{
  "chapter": 17,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "17.1",
      "translation": "हे कृष्ण, जो लोग शास्त्र की विधि को छोड़कर श्रद्धा के साथ यज्ञ-पूजा करते हैं, उनकी निष्ठा किस प्रकार की होती है? सत्त्व की, रजस की या तमस की?",
      "explanation": "यहाँ अर्जुन कृष्ण से प्रश्न कर रहे हैं। पिछले अध्याय में कृष्ण ने कहा था कि जो शास्त्र की विधि छोड़कर इच्छा के अनुसार चलता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती; इस पर अर्जुन पूछते हैं कि जिनमें श्रद्धा तो है, पर वे शास्त्र-विधि नहीं मानते, उनकी स्थिति क्या है। सत्त्व, रजस और तमस प्रकृति के तीन गुण हैं, यानी स्वभाव के तीन घटक: सत्त्व शुद्धता और प्रकाश का, रजस आवेग और क्रियाशीलता का, तमस जड़ता और अज्ञान का। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि “शास्त्रविधि छोड़ने” का अर्थ जानबूझकर उपेक्षा करना है या केवल शास्त्र का ज्ञान न होना।"
    },
    {
      "id": "17.2",
      "translation": "देहधारियों की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, जो उनके अपने स्वभाव से उत्पन्न होती है: सात्त्विक, राजसिक और तामसिक। अब उसके बारे में सुनो।",
      "explanation": "अर्जुन ने अभी पूछा है कि जो लोग शास्त्र की विधि छोड़कर श्रद्धा से पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। कृष्ण उत्तर की शुरुआत यह कहकर करते हैं कि श्रद्धा एक जैसी नहीं होती; वह व्यक्ति के जन्मजात स्वभाव से उपजती है और प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार तीन रूप लेती है: सत्त्व (निर्मलता), रजस् (आवेग) और तमस् (जड़ता)। यह श्लोक केवल वर्गीकरण की भूमिका है, जिसे आगे के श्लोकों में समझाया गया है।"
    },
    {
      "id": "17.3",
      "translation": "हे भारत! हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतःकरण के स्वरूप के अनुसार होती है। मनुष्य श्रद्धा से ही बना है; जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।",
      "explanation": "अर्जुन ने इस अध्याय के आरंभ में पूछा था कि शास्त्र-विधि छोड़कर श्रद्धा से पूजा करने वालों की निष्ठा कैसी होती है। उसी के उत्तर में कृष्ण बताते हैं कि श्रद्धा, यानी भीतर का विश्वास और झुकाव, हर व्यक्ति के अंतःकरण और स्वभाव के अनुसार ढलती है। इसलिए जैसी किसी की श्रद्धा है, वैसा ही उसका स्वरूप माना जाता है। यहाँ 'सत्त्व' को अधिकतर भाष्यकार मन या अंतःकरण के अर्थ में लेते हैं, जबकि कुछ इसे गुणों के संदर्भ में समझते हैं।"
    },
    {
      "id": "17.4",
      "translation": "सात्त्विक स्वभाव के लोग देवताओं की पूजा करते हैं, राजसिक लोग यक्षों और राक्षसों की, और अन्य तामसिक लोग मृत प्रेतों तथा भूतगणों की उपासना करते हैं।",
      "explanation": "अर्जुन ने पूछा था कि जो लोग शास्त्र-विधि छोड़कर श्रद्धा से पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। उसी के उत्तर में कृष्ण बताते हैं कि श्रद्धा व्यक्ति के प्रधान गुण के अनुसार होती है: सत्त्व, रजस् या तमस्, जो प्रकृति के तीन मूल गुण हैं। इसलिए कोई किसकी उपासना करता है, इससे उसके भीतर के स्वभाव का पता चलता है। यक्ष शक्तिशाली अलौकिक प्राणी हैं और राक्षस उग्र, प्रायः विरोधी प्राणी।"
