{
  "chapter": 3,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "3.1",
      "translation": "हे जनार्दन, यदि आपके मत में बुद्धि (ज्ञान) कर्म से श्रेष्ठ है, तो हे केशव, आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगा रहे हैं?",
      "explanation": "अर्जुन यहाँ बोल रहे हैं। दूसरे अध्याय में कृष्ण ने स्थिर बुद्धि की महिमा बताई और साथ ही युद्ध करने को भी कहा, इससे अर्जुन उलझन में हैं। उनका प्रश्न है कि यदि बुद्धि (विवेकपूर्ण ज्ञान) कर्म से श्रेष्ठ है, तो कृष्ण उन्हें भयंकर युद्ध-कर्म में क्यों लगा रहे हैं। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि अर्जुन ज्ञान और कर्म को कितना अलग मान रहे हैं।"
    },
    {
      "id": "3.2",
      "translation": "उलझे हुए-से इन वचनों से आप मानो मेरी बुद्धि को भ्रम में डाल रहे हैं। इसलिए निश्चय करके मुझे वह एक बात बताइए, जिससे मैं परम कल्याण पा सकूँ।",
      "explanation": "अर्जुन उलझन में है। कृष्ण ने ज्ञान और कर्म दोनों की बात की है, और अर्जुन को लगता है कि ये बातें मिली-जुली हैं और वह तय नहीं कर पा रहा कि कौन-सा मार्ग अपनाए। इसलिए वह एक निश्चित उत्तर माँगता है जो उसे श्रेयस् यानी परम कल्याण तक पहुँचाए, केवल क्षणिक लाभ तक नहीं।"
    },
    {
      "id": "3.3",
      "translation": "हे निष्पाप, इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मैंने पहले बताई थी: सांख्य मार्ग वालों की ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।",
      "explanation": "अर्जुन ने पिछले श्लोक में कहा कि श्रीकृष्ण की बातें उसे उलझा रही हैं और निश्चित मार्ग बताने को कहा; यहाँ श्रीकृष्ण उत्तर शुरू करते हैं। निष्ठा का अर्थ है साधना में स्थिर आधार; ज्ञानयोग आत्मा के ज्ञान का अनुशासन है और कर्मयोग फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करने का अनुशासन है। शंकराचार्य इन्हें अलग-अलग अधिकारी साधकों के दो मार्ग मानते हैं, जबकि रामानुज इन्हें एक ही साधना के जुड़े हुए अंग मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.4",
      "translation": "कर्मों को आरंभ न करने भर से मनुष्य निष्कर्मता को प्राप्त नहीं होता, और केवल संन्यास ले लेने से भी वह सिद्धि को नहीं पाता।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में दो निष्ठाओं की बात हुई थी, और अर्जुन की उलझन दूर करने के लिए कृष्ण यहाँ समझाते हैं कि केवल काम छोड़ देने से निष्कर्मता (नैष्कर्म्य, वह अवस्था जिसमें कर्म बाँधता नहीं) नहीं मिलती। केवल बाहरी संन्यास से भी सिद्धि नहीं मिलती। परंपराएँ इसे अलग ढंग से पढ़ती हैं: कुछ इसे ज्ञान की ओर ले जाने वाले निष्काम कर्म की प्रशंसा मानती हैं, तो कुछ कर्म और आंतरिक त्याग के साथ-साथ चलने की शिक्षा।"
    },
    {
      "id": "3.5",
      "translation": "कोई भी व्यक्ति एक क्षण के लिए भी कभी कर्म किए बिना नहीं रहता, क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुण हर किसी को विवश करके कर्म में लगा देते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि कर्म न करने मात्र से या केवल संन्यास लेने से सिद्धि नहीं मिलती; यहाँ वे अर्जुन को उसका कारण समझाते हैं। प्रकृति के गुण (प्रकृति के तीन घटक: सत्त्व, रजस् और तमस्) हर प्राणी से कर्म करवाते रहते हैं, इसलिए पूरी तरह निष्क्रिय रहना संभव नहीं है। शंकराचार्य के अनुसार यह बात मुख्यतः उस अज्ञानी पर लागू होती है जो स्वयं को शरीर मानता है, जबकि अन्य टीकाकार इसे हर देहधारी पर समान रूप से लागू मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.6",
