{
  "chapter": 16,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "16.1",
      "translation": "निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, इंद्रियों का संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता…",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ \"दैवी संपदा\" यानी मुक्ति की ओर झुके लोगों के भीतरी गुण गिनाना शुरू करते हैं, जिनके विपरीत वे आगे आसुरी प्रवृत्तियाँ बताएँगे। यह सूची अगले श्लोक में भी चलती है। यज्ञ का अर्थ पवित्र अर्पण या निःस्वार्थ कर्तव्य है, स्वाध्याय का अर्थ शास्त्र और स्वयं का अध्ययन, और तप का अर्थ अनुशासित साधना। \"ज्ञानयोग\" को टीकाकार अलग-अलग पढ़ते हैं: कोई इसे ज्ञान का मार्ग मानता है, तो कोई आत्मज्ञान में स्थिर निष्ठा।"
    },
    {
      "id": "16.2",
      "translation": "अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शांति, चुगली न करना, प्राणियों के प्रति दया, लालच से मुक्ति, कोमलता, लज्जा, चंचलता का अभाव…",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक में शुरू की गई दैवी संपदा (दैवी सम्पत्) वाले लोगों के गुणों की सूची आगे बढ़ाते हैं। इसमें अहिंसा, सत्य, त्याग, दया और कोमलता (मार्दव) जैसे गुण आते हैं। 'त्याग' को कुछ परंपराएँ कर्मफल का त्याग मानती हैं, तो कुछ धन-संपत्ति या सांसारिक बंधनों का त्याग।"
    },
    {
      "id": "16.3",
      "translation": "तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, किसी से द्रोह न रखना और अत्यधिक अभिमान का न होना — हे भारत, ये गुण उसमें होते हैं जो दैवी सम्पदा को लेकर जन्मा है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन से दैवी सम्पदा (दैवी सम्पद्) के गुणों की सूची आगे बढ़ाते हैं, जो शुभ की ओर झुके स्वभाव वाले व्यक्ति के लक्षण हैं। यहाँ वे तेज, क्षमा, धैर्य (धृति), पवित्रता (शौच), द्रोह का अभाव (अद्रोह) और अति-अभिमान का अभाव गिनाते हैं। \"अभिजात\" का अर्थ पूर्वजन्मों से मिला जन्मजात स्वभाव है या ऐसी प्रवृत्ति जिसे कोई भी विकसित कर सकता है, इस पर टीकाकारों में मतभेद है।"
    },
    {
      "id": "16.4",
      "translation": "पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी—हे पार्थ, ये उसके लक्षण हैं जो आसुरी संपदा को लेकर जन्मा है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में दैवी गुण गिनाने के बाद कृष्ण यहाँ उसके विपरीत आसुरी संपदा के लक्षण बताते हैं: दम्भ (पाखंड), दर्प (घमंड), अभिमान, क्रोध, पारुष्य (कठोरता) और अज्ञान, यानी क्या सही है और क्या सच है, इसकी सही समझ का अभाव। यह श्लोक प्रवृत्तियों का वर्णन है; अगला श्लोक बताता है कि दोनों संपदाएँ किस ओर ले जाती हैं।"
    },
    {
      "id": "16.5",
      "translation": "दैवी संपदा को मोक्ष की ओर ले जाने वाली और आसुरी संपदा को बंधन में डालने वाली माना गया है। हे पाण्डव, शोक मत करो—तुम दैवी संपदा को लेकर जन्मे हो।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने दम्भ, अभिमान और क्रोध जैसे आसुरी गुण गिनाए थे। यहाँ वे बताते हैं कि दैवी गुण मोक्ष की ओर ले जाते हैं और आसुरी गुण बंधन की ओर। वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वह शोक न करे, क्योंकि वह दैवी संपदा के साथ जन्मा है।"
    },
    {
      "id": "16.6",
      "translation": "इस लोक में प्राणियों की सृष्टि दो प्रकार की है: दैवी और आसुरी। दैवी का विस्तार से वर्णन हो चुका है। अब हे पार्थ, आसुरी के बारे में मुझसे सुनो।",
      "explanation": "कृष्ण अभी अर्जुन को आश्वस्त कर चुके हैं कि वह दैवी गुणों के साथ जन्मा है। यहाँ वे भेद बताते हैं: मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ मोटे तौर पर दो प्रकार की हैं, दैवी और आसुरी, यानी एक सद्गुणों की ओर झुकी और दूसरी उनसे दूर। दैवी गुण पहले बताए जा चुके हैं, इसलिए अब वे आसुरी स्वभाव का वर्णन करने वाले हैं। परंपराएँ आमतौर पर इन्हें स्वभाव की दो प्रवृत्तियाँ मानती हैं, लोगों की दो स्थायी जातियाँ नहीं।"
    },
    {
      "id": "16.7",