    },
    {
      "id": "17.5",
      "translation": "जो लोग शास्त्रों में न बताई गई कठोर तपस्या करते हैं, जो दंभ और अहंकार से भरे हैं, और कामना तथा आसक्ति के बल से प्रेरित हैं…",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार लोगों की श्रद्धा कैसे अलग-अलग होती है। इस श्लोक में वे उन लोगों की बात करते हैं जो शास्त्र-विरुद्ध कठोर तप (तपस्या) करते हैं, और जिनके पीछे दिखावा (दम्भ), अहंकार, कामना और आसक्ति (राग) होती है। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ बताया गया है कि ऐसे लोग वास्तव में क्या कर रहे हैं।"
    },
    {
      "id": "17.6",
      "translation": "…वे नासमझ लोग शरीर में स्थित तत्वों के समूह को कष्ट देते हैं, और शरीर के भीतर रहने वाले मुझको भी; उन्हें तुम आसुरी निश्चय वाले जानो।",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक में बताए उन लोगों की बात आगे बढ़ाते हैं जो घमंड और कामना से प्रेरित होकर शास्त्र-विरुद्ध कठोर तप करते हैं। ऐसे लोग शरीर के तत्वों के समूह (भूतग्राम) को कष्ट देते हैं और शरीर के भीतर रहने वाले कृष्ण को भी; कृष्ण कहते हैं कि इन्हें आसुरी निश्चय वाला समझो। यहाँ \"मुझको\" का अर्थ कुछ टीकाकार सब प्राणियों में स्थित अंतर्यामी परमात्मा लेते हैं, तो कुछ इसे भीतर के साक्षी के रूप में कृष्ण की उपस्थिति मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "17.7",
      "translation": "हर व्यक्ति को जो भोजन प्रिय होता है, वह भी तीन प्रकार का होता है। इसी तरह यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। अब उनके इस भेद को सुनो।",
      "explanation": "अर्जुन ने पूछा था कि शास्त्र-विधि छोड़कर श्रद्धा से पूजा करने वालों की निष्ठा कैसी होती है; उसी उत्तर को आगे बढ़ाते हुए कृष्ण अब तीन गुणों को रोज़मर्रा की पसंद पर लागू करते हैं। ये गुण हैं सत्त्व (निर्मलता), रजस (आवेग) और तमस (जड़ता)। वे पहले भोजन (आहार) को लेते हैं, फिर यज्ञ, तप और दान को; अगले श्लोकों में हर एक का भेद बताया गया है।"
    },
    {
      "id": "17.8",
      "translation": "जो भोजन आयु, सत्त्व, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता को बढ़ाने वाले हैं, जो रसीले, चिकने, देर तक टिकने वाले और हृदय को भाने वाले हैं, वे सात्त्विक व्यक्ति को प्रिय होते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण बता रहे हैं कि प्रकृति के तीन गुण मनुष्य की रुचियों, विशेषकर भोजन की पसंद, को कैसे प्रभावित करते हैं। सत्त्व गुण (स्पष्टता और संतुलन) वाला व्यक्ति ऐसा पौष्टिक भोजन पसंद करता है जो लंबे, स्वस्थ और प्रसन्न जीवन में सहायक हो। 'स्निग्ध' और 'स्थिर' का अर्थ प्रायः चिकना और देर तक शरीर को सहारा देने वाला भोजन माना जाता है; यह श्लोक पसंद बताता है, कोई निश्चित भोजन-सूची नहीं देता।"
    },
    {
      "id": "17.9",
      "translation": "कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले आहार रजोगुणी व्यक्ति को प्रिय होते हैं। वे दुख, शोक और रोग देने वाले होते हैं।",