      "translation": "जो व्यक्ति कर्म करने वाली इन्द्रियों को रोककर बैठ तो जाता है, पर मन ही मन इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, उस मोहग्रस्त बुद्धि वाले को पाखंडी कहा जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि केवल कर्म छोड़ देना सच्चा संन्यास नहीं है। जो हाथ-वाणी जैसी कर्मेन्द्रियों को तो रोक लेता है, पर मन में विषयों (इन्द्रियार्थ) का चिंतन करता रहता है, वह केवल बाहर से संयमी दिखता है। भीतर आसक्ति बनी रहने के कारण कृष्ण उसे मोहग्रस्त और मिथ्याचारी (दिखावटी आचरण वाला) कहते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.7",
      "translation": "परन्तु हे अर्जुन, जो मन से इन्द्रियों को वश में करके, आसक्ति छोड़कर, कर्मेन्द्रियों के द्वारा कर्मयोग का आरम्भ करता है, वही श्रेष्ठ है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में उस व्यक्ति का वर्णन था जो शरीर से कर्म रोक लेता है, पर मन से विषयों का चिन्तन करता रहता है। उसके विपरीत, यहाँ कृष्ण ऐसे व्यक्ति को श्रेष्ठ कहते हैं जो मन से इन्द्रियों को संयमित रखता है और आसक्ति (सङ्ग) के बिना कर्म करता है। इसी को कर्मयोग कहते हैं, यानी फल से चिपके बिना कर्म करने का अभ्यास।"
    },
    {
      "id": "3.8",
      "translation": "तुम अपना नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म न करने से कर्म करना श्रेष्ठ है। कर्म छोड़ देने पर तो तुम्हारे शरीर का निर्वाह भी नहीं हो पाएगा।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं कि कर्म से हटकर बैठ जाना समाधान नहीं है। पिछले श्लोक में उन्होंने अनासक्त होकर कर्मयोग करने की बात कही थी, और यहाँ वे उसी का कारण देते हैं: निष्क्रियता से जीवन तक नहीं चल सकता। \"नियत कर्म\" का अर्थ है निर्धारित या उचित कर्तव्य। शंकराचार्य इसे शास्त्र द्वारा विहित अनिवार्य कर्म मानते हैं, जबकि अन्य परंपराएँ इसे व्यक्ति के अपने स्थान और धर्म के अनुसार सभी कर्तव्य मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "3.9",
      "translation": "यज्ञ के लिए किए गए कर्म को छोड़कर, बाकी कर्मों से इस लोक के लोग बंधन में पड़ते हैं। इसलिए हे कुन्तीपुत्र, आसक्ति छोड़कर यज्ञ के लिए ही कर्म करो।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि कर्म न करने से बेहतर कर्म करना है। यहाँ वे बताते हैं कि कर्म तब बाँधता है जब वह अपने स्वार्थ और आसक्ति से किया जाए, और यज्ञ यानी निःस्वार्थ भाव से किया गया समर्पित कर्म बाँधता नहीं। 'यज्ञ' को कुछ परंपराएँ वैदिक अनुष्ठान के रूप में समझती हैं, तो कुछ ईश्वर को अर्पित या लोकहित के लिए किया गया हर कर्तव्य-कर्म मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "3.10",
      "translation": "सृष्टि के आरंभ में प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजा की रचना की और कहा: \"इसी यज्ञ से तुम फलो-फूलो और बढ़ो। यह यज्ञ तुम्हारे लिए इच्छित फल देने वाली कामधेनु बने।\"",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि यज्ञ के भाव से किया गया कर्म बंधन नहीं बनाता। अब वे बताते हैं कि यज्ञ की परंपरा सृष्टि के साथ ही शुरू हुई, जब सृष्टिकर्ता प्रजापति ने मनुष्यों को यज्ञ का मार्ग दिया। यज्ञ यानी त्यागपूर्वक किया गया अर्पण या कर्तव्य, और \"इष्टकामधुक्\" का अर्थ है इच्छित फल देने वाला, जैसे मनचाहा दूध देने वाली गाय। शंकराचार्य जैसी परंपराएँ यज्ञ को मुख्यतः वैदिक अनुष्ठान मानती हैं, जबकि कई अन्य व्याख्याएँ इसे निःस्वार्थ सेवा और कर्तव्य-पालन तक फैलाकर समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "3.11",
      "translation": "इस यज्ञ से तुम देवताओं को पुष्ट करो, और वे देवता तुम्हें पुष्ट करें। इस प्रकार एक-दूसरे को पुष्ट करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।",
