{
  "chapter": 4,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "4.1",
      "translation": "इस अविनाशी योग का उपदेश मैंने विवस्वान को दिया था; विवस्वान ने इसे मनु को बताया, और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।",
      "explanation": "चौथे अध्याय के आरंभ में कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि जो योग (परमात्मा से जुड़कर स्थिर और सजग भाव से कर्म करने की साधना) वे अब सिखा रहे हैं, वह बहुत प्राचीन है। वे परंपरा गिनाते हैं: सूर्यदेव विवस्वान, फिर मानव जाति के आदि पुरुष मनु, फिर राजा इक्ष्वाकु। अगले श्लोक में बताया जाएगा कि यह ज्ञान कैसे आगे बढ़ा और फिर लुप्त हो गया। व्याख्याकारों में मतभेद है कि यहाँ 'योग' का मुख्य अर्थ कर्मयोग है या पूरी गीता की शिक्षा।"
    },
    {
      "id": "4.2",
      "translation": "इस प्रकार परंपरा से प्राप्त हुए इस योग को राजर्षियों ने जाना। परंतु हे परंतप, बहुत लंबा समय बीतने से वह योग इस लोक में नष्ट हो गया।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह योग विवस्वान से मनु और इक्ष्वाकु तक पहुँचा, फिर राजर्षियों (राजा होते हुए ऋषि) ने इसे जाना। समय के साथ गुरु-शिष्य की यह परंपरा टूट गई। यहाँ योग का अर्थ ज्ञान से जुड़ा निष्काम कर्म का मार्ग है; टीकाकारों में मतभेद है कि इसका ज़ोर कर्मयोग पर है या मुक्ति के व्यापक मार्ग पर। \"परंतप\" यानी शत्रुओं को तपाने वाला, अर्जुन का संबोधन है।"
    },
    {
      "id": "4.3",
      "translation": "वही यह प्राचीन योग आज मैंने तुम्हें बताया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त हो और मेरे सखा भी हो। निश्चय ही यह अत्यंत उत्तम रहस्य है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया था कि यह परंपरा समय के साथ लुप्त हो गई थी; अब वे अर्जुन को बताते हैं कि वे यह योग उसे क्यों सुना रहे हैं: क्योंकि वह उनका भक्त और सखा है। यहाँ योग का अर्थ वह साधना है जो मनुष्य को परमात्मा से जोड़ती है। रहस्य का अर्थ गहरा और गोपनीय ज्ञान है, जो हर किसी को नहीं दिया जाता। इस योग को कुछ परंपराएँ मुख्यतः निष्काम कर्म का मार्ग मानती हैं और कुछ ज्ञान या भक्ति का मार्ग।"
    },
    {
      "id": "4.4",
      "translation": "आपका जन्म बाद का है, और विवस्वान का जन्म पहले का। तब मैं यह कैसे समझूँ कि आपने ही आरंभ में इसका उपदेश दिया था?",
      "explanation": "इस अध्याय के पहले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि उन्होंने यह प्राचीन योग सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान को बताया था। अर्जुन उलझन में है, क्योंकि कृष्ण का जन्म हाल का है और विवस्वान बहुत पहले हुए थे। इसी प्रश्न से कृष्ण को अगले श्लोकों में अपने दिव्य जन्म की बात समझाने का अवसर मिलता है।"
    },
    {
      "id": "4.5",
      "translation": "हे अर्जुन, मेरे भी बहुत से जन्म बीत चुके हैं और तुम्हारे भी। हे परन्तप, उन सबको मैं जानता हूँ, पर तुम नहीं जानते।",
      "explanation": "अर्जुन ने पूछा था कि विवस्वान (सूर्य) तो बहुत पहले जन्मे थे, तो कृष्ण ने उन्हें यह योग कैसे बताया होगा। इसके उत्तर में कृष्ण कहते हैं कि दोनों के अनेक जन्म हो चुके हैं, पर उन सबकी स्मृति केवल उन्हें है, अर्जुन को नहीं। परन्तप का अर्थ है “शत्रुओं को तपाने वाला”, जो अर्जुन का संबोधन है। वैष्णव परंपराएँ इसे परमेश्वर के अवतारों की स्मृति मानती हैं, जबकि अद्वैत परंपरा इसे ईश्वर के माया से प्रकट होने के रूप में समझती है।"
    },
    {
      "id": "4.6",