      "translation": "आसुरी स्वभाव के लोग यह नहीं जानते कि किस काम में प्रवृत्त होना चाहिए और किससे दूर रहना चाहिए। उनमें न पवित्रता होती है, न सदाचार, और न सत्य ही पाया जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण ने पिछले श्लोक में आसुरी प्रकृति का वर्णन करने को कहा था, यहाँ से वे आरंभ करते हैं। ऐसे लोग नहीं जान पाते कि क्या करना उचित है (प्रवृत्ति) और किससे दूर रहना उचित है (निवृत्ति), और उनमें पवित्रता (शौच), सदाचार (आचार) और सत्य का अभाव होता है। परंपराएँ सामान्यतः मानती हैं कि यह किसी जन्मजात वर्ग का नहीं, बल्कि कामना से चलने वाली मनोवृत्ति का वर्णन है।"
    },
    {
      "id": "16.8",
      "translation": "वे कहते हैं कि यह जगत असत्य है, बिना किसी आधार का है और इसका कोई ईश्वर नहीं है; यह केवल आपसी संयोग से उत्पन्न हुआ है, और कामना के सिवा इसका कोई कारण नहीं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक से आगे, कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों की सोच बता रहे हैं। उनके अनुसार जगत में कोई सत्य, नैतिक आधार या ईश्वर नहीं है, और सब कुछ केवल काम, यानी भोग की इच्छा, से चलता है। \"अपरस्परसम्भूतम्\" का अर्थ शंकराचार्य आदि स्त्री-पुरुष के आपसी संयोग से जन्म मानते हैं, जबकि कुछ व्याख्याकार इसे \"बिना किसी क्रमबद्ध कारण-परंपरा के, संयोग से उत्पन्न\" समझते हैं।"
    },
    {
      "id": "16.9",
      "translation": "इसी दृष्टि को थामे हुए, अपने स्वरूप को खो चुके, मंद बुद्धि वाले, क्रूर कर्म करने वाले ये लोग जगत के शत्रु बनकर उसके विनाश के लिए उठ खड़े होते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन कर रहे हैं। पिछले श्लोक की दृष्टि यह है कि जगत असत्य है, उसका कोई नैतिक आधार या ईश्वर नहीं, और वह केवल कामना से चलता है। कृष्ण कहते हैं कि इस सोच से वे आध्यात्मिक रूप से भ्रष्ट (नष्टात्मा) और अल्पबुद्धि हो जाते हैं, और उनके क्रूर कर्म संसार का अहित करते हैं।"
    },
    {
      "id": "16.10",
      "translation": "कभी न भरने वाली कामना का सहारा लेकर, पाखंड, मान और मद से भरे हुए वे लोग मोह के कारण गलत धारणाओं को पकड़ लेते हैं और अशुद्ध संकल्प लेकर कर्म में प्रवृत्त होते हैं।",
      "explanation": "इस अध्याय में कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन कर रहे हैं। यहाँ वे कहते हैं कि ऐसे लोग कभी तृप्त न होने वाली कामना (काम), पाखंड (दम्भ), मान और मद से चलते हैं। मोहवश वे गलत धारणाएँ अपना लेते हैं और अशुद्ध व्रतों (अशुचिव्रताः), यानी स्वार्थपूर्ण नियमों के अनुसार चलते हैं।"
    },
    {
      "id": "16.11",
      "translation": "मृत्यु के क्षण तक चलने वाली अनगिनत चिंताओं में डूबे हुए, वे कामनाओं की पूर्ति और भोग को ही सबसे बड़ा लक्ष्य मानते हैं और निश्चय कर लेते हैं कि \"बस यही सब कुछ है।\"",
      "explanation": "पिछले श्लोक की तरह श्रीकृष्ण यहाँ आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन कर रहे हैं, जो कभी न भरने वाली कामना से चलते हैं। उनकी चिंता मृत्यु या प्रलय तक समाप्त नहीं होती, और वे भोग (कामोपभोग) को ही जीवन का परम लक्ष्य मान लेते हैं। उन्हें दृढ़ विश्वास होता है कि इससे ऊँचा कुछ नहीं है।"
    },
    {
      "id": "16.12",
      "translation": "आशा के सैकड़ों बंधनों में जकड़े हुए, काम और क्रोध में ही रमे हुए वे लोग अपनी कामनाओं के भोग के लिए अन्याय के रास्ते से धन के ढेर जमा करने में लगे रहते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ आसुरी प्रवृत्ति वाले उन लोगों का वर्णन जारी रखते हैं, जो जीवन को केवल भोग मानते हैं। आशा को सैकड़ों फंदों के जाल जैसा बताया गया है, और काम तथा क्रोध उनके मुख्य प्रेरक हैं। भोग ही लक्ष्य होने से वे धर्म, यानी उचित आचरण, को छोड़कर अन्याय से धन बटोरते हैं।"
    },
    {
      "id": "16.13",