      "explanation": "कृष्ण बता रहे हैं कि प्रजापति ने यज्ञ (अर्पण और कर्तव्य-भाव से किया गया कर्म) के द्वारा मनुष्यों और देवताओं को आपस में जोड़ा है। मनुष्य यज्ञ से देवताओं (जीवन और प्रकृति के पीछे कार्यरत दिव्य शक्तियों) को पुष्ट करते हैं, और देवता बदले में मनुष्यों को। इस पारस्परिक पोषण (भावना) से परम कल्याण (श्रेयस्) मिलता है। कुछ परंपराएँ देवताओं को शाब्दिक रूप में लेती हैं, तो कुछ उन्हें प्रकृति की शक्तियाँ या हमारे भीतर की शक्तियाँ मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "3.12",
      "translation": "यज्ञ से पोषित देवता तुम्हें मनचाहे भोग देंगे। जो व्यक्ति उनके दिए हुए भोगों को उन्हें अर्पित किए बिना ही भोगता है, वह निश्चय ही चोर है।",
      "explanation": "कृष्ण यज्ञ की बात आगे बढ़ाते हैं: जीवन देने और लेने के आपसी संबंध पर चलता है, जिसमें देवता संसार का पोषण करते हैं। जो बिना कुछ लौटाए केवल लेता रहता है, उसे वे चोर कहते हैं। टीकाकार यज्ञ का अर्थ अलग-अलग लेते हैं: कुछ इसे वैदिक कर्मकांड मानते हैं, तो कुछ निष्काम कर्तव्य या सेवा।"
    },
    {
      "id": "3.13",
      "translation": "जो श्रेष्ठ लोग यज्ञ के बाद बचा हुआ अन्न खाते हैं, वे सब प्रकार के दोषों से मुक्त हो जाते हैं। परंतु जो केवल अपने ही लिए पकाते हैं, वे पापी तो पाप ही खाते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को जीवन में यज्ञ की भूमिका समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि पहले देवताओं, दूसरों और समष्टि के लिए अर्पित करके फिर बचा हुआ खाने से मनुष्य दोषों (किल्बिष) से शुद्ध होता है, जबकि केवल अपने लिए पकाना पाप (अघ) खाना है। कुछ परंपराएँ यज्ञ को वैदिक अनुष्ठान मानती हैं, तो कुछ इसे हर निःस्वार्थ और बाँटने वाला कर्म मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "3.14",
      "translation": "प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है, और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि यज्ञ की भावना से किया गया निःस्वार्थ कर्म क्यों महत्त्वपूर्ण है। वे निर्भरता की एक शृंखला बताते हैं: प्राणी अन्न पर, अन्न वर्षा पर, वर्षा यज्ञ पर और यज्ञ कर्म पर निर्भर है। भाव यह है कि मनुष्य का कर्म संसार की बड़ी व्यवस्था से जुड़ा है। परंपराओं में मतभेद है कि यहाँ 'यज्ञ' वैदिक अनुष्ठान ही है या अर्पण-भाव से किया गया हर कर्तव्य; अगले श्लोक में यही शृंखला आगे बढ़ती है।"
    },
    {
      "id": "3.15",
      "translation": "जान लो कि कर्म ब्रह्म से उत्पन्न होता है, और ब्रह्म अक्षर से प्रकट हुआ है। इसलिए सर्वव्यापी ब्रह्म सदा यज्ञ में प्रतिष्ठित है।",
      "explanation": "कृष्ण यज्ञ के चक्र को समझा रहे हैं, यानी यह विचार कि निःस्वार्थ कर्तव्य-कर्म से संसार चलता है। यहाँ वे कर्म का मूल ब्रह्म में और ब्रह्म का मूल अक्षर में बताकर कहते हैं कि सर्वव्यापी ब्रह्म यज्ञ में प्रतिष्ठित है। टीकाकार इन शब्दों को अलग ढंग से पढ़ते हैं: कुछ ब्रह्म को वेद और अक्षर को परमात्मा मानते हैं, जबकि कुछ ब्रह्म को प्रकृति या शरीर-मन और अक्षर को आत्मा मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.16",
      "translation": "हे पार्थ! इस प्रकार चलाए गए चक्र के अनुसार जो इस लोक में नहीं चलता, वह पापमय जीवन जीने वाला और इन्द्रियों में ही रमने वाला मनुष्य व्यर्थ ही जीता है।",
      "explanation": "श्रीकृष्ण यहाँ परस्पर देने-लेने के चक्र की बात पूरी कर रहे हैं: यज्ञ से संसार चलता है और संसार से हमारा पालन होता है। जो इस चक्र से लेता तो है पर लौटाता कुछ नहीं और केवल इन्द्रिय-सुख (इन्द्रियाराम) में डूबा रहता है, उसे \"अघायु\" यानी पापमय जीवन वाला कहा गया है, और उसका जीवन व्यर्थ माना गया है। इस \"चक्र\" का अर्थ टीकाकारों में अलग-अलग है: कुछ इसे वेदविहित कर्मकांड का कर्तव्य मानते हैं, तो कुछ सबके हित के लिए किया गया निःस्वार्थ कर्म।"
    },
    {