      "translation": "मैं अजन्मा हूँ, मेरा स्वरूप अविनाशी है और मैं सब प्राणियों का ईश्वर हूँ। फिर भी अपनी प्रकृति को अपने वश में करके मैं अपनी माया से प्रकट होता हूँ।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि उनके और अर्जुन के अनेक जन्म बीत चुके हैं। अब वे समझाते हैं कि जो जन्म से परे है, वह भी संसार में कैसे आता है। यहाँ प्रकृति का अर्थ उनका अपना स्वभाव या सृष्टि का मूल तत्त्व है, और माया का अर्थ उनकी दिव्य सृजन-शक्ति है। अद्वैत परंपरा इसे माया के द्वारा प्रकट होना मानती है, जिससे उनका स्वरूप बदलता नहीं, जबकि वैष्णव परंपराएँ इसे उनके वास्तविक दिव्य रूप का अपनी शक्ति से प्रकट होना मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.7",
      "translation": "हे भारत, जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उभार होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा कि वे अजन्मा हैं, फिर भी अपनी प्रकृति के सहारे जन्म लेते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि ऐसा कब होता है: जब धर्म, यानी नैतिक और सृष्टि की व्यवस्था, कमज़ोर पड़ता है और अधर्म बलवान होता है। \"सृजामि\" (मैं रचता या प्रकट करता हूँ) को परंपराएँ अलग ढंग से समझती हैं। अद्वैत इसे माया से हुआ प्राकट्य मानता है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे ईश्वर का वास्तविक अवतरण मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.8",
      "translation": "सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए और धर्म को दृढ़ रूप से स्थापित करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।",
      "explanation": "अर्जुन को उत्तर देते हुए कृष्ण बताते हैं कि जब-जब धर्म (नैतिक और सृष्टि-व्यवस्था) की हानि होती है, वे क्यों प्रकट होते हैं। वे तीन उद्देश्य गिनाते हैं: साधुओं (सज्जनों) की रक्षा, दुष्कर्मियों का नाश और धर्म की पुनः स्थापना। \"संभवामि\" (प्रकट होता हूँ) को परंपराएँ अलग ढंग से समझती हैं: भक्ति-परंपराएँ इसे ईश्वर का वास्तविक अवतार मानती हैं, जबकि अद्वैत जैसी धाराएँ इसे माया के द्वारा हुआ प्राकट्य मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.9",
      "translation": "हे अर्जुन, जो मेरे जन्म और कर्म को इस प्रकार यथार्थ रूप से दिव्य जानता है, वह शरीर छोड़ने के बाद फिर जन्म नहीं लेता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा कि वे धर्म (नैतिक और सृष्टि-व्यवस्था) की स्थापना के लिए युग-युग में प्रकट होते हैं। यहाँ वे कहते हैं कि जो उनके जन्म और कर्म को साधारण नहीं, दिव्य जानता है, वह पुनर्जन्म से मुक्त होकर उन्हीं को पाता है। \"मुझे प्राप्त होना\" का अर्थ परंपराएँ अलग-अलग लेती हैं, जैसे सगुण ईश्वर से मिलन या ज्ञान से मुक्ति। श्लोक स्वयं इसका निर्णय नहीं करता।"
    },
    {
      "id": "4.10",
      "translation": "राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर, मुझमें ही मन लगाए हुए और मेरी शरण में आए हुए बहुत-से लोग ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि उनके दिव्य जन्म और कर्म को सच्चाई से जानने वाला पुनर्जन्म से मुक्त हो जाता है। यहाँ वे बताते हैं कि राग, भय और क्रोध छोड़कर तथा ज्ञानरूपी तप से शुद्ध होकर बहुत-से लोग उन तक पहुँच चुके हैं। 'मद्भाव' (मेरा स्वरूप) को कुछ परंपराएँ ईश्वर से एकता या समानता मानती हैं, और कुछ उनके प्रेमपूर्ण सान्निध्य के रूप में समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.11",
      "translation": "जो लोग जिस भाव से मेरी शरण में आते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार अपनाता हूँ। हे पार्थ, सभी मनुष्य हर प्रकार से मेरे ही मार्ग पर चलते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने उन लोगों की बात की जो राग, भय और क्रोध से मुक्त होकर उनकी शरण में आए। यहाँ वे कहते हैं कि जो जिस भाव से उनके पास आता है, वे उसी रूप में उसे स्वीकार करते हैं (भजन यानी प्रत्युत्तर में स्नेह या कृपा)। लोग जो भी मार्ग चुनें, वे अंततः उन्हीं के मार्ग का अनुसरण करते हैं। परंपराओं में इसकी व्याख्या अलग है: कुछ इसे ईश्वर की समदर्शी कृपा मानती हैं, तो कुछ साधक की अपनी भावना को फल का आधार बताती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.12",