      "explanation": "तीन प्रकार के आहार का वर्णन करते हुए कृष्ण यहाँ उन भोजनों को बताते हैं जो रजोगुण (बेचैन इच्छा और लालसा का गुण) वाले व्यक्ति को भाते हैं। ये स्वाद और गर्मी में अति वाले होते हैं और कष्ट, शोक तथा रोग (आमय) देते हैं। यह पिछले श्लोक के सात्त्विक आहार से भिन्न है, जो स्वास्थ्य और शांत मन को पोषण देता है।"
    },
    {
      "id": "17.10",
      "translation": "जो भोजन बासी हो, जिसका रस चला गया हो, जो दुर्गंधयुक्त हो, जो रात का रखा हुआ हो, जो किसी का जूठा हो और जो अपवित्र हो, ऐसा भोजन तामसिक प्रकृति वालों को प्रिय होता है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ तीन गुणों के अनुसार तीन प्रकार के भोजन का वर्णन पूरा कर रहे हैं। इस श्लोक में तमोगुण (तमस्), यानी जड़ता और अज्ञान के गुण, को प्रिय भोजन बताया गया है। इसमें बासी (यातयाम), नीरस, सड़ा हुआ, रातभर रखा हुआ, जूठा और अपवित्र (अमेध्य) भोजन गिनाया गया है।"
    },
    {
      "id": "17.11",
      "translation": "फल की इच्छा न रखने वाले लोगों द्वारा शास्त्र-विधि के अनुसार जो यज्ञ किया जाता है, और जिसमें मन को इस भाव में स्थिर कर लिया जाता है कि \"यह करना ही कर्तव्य है\" — वह यज्ञ सात्त्विक है।",
      "explanation": "भोजन के तीन गुणों का वर्णन करने के बाद कृष्ण अब यज्ञ (अनुष्ठान के रूप में किया गया अर्पण) के तीन प्रकार बताते हैं। सात्त्विक (सत्त्व, यानी शुद्ध और संतुलित) यज्ञ विधि के अनुसार, फल की चाह के बिना, केवल कर्तव्य-भाव से किया जाता है। अगले श्लोकों में इसके विपरीत दिखावे या लाभ के लिए किए गए यज्ञों का वर्णन है।"
    },
    {
      "id": "17.12",
      "translation": "परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल की इच्छा रखकर, या केवल दिखावे के लिए किया जाता है, उस यज्ञ को तुम राजसिक जानो।",
      "explanation": "कृष्ण यज्ञ (पूजा या कर्तव्य के रूप में किया गया अनुष्ठान) के तीन प्रकार प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार बता रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने बिना फल की इच्छा के, कर्तव्य समझकर किया गया सात्त्विक यज्ञ बताया था। अब वे कहते हैं कि फल की कामना से या दिखावे (दम्भ) के लिए किया गया यज्ञ राजसिक है, यानी रजोगुण के वश, इच्छा और आवेग से प्रेरित। यहाँ वे अर्जुन को 'भरतश्रेष्ठ' कहकर पुकारते हैं।"
    },
    {
      "id": "17.13",
      "translation": "जो यज्ञ विधि की उपेक्षा करके किया जाए, जिसमें अन्न का वितरण न हो, मंत्रों का प्रयोग न हो, दक्षिणा न दी जाए और जिसमें श्रद्धा का अभाव हो, उसे तामस यज्ञ कहा जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ तीन प्रकार के यज्ञ (अनुष्ठानपूर्वक अर्पण) बता रहे हैं, जो मन के गुण (प्रकृति के स्वभाव) से जुड़े हैं। सात्त्विक और राजस के बाद वे तामस (अंधकार या जड़ता से युक्त) यज्ञ का वर्णन करते हैं। इसकी पहचान है: नियमों की उपेक्षा, अन्न और दक्षिणा का अभाव, मंत्रों का न होना, और सबसे बढ़कर श्रद्धा की कमी।"
    },
    {
      "id": "17.14",