      "id": "3.17",
      "translation": "परंतु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करता है, आत्मा में ही तृप्त है और आत्मा में ही पूर्ण संतुष्ट है, उसके लिए करने योग्य कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि जो सबके साझा कर्म-चक्र को नहीं चलाता, उसका जीवन व्यर्थ है। यहाँ वे अपवाद बताते हैं: जिसका आनंद, तृप्ति और संतोष पूरी तरह आत्मा (आत्मन्) में है, उसे किसी बाहरी लक्ष्य के लिए कर्म करने की बाध्यता नहीं रहती। परंपराओं में मतभेद है: कुछ इसे आत्मज्ञानी का कर्तव्यों से मुक्त होना मानती हैं, जबकि अन्य कहती हैं कि ऐसा व्यक्ति लोक-कल्याण के लिए सहज भाव से कर्म करता रहता है, जैसा आगे के श्लोकों में दिखता है।"
    },
    {
      "id": "3.18",
      "translation": "ऐसे व्यक्ति के लिए इस संसार में न कुछ करने से कोई प्रयोजन सिद्ध होता है, न कुछ न करने से। और अपने किसी प्रयोजन के लिए उसे किसी भी प्राणी पर निर्भर भी नहीं रहना पड़ता।",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक में वर्णित उस व्यक्ति का वर्णन आगे बढ़ा रहे हैं जो आत्मा में ही रमता और तृप्त रहता है। ऐसे व्यक्ति को कर्म करने से कोई लाभ नहीं और न करने से कोई हानि नहीं, और अपना कोई प्रयोजन पूरा करने के लिए उसे दूसरे प्राणियों की आवश्यकता भी नहीं। इसी कारण वह किसी बाध्यता से मुक्त है, और अगले श्लोक में कृष्ण आसक्ति (सङ्ग) छोड़कर कर्म करने को कहते हैं। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि यह कर्म-त्यागी संन्यासी का वर्णन है या ऐसे मुक्त पुरुष का जो फिर भी कर्म करता है; श्लोक स्वयं दोनों अर्थों की गुंजाइश रखता है।"
    },
    {
      "id": "3.19",
      "translation": "इसलिए तुम आसक्ति छोड़कर सदा वही कर्म करो जो करने योग्य है। क्योंकि आसक्ति के बिना कर्म करता हुआ मनुष्य परम को प्राप्त कर लेता है।",
      "explanation": "अर्जुन कर्म से पीछे हटना चाहता है; उसके उत्तर में कृष्ण निष्कर्ष देते हैं कि उसे आसक्ति (सङ्ग) छोड़कर, यानी फल से चिपके बिना, अपना कर्तव्य-कर्म करना चाहिए। ऐसा निष्काम कर्म 'परम' की प्राप्ति कराता है। कुछ व्याख्याकार इस 'परम' को आत्मा का सर्वोच्च स्वरूप या मोक्ष मानते हैं, तो कुछ भगवान की प्राप्ति।"
    },
    {
      "id": "3.20",
      "translation": "जनक आदि ने कर्म के द्वारा ही सिद्धि पाई थी। संसार को संभाले रखने का भी ध्यान रखते हुए तुम्हें कर्म करना ही उचित है।",
      "explanation": "अर्जुन कर्म छोड़ना चाहता है, इसलिए कृष्ण राजा जनक जैसे ज्ञानी शासकों का उदाहरण देते हैं, जिन्होंने कर्तव्य निभाते हुए ही सिद्धि (संसिद्धि) पाई। वे कर्म का दूसरा कारण भी बताते हैं: समाज का हित और उसे धारण करना (लोकसंग्रह), जो अच्छे उदाहरण पर निर्भर है। कुछ टीकाकार यहाँ सिद्धि को अनासक्त कर्म से मिलने वाला मोक्ष मानते हैं, तो कुछ इसमें सामाजिक कर्तव्य का अपना महत्त्व भी देखते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.21",
      "translation": "श्रेष्ठ व्यक्ति जो-जो आचरण करता है, साधारण लोग भी वही-वही करते हैं। वह जिसे प्रमाण मान लेता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि उसे लोकहित (लोकसंग्रह) को ध्यान में रखकर कर्म करना चाहिए। यहाँ वे कहते हैं कि लोग श्रेष्ठ जनों को आदर्श मानते हैं, इसलिए नेतृत्व करने वाले का आचरण ही सबके व्यवहार की दिशा तय करता है। \"प्रमाण\" का अर्थ है वह मानक या आधार, जिससे सही-गलत का निर्णय किया जाए।"
    },
    {
      "id": "3.22",