      "translation": "“यह आज मैंने पा लिया है। अब मैं इस मनोरथ को भी पूरा कर लूँगा। यह मेरे पास है, और यह धन भी फिर मुझे मिल जाएगा…”",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन कर रहे हैं, जिनका मन लोभ में डूबा रहता है। इस श्लोक में उनके मन की बातें हैं: जो पाया उसकी गिनती और आगे जो पाना है उसकी योजना। अगले श्लोक में यही अहंकार शत्रुओं और सत्ता की बात तक पहुँच जाता है।"
    },
    {
      "id": "16.14",
      "translation": "“उस शत्रु को मैंने मार डाला है, और दूसरों को भी मार डालूँगा। मैं स्वामी हूँ, मैं भोग करने वाला हूँ, मैं सफल हूँ, बलवान हूँ और सुखी हूँ…”",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ आसुरी स्वभाव वाले लोगों की सोच बता रहे हैं, जो लोभ और अहंकार से चलते हैं। वे शत्रुओं को मारने की डींग हाँकते हैं और स्वयं को स्वामी (ईश्वर), भोगी, सफल (सिद्ध), बलवान और सुखी मानते हैं। यह विचार अगले श्लोक में भी चलता है, जहाँ वे अपने धन और कुल का घमंड करते हैं।"
    },
    {
      "id": "16.15",
      "translation": "“मैं धनवान हूँ और ऊँचे कुल में जन्मा हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनंद मनाऊँगा।” इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित होकर सोचते हैं…",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ आसुरी प्रवृत्ति वाले अहंकारी लोगों का वर्णन आगे बढ़ा रहे हैं। उनके यज्ञ और दान भी अपनी हैसियत दिखाने के लिए होते हैं, सच्ची साधना के लिए नहीं। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जिसमें बताया गया है कि यह मोह उन्हें कहाँ ले जाता है।"
    },
    {
      "id": "16.16",
      "translation": "अनेक प्रकार के विचारों से भ्रमित, मोह के जाल में लिपटे हुए और कामनाओं के भोग में पूरी तरह डूबे हुए वे लोग अपवित्र नरक में गिरते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक की अहंकारभरी बातों के बाद आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन कर रहे हैं। उनका मन बिखरा और चंचल रहता है, वे मोह के जाल में फँसे रहते हैं और कामना तथा भोग में लगे रहते हैं। ऐसे लोग अपवित्र नरक में गिरते हैं; परंपराएँ इसे मृत्यु के बाद के दुःखमय लोक के रूप में भी समझती हैं और इसी जीवन की भीतरी पीड़ा की अवस्था के रूप में भी।"
    },
    {
      "id": "16.17",
      "translation": "अपने ही मुँह से अपनी बड़ाई करने वाले, अकड़ में रहने वाले, धन और मान के मद में चूर वे लोग दिखावे के साथ, शास्त्रविधि का पालन किए बिना, केवल नाम के यज्ञ करते हैं।",
      "explanation": "श्रीकृष्ण इस अध्याय में आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन जारी रखे हुए हैं। ऐसे लोग स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं और धन व प्रतिष्ठा के नशे में रहते हैं। उनके यज्ञ (हवन-पूजन जैसे अनुष्ठान) भी श्रद्धा से या उचित विधि से नहीं, बल्कि दिखावे (दम्भ) के लिए होते हैं, इसलिए वे केवल नाम के यज्ञ हैं।"
    },
    {
      "id": "16.18",
      "translation": "अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, दूसरों में दोष देखने वाले ये लोग अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझसे द्वेष करते हैं…",
      "explanation": "कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन जारी रखते हैं। ऐसे लोग अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के सहारे जीते हैं और हर बात में दोष खोजते हैं। 'मुझसे द्वेष' को कुछ टीकाकार सब शरीरों में बसे अंतर्यामी ईश्वर के प्रति तिरस्कार समझते हैं, तो कुछ इसमें कृष्ण के उपदेश और शास्त्र की अवज्ञा पर बल देते हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है, जहाँ बताया गया है कि ऐसे लोगों का क्या होता है।"
    },
    {
      "id": "16.19",
