान (भीतर आने और बाहर जाने वाली श्वास) के साथ मिलकर वह चार प्रकार के भोजन को पचाती है, जिन्हें परंपरा में चबाकर खाया जाने वाला, चूसा जाने वाला, चाटा जाने वाला और पिया जाने वाला माना गया है। भाव यह है कि शरीर की सामान्य जीवन-क्रियाओं में भी ईश्वर की शक्ति काम करती है।"
    },
    {
      "id": "15.15",
      "translation": "मैं सब प्राणियों के हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका लोप होता है। सभी वेदों से जानने योग्य मैं ही हूँ; वेदांत का रचयिता भी मैं हूँ और वेदों का जानने वाला भी मैं ही हूँ।",
      "explanation": "पिछले श्लोकों में सूर्य, अग्नि और पाचन में अपनी उपस्थिति बताने के बाद कृष्ण अब भीतरी जीवन की बात करते हैं। स्मृति, ज्ञान और उनका लोप (अपोहन) हृदय में स्थित उन्हीं से होता है, और वे ही वेदों के लक्ष्य, वेदांत के कर्ता और वेदों के सच्चे ज्ञाता हैं। \"वेदान्तकृत्\" का अर्थ कुछ व्याख्याकार \"वेदांत के रचयिता\" करते हैं, तो कुछ \"वेदों के अंतिम तात्पर्य को प्रकट करने वाला\"।"
    },
    {
      "id": "15.16",
      "translation": "इस लोक में दो प्रकार के पुरुष हैं – क्षर और अक्षर। सभी प्राणी क्षर हैं, और जो कूटस्थ, यानी सदा एकरस और अचल भाव से स्थित है, वह अक्षर कहलाता है।",
      "explanation": "श्रीकृष्ण परम सत्ता को समझाने से पहले यहाँ \"पुरुष\" के दो रूप बताते हैं। क्षर वह है जो बदलता और नष्ट होता है, यानी सब प्राणी; अक्षर वह है जो निहाई की तरह कूटस्थ, अपरिवर्तनशील रहता है। अक्षर के अर्थ पर व्याख्याकार भिन्न हैं: कुछ इसे मुक्त आत्मा या चेतन तत्त्व मानते हैं, कुछ प्रकृति का अपरिवर्तनशील मूल या माया का बीज।"
    },
    {
      "id": "15.17",
      "translation": "किन्तु इनसे भिन्न एक उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा गया है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका भरण-पोषण करता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने दो पुरुष बताए: क्षर, यानी नाशवान सभी प्राणी, और अक्षर, यानी कूटस्थ अपरिवर्तनशील तत्त्व। अब वे इन दोनों से परे तीसरे, सर्वोच्च पुरुष परमात्मा की बात करते हैं। वही अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों में व्याप्त होकर उन्हें धारण करता है। परमात्मा और जीवात्मा के संबंध को अद्वैत परंपराएँ अंततः एक मानती हैं, जबकि द्वैत और विशिष्टाद्वैत जैसी भक्ति-परंपराएँ उनमें वास्तविक भेद देखती हैं।"
    },
    {
      "id": "15.18",
      "translation": "क्योंकि मैं नश्वर से परे हूँ और अविनाशी से भी श्रेष्ठ हूँ, इसलिए लोक में और वेद में मैं पुरुषोत्तम के नाम से प्रसिद्ध हूँ।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ दो प्रकार के पुरुष की चर्चा पूरी करते हैं: क्षर (नश्वर, यानी परिवर्तनशील सभी प्राणी) और अक्षर (अविनाशी, जिसे प्रायः कूटस्थ आत्मा या मुक्त अवस्था माना जाता है)। वे कहते हैं कि वे दोनों से परे हैं, इसीलिए पुरुषोत्तम कहलाते हैं। व्याख्याओं में भेद है: अद्वैत परंपरा इसे अक्षर से भी परे एक परम सत्ता के रूप में देखती है, जबकि वैष्णव भक्ति परंपराएँ इसे जीव और प्रकृति दोनों से श्रेष्ठ साकार भगवान मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "15.19",
      "translation": "हे भारत! जो मोह से मुक्त होकर मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम के रूप में जानता है, वह सब कुछ जानने वाला है और पूरे भाव से मेरी भक्ति करता है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा कि वे क्षर और अक्षर दोनों से परे हैं, इसलिए पुरुषोत्तम कहलाते हैं। यहाँ वे कहते हैं कि जो इसे बिना भ्रम (असम्मूढ) के जान लेता है, वह सर्वज्ञ है और पूर्ण भाव (सर्वभाव) से उनकी भक्ति करता है। वैष्णव परंपराएँ इस जानने को मुख्यतः भक्तिपूर्ण ज्ञान मानती हैं, जबकि अद्वैत परंपरा इसे एक परम सत्य का साक्षात्कार मानती है।"
    },
    {
      "id": "15.20",
      "translation": "हे निष्पाप, इस प्रकार यह अत्यंत गोपनीय शास्त्र मैंने तुमसे कहा। हे भारत, इसे समझ लेने पर मनुष्य ज्ञानी हो जाता है और उसके सारे करने योग्य कर्म पूर्ण हो जाते हैं।",
      "explanation": "अध्याय के अंत में कृष्ण अर्जुन को \"अनघ\" (निष्पाप) और \"भारत\" कहकर संबोधित करते हैं। वे पुरुषोत्तम के बारे में अभी दिए गए उपदेश को सबसे गोपनीय शास्त्र (गुह्यतम शास्त्र) कहते हैं। उनके अनुसार इसे सचमुच समझ लेने से व्यक्ति बुद्धिमान और कृतकृत्य, यानी जीवन का उद्देश्य पूरा कर चुका, हो जाता है। टीकाकारों में मतभेद है कि \"यह शास्त्र\" केवल इसी अध्याय को दर्शाता है या पूरी गीता को।"
    }
  ]
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