      "translation": "हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरे लिए कुछ भी करना आवश्यक नहीं है, और न ही कुछ ऐसा है जो मुझे पाना बाकी हो और अब तक न मिला हो। फिर भी मैं कर्म में लगा रहता हूँ।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि लोग श्रेष्ठ व्यक्ति के आचरण का अनुसरण करते हैं। यहाँ वे अपना ही उदाहरण देते हैं: उनके लिए न कोई कर्तव्य शेष है, न कुछ पाना बाकी है, फिर भी वे कर्म करते रहते हैं। अर्जुन के लिए संकेत यह है कि कर्म का कारण अभाव या इच्छा ही हो, यह आवश्यक नहीं।"
    },
    {
      "id": "3.23",
      "translation": "क्योंकि हे पार्थ, यदि मैं कभी भी बिना थके कर्म में न लगा रहूँ, तो लोग हर प्रकार से मेरे ही मार्ग पर चलेंगे।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि स्वयं उन्हें कुछ पाना शेष न होने पर भी वे कर्म क्यों करते रहते हैं। लोग श्रेष्ठ व्यक्तियों का अनुकरण करते हैं, इसलिए यदि कृष्ण कर्म छोड़ दें तो दूसरे भी उनका उदाहरण लेकर अपने कर्तव्य छोड़ देंगे। इसका परिणाम अगले श्लोक में बताया गया है।"
    },
    {
      "id": "3.24",
      "translation": "यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सारे लोक नष्ट हो जाएँगे; मैं अव्यवस्था का कर्ता बनूँगा और इन सब प्राणियों का नाश कर बैठूँगा।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि स्वयं उन्हें कुछ पाना शेष न होने पर भी वे कर्म क्यों करते रहते हैं। यदि वे कर्म छोड़ दें, तो लोग उनका अनुसरण करेंगे और व्यवस्था बिगड़ जाएगी; \"सङ्कर\" का अर्थ मिश्रण या गड़बड़ी है, जिसे प्रायः कर्तव्यों और सामाजिक मर्यादा की अव्यवस्था माना जाता है। भाव यह है कि जिन्हें लोग आदर्श मानते हैं, उन पर सही आचरण करने का उत्तरदायित्व होता है।"
    },
    {
      "id": "3.25",
      "translation": "हे भारत! जैसे अज्ञानी लोग कर्म में आसक्त होकर कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को चाहिए कि वह आसक्ति से रहित होकर, लोक को सही मार्ग पर बनाए रखने की इच्छा से कर्म करे।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को कर्म का उपदेश दे रहे हैं और अभी कह चुके हैं कि वे स्वयं कर्म करते रहते हैं, ताकि संसार न बिखरे। यहाँ वे कहते हैं कि अज्ञानी कर्म में आसक्ति (सङ्ग) के कारण कर्म करते हैं, जबकि ज्ञानी उतनी ही लगन से, पर आसक्ति के बिना कर्म करे। लक्ष्य है लोकसंग्रह, यानी लोगों को सँभालना और अपने आचरण से राह दिखाना। व्याख्याकार इसमें कहीं ज्ञानी के कर्तव्य पर, तो कहीं भीतर की अनासक्ति पर अधिक बल देते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.26",
      "translation": "ज्ञानी व्यक्ति को चाहिए कि कर्म में आसक्त अज्ञानी लोगों की बुद्धि में भ्रम पैदा न करे। वह स्वयं योग में स्थित रहकर सब कर्म भली-भाँति करता हुआ, उन लोगों को भी कर्मों में लगाए रखे।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि जो लोग अभी कर्म और उसके फल में आसक्ति (सङ्ग) रखते हैं, उनके साथ ज्ञानी को कैसा व्यवहार करना चाहिए। उन्हें यह कहकर विचलित नहीं करना चाहिए कि कर्म व्यर्थ है। इसके बजाय ज्ञानी स्वयं स्थिर और संतुलित मन (योग) से सब कार्य अच्छी तरह करके उदाहरण दे। जो लोग अभी भीतरी अनासक्ति के लिए तैयार नहीं हैं, उनके लिए भ्रमित होने से बेहतर है कि वे कर्म में लगे रहें।"
    },
    {
      "id": "3.27",
      "translation": "सारे कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते हैं, परंतु जिसका मन अहंकार से मोहित हो गया है, वह मानता है, \"मैं ही कर्ता हूँ।\"",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि कर्म का कर्तापन वास्तव में अहंकार का नहीं है। गुण तीन हैं: सत्त्व (प्रकाश), रजस् (क्रियाशीलता) और तमस् (जड़ता), जिनसे प्रकृति बनी है। जो व्यक्ति अहंकार से जुड़ जाता है, वह प्रकृति की शक्तियों से होने वाले कर्मों का श्रेय स्वयं ले लेता है। अद्वैत परंपरा आत्मा के साक्षी होने पर बल देती है, जबकि भक्ति परंपराएँ अंततः ईश्वर को ही कर्ता मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "3.28",