      "translation": "उन द्वेष करने वाले, क्रूर, अशुभ कर्म करने वाले और मनुष्यों में अधम लोगों को मैं संसार के चक्रों में बार-बार आसुरी योनियों में ही गिराता रहता हूँ।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि आसुरी स्वभाव के लोग अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का सहारा लेते हैं और अपने तथा दूसरों के शरीरों में बसे परमात्मा से द्वेष करते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि ऐसे लोग जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) में बार-बार आसुरी योनियों में ही जन्म लेते हैं, यानी उसी क्रूर और द्वेषपूर्ण प्रवृत्ति वाले जीवन में। टीकाकार इसे अलग-अलग ढंग से समझते हैं: कुछ इसे ईश्वर का सीधा निर्णय मानते हैं, तो कुछ इसे उनके अपने कर्मों का फल मानते हैं, जो ईश्वर के नियम से मिलता है।"
    },
    {
      "id": "16.20",
      "translation": "हे कुन्तीपुत्र! जन्म-जन्म में आसुरी योनि पाते हुए वे मूढ़ मुझे पाए बिना ही उससे भी नीची गति को चले जाते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन जारी रखते हैं। मोह (मूढ़ता) में डूबे वे बार-बार ऐसी ही योनियों में जन्म लेते हैं, कृष्ण तक कभी नहीं पहुँचते और अधम गति को प्राप्त होते हैं। परंपराओं में मतभेद है कि 'योनि' शाब्दिक जन्म है या भीतरी प्रवृत्तियाँ, और यह पतन कितना अंतिम है।"
    },
    {
      "id": "16.21",
      "translation": "नरक के ये तीन द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं: काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।",
      "explanation": "कृष्ण अभी-अभी आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों का वर्णन कर चुके हैं, जो बार-बार नीची योनियों में गिरते हैं। यहाँ वे उस पतन के तीन मूल कारण बताते हैं: काम (तीव्र इच्छा), क्रोध और लोभ। नरक को कुछ परंपराएँ मृत्यु के बाद का स्थान मानती हैं और कुछ इसी जीवन में दुख और अधोगति की अवस्था। इसी तरह \"आत्मा का नाश\" को कुछ लोग मनुष्य के आध्यात्मिक पतन के रूप में समझते हैं, तो कुछ उसके सच्चे कल्याण की हानि के रूप में, क्योंकि आत्मा स्वयं अविनाशी है।"
    },
    {
      "id": "16.22",
      "translation": "हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य अंधकार के इन तीनों द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण के मार्ग पर चलता है और उसी से परम गति को प्राप्त होता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने काम, क्रोध और लोभ को नरक के तीन द्वार बताकर इन्हें छोड़ने को कहा। यहाँ वे कहते हैं कि इन तीन तमस् (अंधकार) के द्वारों से मुक्त मनुष्य अपने सच्चे कल्याण (श्रेयस्) के अनुसार चलता है और परम गति पाता है। यह परम गति मोक्ष है या ईश्वर से मिलन, इस पर परंपराओं में भिन्न मत हैं, पर सब इसे सर्वोच्च लक्ष्य मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "16.23",
      "translation": "जो मनुष्य शास्त्र की विधि को छोड़कर अपनी इच्छा के वश में होकर चलता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख, और न परम गति।",
      "explanation": "कृष्ण दैवी और आसुरी स्वभाव की चर्चा समाप्त कर रहे हैं। काम, क्रोध और लोभ को विनाश के तीन द्वार बताने के बाद वे कहते हैं कि जो शास्त्र के मार्गदर्शन को छोड़कर मनमाने ढंग से (कामकार) चलता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सच्चा सुख और न परम लक्ष्य। 'शास्त्र' का अर्थ परंपराएँ अलग-अलग लेती हैं: कुछ वैदिक विधियों पर जोर देती हैं, कुछ व्यापक नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा पर।"
    },
    {
      "id": "16.24",
      "translation": "इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका निर्णय करने में शास्त्र ही तुम्हारे लिए प्रमाण है। शास्त्र के विधान में जो कहा गया है, उसे जानकर तुम्हें इस लोक में वही कर्म करना चाहिए।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि केवल इच्छा (काम) के अनुसार चलने वाले को न सिद्धि मिलती है, न सुख। उसी से निष्कर्ष निकालकर वे अर्जुन से कहते हैं कि उचित और अनुचित कर्म तय करने में शास्त्र को आधार बनाओ। 'शास्त्र' का अर्थ कुछ व्याख्याकार वैदिक विधियों और कर्तव्य-नियमों तक सीमित मानते हैं, जबकि अन्य इसे गीता की धर्म-शिक्षा या व्यापक नैतिक मार्गदर्शन के रूप में भी पढ़ते हैं।"
    }
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}