      "translation": "देवताओं, द्विजों, गुरुजनों और ज्ञानियों का पूजन-सम्मान, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — इसे शरीर का तप कहा जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ तप (तपस्) के तीन प्रकार बता रहे हैं, और इस श्लोक में शरीर के तप का वर्णन है। इसमें देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानी जनों का सम्मान, शुचिता (शौच), सरलता (आर्जव), ब्रह्मचर्य और अहिंसा शामिल हैं। 'द्विज' को कुछ परंपराएँ विशेष वर्ण के लोग मानती हैं और कुछ इसे विद्वान या आध्यात्मिक व्यक्ति के अर्थ में लेती हैं; इसी तरह ब्रह्मचर्य का अर्थ पूर्ण संयम या जीवन-अवस्था के अनुसार संयम, दोनों रूपों में लिया जाता है।"
    },
    {
      "id": "17.15",
      "translation": "ऐसी वाणी जो किसी को कष्ट न दे, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो, और शास्त्रों के स्वाध्याय का नियमित अभ्यास — इसे वाणी का तप कहा जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण तीन गुणों के संदर्भ में तप (आत्म-अनुशासन) के तीन रूप बता रहे हैं। शरीर के तप के बाद वे वाणी के तप की बात करते हैं: बोल ऐसे हों जो किसी में उद्वेग पैदा न करें, सत्य, प्रिय और हितकारी हों, और साथ में शास्त्रों का नियमित स्वाध्याय हो। यहाँ केवल सत्य नहीं, बल्कि सत्य के साथ मधुरता और हित, तीनों का होना आवश्यक माना गया है।"
    },
    {
      "id": "17.16",
      "translation": "मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-संयम और भावों की शुद्धता — इसी को मन का तप कहा जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण तप के तीन प्रकार बता रहे हैं: शरीर, वाणी और मन का तप। इस श्लोक में मानसिक तप है: शांत मन (मनःप्रसाद), सौम्य स्वभाव, मौन, स्वयं पर संयम (आत्मविनिग्रह) और शुद्ध भाव (भावसंशुद्धि)। कुछ व्याख्याकार मौन को वाणी का पूर्ण विराम मानते हैं, तो कुछ इसे मन की वह शांति मानते हैं जो आत्म-चिंतन में लगी रहती है।"
    },
    {
      "id": "17.17",
      "translation": "परम श्रद्धा के साथ, फल की कामना न रखने वाले संयमी लोगों द्वारा किया गया यह तीनों प्रकार का तप सात्त्विक कहा जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी शरीर, वाणी और मन के तप का वर्णन किया है। यहाँ वे बताते हैं कि जब ये तीनों गहरी श्रद्धा, स्थिर चित्त (युक्त) और फल की इच्छा के बिना किए जाएँ, तो वे सात्त्विक होते हैं, यानी शुद्ध और संतुलित गुण (सत्त्व) के। अगला श्लोक दिखावे वाले, विपरीत प्रकार के तप की बात करता है।"
    },
    {
      "id": "17.18",
      "translation": "जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए, और दिखावे के साथ किया जाता है, उसे यहाँ राजसिक कहा गया है। वह डगमगाने वाला और अस्थिर होता है।",
      "explanation": "सत्रहवें अध्याय में कृष्ण श्रद्धा और कर्मों को तीन गुणों के अनुसार बाँट रहे हैं। पिछले श्लोक में सात्त्विक तप बताया गया था, और यहाँ वे राजसिक तप बताते हैं, जो रजोगुण यानी महत्त्वाकांक्षा और चाह से प्रेरित होता है। ऐसा तप दूसरों से आदर और प्रशंसा पाने के लिए दिखावे से किया जाता है, इसलिए उसका फल अनिश्चित और टिकने वाला नहीं माना गया है।"
    },
    {
      "id": "17.19",