      "translation": "परन्तु हे महाबाहो, जो गुणों और कर्मों के विभाजन का तत्त्व जानता है, वह यह समझकर कि गुण ही गुणों में काम कर रहे हैं, आसक्त नहीं होता।",
      "explanation": "पिछले श्लोक के अहंकार से भ्रमित व्यक्ति के विपरीत, यहाँ कृष्ण अर्जुन को ज्ञानी की दृष्टि बताते हैं। गुण प्रकृति के तीन घटक हैं: सत्त्व, रज और तम; शरीर, मन और इन्द्रियाँ इन्हीं से बने हैं और विषयों के बीच काम करते हैं। ज्ञानी यह देखकर कर्तापन के अभिमान में नहीं बँधता और आसक्ति (सङ्ग) में नहीं पड़ता। अद्वैत परम्परा इसे आत्मा के अकर्ता साक्षी होने का संकेत मानती है, जबकि वैष्णव परम्पराएँ इसमें कर्म के भीतर ईश्वर पर निर्भरता पर भी बल देती हैं।"
    },
    {
      "id": "3.29",
      "translation": "जो लोग प्रकृति के गुणों से मोहित हैं, वे गुणों से होने वाले कर्मों में आसक्त रहते हैं। जो पूर्ण तत्त्व को जानता है, वह अधूरा जानने वाले उन मंदबुद्धि लोगों को विचलित न करे।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को सलाह देते हुए कहते हैं कि गुणों (प्रकृति के तीन घटक, जिनसे सारी क्रिया चलती है) से भ्रमित लोग स्वयं को ही कर्ता मानकर कर्मों में आसक्ति (सङ्ग) रखते हैं। जो व्यापक दृष्टि रखता है, उसे उनकी कर्म-निष्ठा को डगमगाना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे वे दिशाहीन हो सकते हैं। परंपराओं में इस पर थोड़ा भेद है कि ज्ञान किस हद तक बताया जाए: कुछ आचरण के उदाहरण पर जोर देती हैं, कुछ क्रमशः उपदेश पर।"
    },
    {
      "id": "3.30",
      "translation": "अपने सारे कर्म मुझे समर्पित करके, चित्त को आत्मा में लगाए हुए, कामना और ममता से रहित और संताप से मुक्त होकर युद्ध करो।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को अपनी सीख का सार बताते हैं: कर्म करो, पर हर कर्म मुझे अर्पित करो और मन को आत्मा (अध्यात्म) में स्थिर रखो। फल की आशा और ममता छोड़ने से मन का संताप (ज्वर) मिट जाता है, और अर्जुन अपना कर्तव्य समझकर लड़ सकता है। \"मुझमें\" का अर्थ कुछ परंपराएँ व्यक्तिगत ईश्वर कृष्ण लेती हैं, तो कुछ सब प्राणियों में स्थित परम आत्मा।"
    },
    {
      "id": "3.31",
      "translation": "जो मनुष्य श्रद्धा रखते हुए और दोष-दृष्टि छोड़कर मेरे इस मत का सदा पालन करते हैं, वे भी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सब कर्म मुझे समर्पित करके, आशा और ममता छोड़कर युद्ध करो। यहाँ वे बताते हैं कि जो लोग श्रद्धा के साथ और बिना दोष निकाले (अनसूया) इस शिक्षा पर निरंतर चलते हैं, वे कर्मों के फल-बंधन से छूट जाते हैं। यहाँ 'मुक्ति' का अर्थ कर्म के बंधनकारी प्रभाव से छुटकारा है। अद्वैत परंपरा इसे चित्तशुद्धि के द्वारा ज्ञान की ओर ले जाने वाला मार्ग मानती है, जबकि वैष्णव परंपराएँ इसे भगवान के प्रति समर्पण और भक्ति के रूप में पढ़ती हैं।"
    },
    {
      "id": "3.32",
      "translation": "परन्तु जो लोग मेरे इस मत में दोष निकालते हुए इसका पालन नहीं करते, उन्हें सब प्रकार के ज्ञान में भ्रमित, विवेकहीन और नष्ट हुआ समझो।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में श्रद्धा से मत का पालन करने वालों की बात थी; यहाँ कृष्ण उनके विपरीत उन लोगों की बात करते हैं जो उसमें दोष निकालते हुए (असूया) उसे ठुकराते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे लोग सब ज्ञान के विषय में भ्रमित और विवेक (चेतस्) से रहित होकर भटक जाते हैं। यहाँ 'मत' से आशय अनासक्त भाव से कर्म करने और उन्हें भगवान को अर्पित करने की शिक्षा से है, जो पिछले श्लोकों में कही गई है।"
    },
    {
      "id": "3.33",
      "translation": "ज्ञानी भी अपनी ही प्रकृति के अनुरूप आचरण करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति का ही अनुसरण करते हैं; ऐसे में दमन भला क्या कर पाएगा?",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि लोग जैसा आचरण करते हैं, वैसा क्यों करते हैं। यहाँ प्रकृति का अर्थ जन्मजात प्रवृत्तियाँ हैं, जो तीन गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस् के स्वभाव) से बनती हैं और ज्ञानी तक को प्रभावित करती हैं। इसलिए केवल बलपूर्वक दमन (निग्रह) बहुत काम नहीं आता। व्याख्याकार यहाँ अलग-अलग पढ़ते हैं: कुछ इसे प्रकृति से लड़ने के बजाय अनुशासन से दिशा देने का संकेत मानते हैं, और कुछ इसे प्रकृति की प्रबलता पर बल मानते हैं, जिसे अगले श्लोक के अनुसार सही उपाय से सँभालना है।"
    },
    {
      "id": "3.34",
      "translation": "हर इंद्रिय के अपने विषय में राग और द्वेष बसे रहते हैं। मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं आना चाहिए, क्योंकि वे दोनों उसके मार्ग में बाधा डालने वाले लुटेरे हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार चलते हैं, और यहाँ वे अर्जुन को बताते हैं कि इसमें असली खतरा कहाँ है। आँख, कान जैसी हर इंद्रिय के विषय के साथ पसंद (राग) और नापसंद (द्वेष) जुड़ जाती है, और ये दोनों साधक को राह से भटका देते हैं। कुछ व्याख्याकार 'व्यवस्थित' का अर्थ प्रकृति द्वारा हर विषय में पहले से तय मानते हैं, तो कुछ इसे विषय के संपर्क में स्वाभाविक रूप से उठने वाला मानते हैं। दोनों इस पर सहमत हैं कि इनके वश में नहीं आना है।"
    },
    {
      "id": "3.35",
      "translation": "अपना धर्म अपूर्ण हो, तब भी दूसरे के भलीभाँति निभाए गए धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मर जाना भी कल्याणकारी है, पर दूसरे का धर्म भय देने वाला है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी बताया कि राग और द्वेष साधना के मार्ग में बाधा हैं। यहाँ वे अर्जुन से कहते हैं कि अपना धर्म, यानी जीवन में अपना कर्तव्य और भूमिका, दूसरे के धर्म की नकल से अधिक सुरक्षित है, भले ही वह नकल अधिक सुंदर दिखे। परंपरागत टीकाकार स्वधर्म को प्रायः अपने वर्ण के कर्तव्य के रूप में समझते हैं, जबकि कुछ इसे अपने स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार कर्तव्य मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.36",
      "translation": "हे वार्ष्णेय, तो फिर यह मनुष्य किससे प्रेरित होकर पाप करता है, जबकि वह चाहता नहीं और मानो बलपूर्वक उसमें लगा दिया गया हो?",
      "explanation": "अर्जुन कृष्ण से प्रश्न करते हैं। कृष्ण अभी कह चुके हैं कि मनुष्य को अपने ही धर्म (कर्तव्य और स्वभाव के अनुरूप आचरण) पर टिके रहना चाहिए। अर्जुन जानना चाहते हैं कि वह कौन-सी शक्ति है जो इच्छा न होने पर भी मनुष्य को पाप की ओर धकेलती है। 'वार्ष्णेय' कृष्ण का संबोधन है, जिसका अर्थ है वृष्णि वंश में जन्मे।"
    },
    {
      "id": "3.37",
      "translation": "यह कामना है, यह क्रोध है, जो रजोगुण से उत्पन्न होता है। यह सब कुछ निगल जाने वाला और महापापी है। इसे ही यहाँ शत्रु जानो।",
      "explanation": "अर्जुन ने पिछले श्लोक में पूछा था कि मनुष्य न चाहते हुए भी मानो किसी बल से प्रेरित होकर पाप क्यों करता है। उसका उत्तर देते हुए कृष्ण कहते हैं कि इसका कारण कामना (काम) है, जो बाधा पड़ने पर क्रोध का रूप ले लेती है। यह रजोगुण से, यानी प्रकृति के बेचैन और कर्मोन्मुख गुण से, उत्पन्न होती है, कभी तृप्त नहीं होती और बड़े अनर्थ कराती है। इसलिए इसे इस जीवन में अपना शत्रु समझना चाहिए।"
    },
    {
      "id": "3.38",