      "translation": "जो तप मूढ़ हठ के साथ, स्वयं को पीड़ा देकर किया जाता है, अथवा दूसरे का विनाश करने के लिए किया जाता है, उसे तामसिक कहा गया है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन से तप के तीन प्रकार बता रहे हैं; सात्त्विक और राजस के बाद यहाँ तामस तप का वर्णन है। तप का अर्थ है आत्मसंयम और साधना के लिए किया गया कठिन अभ्यास। जब वह अज्ञान भरे हठ से, अपने शरीर और मन को कष्ट देकर, या किसी दूसरे को हानि पहुँचाने के उद्देश्य से किया जाए, तो वह तमोगुण (तमस्) से प्रेरित माना गया है।"
    },
    {
      "id": "17.20",
      "translation": "\"देना ही चाहिए\" ऐसा सोचकर, ऐसे व्यक्ति को जो बदले में कुछ न कर सके, उचित स्थान और समय पर तथा योग्य पात्र को जो दान दिया जाता है, वह दान सात्त्विक माना गया है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में तामसिक तप बताने के बाद कृष्ण यहाँ तीन गुणों के अनुसार दान के प्रकार बता रहे हैं, और पहले सात्त्विक (शुद्ध, संतुलित) दान को समझाते हैं। यह दान कर्तव्य-भाव से, बदले की आशा के बिना, और उचित देश, काल तथा योग्य पात्र का ध्यान रखकर दिया जाता है। \"योग्य पात्र\" कौन है, इस पर टीकाकारों में भेद है, जैसे विद्वान व्यक्ति या सचमुच ज़रूरतमंद, पर सभी इस पर सहमत हैं कि दान स्वार्थ से मुक्त होना चाहिए।"
    },
    {
      "id": "17.21",
      "translation": "परन्तु जो दान बदले में उपकार पाने की आशा से, या किसी फल को लक्ष्य करके, या फिर अनिच्छा और कष्ट के साथ दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार दान के तीन भेद बता रहे हैं। पिछले श्लोक में सात्त्विक दान था, जो केवल कर्तव्य समझकर दिया जाता है। यहाँ राजस दान है, जो बदले में उपकार, फल या प्रतिष्ठा पाने की इच्छा से, या मन मारकर दिया जाता है। 'परिक्लिष्टम्' का अर्थ 'अनिच्छा से' और 'पछतावे या कष्ट के साथ' दोनों तरह से लिया जाता है।"
    },
    {
      "id": "17.22",
      "translation": "जो दान अनुचित स्थान और समय पर, अयोग्य लोगों को, बिना सत्कार के और अवज्ञा के भाव से दिया जाता है, वह तामस दान कहा गया है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ सात्त्विक और राजस के बाद दान के तीन प्रकारों का वर्णन पूरा कर रहे हैं। तामस दान, यानी अज्ञान और अंधकार से प्रेरित दान, वह है जो गलत समय और स्थान पर, अनुपयुक्त पात्रों को, बिना आदर के या तिरस्कार के साथ दिया जाए। \"अपात्र\" कौन है, इस पर टीकाकार भिन्न मत रखते हैं: कुछ नैतिक अयोग्यता पर बल देते हैं, तो कुछ इस पर कि दान का दुरुपयोग या उससे हानि होगी।"
    },
    {
      "id": "17.23",
      "translation": "\"ॐ तत् सत्\" — यह ब्रह्म का तीन प्रकार का नाम-निर्देश माना गया है। प्राचीन काल में उसी के द्वारा ब्राह्मण, वेद और यज्ञ स्थापित किए गए थे।",
      "explanation": "कृष्ण तामसिक दान की बात के बाद अब बताते हैं कि पवित्र कर्म कैसे पूर्ण होते हैं। \"ॐ तत् सत्\" ब्रह्म (परम सत्य) का तीन भागों वाला नाम है, जो कर्मों को पवित्र करने के लिए प्रयोग होता है। श्लोक कहता है कि ब्राह्मण, वेद और यज्ञ इसी से स्थापित हुए; टीकाकार \"तेन\" का अर्थ \"ब्रह्म से\" या \"इस मंत्र के उच्चारण से\" अलग-अलग लेते हैं।"
    },
    {
      "id": "17.24",