      "translation": "जैसे आग धुएँ से ढकी रहती है, दर्पण धूल से ढका रहता है, और गर्भस्थ शिशु झिल्ली से ढका रहता है, वैसे ही यह (ज्ञान) उस (काम) से ढका हुआ है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी काम को शत्रु बताया है, जो रजोगुण (चंचलता और आसक्ति के गुण) से उत्पन्न होता है। यहाँ वे तीन उपमाएँ देते हैं: धुआँ आग को, धूल दर्पण को और झिल्ली गर्भ को ढकती है। अगले श्लोक में स्पष्ट होता है कि 'यह' ज्ञान है, जिसे काम ढक लेता है; टीकाकार प्रायः इन तीन उपमाओं को ढकने की हल्की से गहरी होती मात्राएँ मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.39",
      "translation": "हे कुन्तीपुत्र! ज्ञानी के इस नित्य शत्रु से, जो कामना का रूप लिए हुए है और आग की तरह कभी तृप्त नहीं होता, ज्ञान ढका रहता है।",
      "explanation": "अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए कृष्ण यहाँ बताते हैं कि मनुष्य को गलत कर्म की ओर क्या धकेलता है। वे कामना (काम) को ज्ञानी का स्थायी शत्रु कहते हैं, जो ज्ञान को ढक देती है और अग्नि की तरह कितना भी ईंधन मिले, कभी तृप्त नहीं होती। परंपराएँ यहाँ ज्ञान का अर्थ कहीं आत्मज्ञान और कहीं सामान्य विवेक लेती हैं, पर सभी मानती हैं कि कामना स्पष्ट दृष्टि को धुँधला कर देती है।"
    },
    {
      "id": "3.40",
      "translation": "इन्द्रियों, मन और बुद्धि को इस (काम) का निवास-स्थान कहा गया है। इन्हीं के द्वारा यह ज्ञान को ढककर देहधारी जीव को मोह में डाल देता है।",
      "explanation": "अर्जुन ने पूछा था कि मनुष्य न चाहते हुए भी पाप क्यों करता है; कृष्ण उत्तर में काम (कामना) को ज्ञानियों का नित्य शत्रु बता चुके हैं। यहाँ वे कहते हैं कि यह इन्द्रियों, मन और बुद्धि में टिककर इन्हीं के सहारे ज्ञान को ढक देता है और देहधारी को भ्रमित करता है। टीकाकार इसे अलग-अलग ढंग से समझाते हैं कि ये तीनों काम के स्थान हैं या उसके फैलने की सीढ़ियाँ, पर सभी मानते हैं कि वह भीतर से ही काम करता है।"
    },
    {
      "id": "3.41",
      "translation": "इसलिए हे भरतश्रेष्ठ, तुम पहले इन्द्रियों को वश में करो, और फिर ज्ञान तथा विज्ञान का नाश करने वाले इस पाप को नष्ट कर दो।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा है कि कामना (काम) इन्द्रियों, मन और बुद्धि में बसकर ज्ञान को ढक लेती है। यहाँ वे निष्कर्ष देते हैं: पहले इन्द्रियों को संयम में लाओ, फिर कामना रूपी 'पाप्मा' को जड़ से मिटाओ। 'ज्ञान' और 'विज्ञान' को परंपराएँ अलग-अलग समझती हैं: कोई शास्त्रीय ज्ञान और उसका प्रत्यक्ष अनुभव मानता है, कोई आत्मज्ञान और जगत् का ज्ञान।"
    },
    {
      "id": "3.42",
      "translation": "कहा जाता है कि इंद्रियाँ श्रेष्ठ हैं; इंद्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से श्रेष्ठ बुद्धि है, और बुद्धि से भी परे है वह।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी अर्जुन से इंद्रियों को वश में करके ज्ञान का नाश करने वाली कामना (काम) को मारने को कहा है। यहाँ वे भीतर के क्रमशः सूक्ष्म स्तरों की सीढ़ी बताते हैं: इंद्रियाँ, मन, बुद्धि (विवेक), और इन सबसे परे \"वह\" (सः)। परंपरागत व्याख्याकार \"वह\" को आत्मा मानते हैं; कुछ इसे व्यक्ति की अपनी आत्मा और कुछ परमात्मा के रूप में समझते हैं।"
    },
    {
      "id": "3.43",
      "translation": "हे महाबाहो! इस प्रकार जो बुद्धि से भी परे है उसे जानकर, अपने आप को अपने ही द्वारा स्थिर करके, कामना के रूप में रहने वाले इस दुर्जेय शत्रु को मार डालो।",
      "explanation": "अध्याय के अंत में कृष्ण अर्जुन को अपनी शिक्षा का व्यावहारिक निष्कर्ष देते हैं। इन्द्रियों, मन और बुद्धि के क्रम के बाद वे बताते हैं कि आत्मा इन सबसे परे है। इसे जानकर अर्जुन को अपने निचले स्वरूप को ऊँचे आत्म-बोध से स्थिर करके कामना (काम) रूपी दुर्जेय शत्रु को जीतना है। कुछ परंपराएँ यहाँ 'आत्मा' को व्यक्ति की अपनी उच्च चेतना मानती हैं, कुछ परम आत्मा, पर दोनों इसे संयम का साधन मानती हैं।"
    }
  ]
}