      "translation": "इसलिए ब्रह्म को जानने और उसका उपदेश करने वाले लोग शास्त्र में बताई गई विधि के अनुसार यज्ञ, दान और तप के कर्म सदा \"ॐ\" का उच्चारण करके ही आरंभ करते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण \"ॐ तत् सत्\" को ब्रह्म का नामनिर्देश बताते हुए यहाँ \"ॐ\" की भूमिका समझाते हैं। ब्रह्मवादी (ब्रह्म का वर्णन करने वाले) शास्त्रविधि के अनुसार यज्ञ, दान और तप (तपस्या) को \"ॐ\" कहकर आरंभ करते हैं, जिससे कर्म पवित्र और समर्पित हो जाता है।"
    },
    {
      "id": "17.25",
      "translation": "'तत्' कहकर, फल की इच्छा छोड़कर, मोक्ष चाहने वाले लोग यज्ञ और तप के कर्म तथा अनेक प्रकार के दान के कर्म करते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण 'ॐ तत् सत्' के तीन पदों की चर्चा कर रहे हैं। यहाँ 'तत्' वह पद है जिसे मोक्ष चाहने वाले लोग यज्ञ, तप और दान शुरू करते समय बोलते हैं, ताकि कर्म का फल अपने लिए न माँगें। कुछ व्याख्याकार 'तत्' को परम सत्ता (ब्रह्म) की ओर संकेत मानकर कर्म उसे अर्पित करना समझते हैं, तो कुछ इसे फल पर अपना दावा छोड़ने की याद मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "17.26",
      "translation": "\"सत्\" शब्द का प्रयोग सत्य-भाव (जो वास्तव में है) और साधु-भाव (भलाई) के अर्थ में किया जाता है। और हे पार्थ, उसी प्रकार किसी प्रशंसनीय कर्म के लिए भी \"सत्\" शब्द प्रयुक्त होता है।",
      "explanation": "कृष्ण \"ॐ तत् सत्\" के तीन पदों की व्याख्या कर रहे हैं, और यहाँ \"सत्\" शब्द पर आते हैं। यह सत्ता या वास्तविकता (सद्भाव) और भलाई (साधुभाव) के लिए आता है, और प्रशंसनीय कर्म (प्रशस्त कर्म) के लिए भी। श्लोक कोई एक परिभाषा नहीं देता, इसलिए पाठक \"सत्\" को जो वास्तविक है, जो शुभ है और जो उचित रूप से किया गया है, इन सबका सूचक मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "17.27",
      "translation": "यज्ञ, तप और दान में दृढ़ स्थिति भी \"सत्\" कही जाती है, और इन्हीं के निमित्त किया गया कर्म भी निश्चय ही \"सत्\" कहलाता है।",
      "explanation": "श्रीकृष्ण \"ॐ तत् सत्\" इस त्रिविध ब्रह्म-नाम की व्याख्या जारी रखे हुए हैं। यहाँ वे \"सत्\" (यानी यथार्थ, शुभ) शब्द को यज्ञ, तप और दान में स्थिर निष्ठा पर, तथा इनके लिए किए गए हर कर्म पर लागू करते हैं। \"तदर्थीय\" का अर्थ टीकाकार कहीं इन तीनों साधनों के लिए किया गया कर्म और कहीं परमात्मा के लिए किया गया कर्म लेते हैं; श्लोक दोनों अर्थों की गुंजाइश रखता है।"
    },
    {
      "id": "17.28",
      "translation": "हे पार्थ! श्रद्धा के बिना जो कुछ हवन किया जाए, दान दिया जाए, तप किया जाए, या और कोई कर्म किया जाए, वह 'असत्' कहलाता है। वह न मरने के बाद काम आता है, न इस लोक में।",
      "explanation": "अध्याय 17 के अंत में कृष्ण तीन गुणों के अनुसार धार्मिक आचरण को परखते हैं। पिछले श्लोकों में 'सत्' का अर्थ शुभ और सत्य बताया गया था; यहाँ उसका उलटा 'असत्' (व्यर्थ या अयथार्थ) बताते हैं। श्रद्धा के बिना किए गए यज्ञ, दान और तप का फल न इस लोक में मिलता है, न परलोक में।"
    }
  ]
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