      "translation": "जो लोग कर्मों की सिद्धि चाहते हैं, वे इस संसार में देवताओं की उपासना करते हैं; क्योंकि मनुष्य-लोक में कर्म से उत्पन्न होने वाली सिद्धि शीघ्र मिल जाती है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि लोग अलग-अलग देवताओं की उपासना क्यों करते हैं: वे अपने कर्मों का फल चाहते हैं, और मनुष्य-लोक में यह फल जल्दी मिलता है। यह पिछले श्लोक से जुड़ा है, जिसमें वे कहते हैं कि जो जैसे उनके पास आता है, वे वैसे ही उसे अपनाते हैं। कुछ टीकाकार इसे मोक्ष के ऊँचे लक्ष्य की तुलना में सीमित फल की ओर संकेत मानते हैं, जबकि अन्य इसे केवल यह कथन मानते हैं कि हर सच्ची उपासना फल देती है।"
    },
    {
      "id": "4.13",
      "translation": "गुणों और कर्मों के विभाग के अनुसार मैंने चार वर्णों की व्यवस्था रची है। उसका कर्ता होते हुए भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था (चातुर्वर्ण्य) उन्हीं की रची हुई है, और यह व्यवस्था लोगों के गुणों (प्रकृति के सत्त्व, रजस और तमस) और कर्मों के भेद पर आधारित है। कई परंपरागत टीकाकार इसे स्वभाव और योग्यता पर आधारित मानते हैं, जबकि अन्य इसे जन्म से जुड़ा समझते हैं; श्लोक स्वयं गुण और कर्म की बात कहता है। इसके रचयिता होकर भी वे अकर्ता (कर्म न करने वाले) और अविनाशी हैं, कर्म से अछूते हैं, जो अगले श्लोक की भूमिका बनता है।"
    },
    {
      "id": "4.14",
      "translation": "कर्म मुझे लिप्त नहीं करते, और कर्म के फल में मेरी कोई लालसा नहीं है। जो मुझे इस प्रकार जान लेता है, वह कर्मों से नहीं बँधता।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा कि वे चार वर्णों की रचना करने पर भी स्वयं अकर्ता हैं। यहाँ वे कारण बताते हैं: कर्म उन्हें लिप्त नहीं करते, क्योंकि उन्हें कर्मफल की कोई स्पृहा (इच्छा) नहीं है। जो इस बात को समझकर उसी भाव से कर्म करता है, वह कर्म के बंधन में नहीं पड़ता।"
    },
    {
      "id": "4.15",
      "translation": "इस प्रकार जानकर प्राचीन मुमुक्षुओं ने भी कर्म किया था। इसलिए तुम भी कर्म ही करो, जैसा पूर्वजों ने बहुत पहले से किया है।",
      "explanation": "कृष्ण अभी कह चुके हैं कि फल की इच्छा न होने से कर्म उन्हें नहीं बाँधते। यहाँ वे अर्जुन से कहते हैं कि पहले के मुमुक्षुओं (मोक्ष चाहने वालों) ने भी यह समझकर कर्म किया, इसलिए अर्जुन को भी अपना कर्म करना चाहिए। अद्वैत परंपरा इसे मन की शुद्धि का साधन मानती है, जबकि भक्ति और कर्मयोग की व्याख्याएँ कर्म को ही स्वयं मार्ग मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.16",
      "translation": "कर्म क्या है और अकर्म क्या है — इस विषय में तो विवेकी जन भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुम्हें वह कर्म समझाऊँगा, जिसे जानकर तुम अशुभ से मुक्त हो जाओगे।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को कर्म का स्वरूप समझा रहे हैं, ताकि वह कर्म से हटने के बजाय सही ढंग से कर्म करे। वे कहते हैं कि कर्म और अकर्म क्या हैं, यह समझने में ज्ञानी (कवयः) भी उलझ जाते हैं। वे इसे स्पष्ट करने का वचन देते हैं, जिससे अर्जुन \"अशुभ\" से मुक्त हो सके; सामान्यतः इसका अर्थ जन्म-मरण का बंधन और दुःख माना जाता है।"
    },
    {
      "id": "4.17",
      "translation": "कर्म के विषय में भी समझना आवश्यक है, विकर्म के विषय में भी समझना आवश्यक है, और अकर्म के विषय में भी समझना आवश्यक है; क्योंकि कर्म की गति गहन है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कर्म समझाने का वचन दिया, जिससे अर्जुन अशुभ से मुक्त हो सके। यहाँ वे कहते हैं कि तीन बातें समझनी चाहिए: कर्म, विकर्म (निषिद्ध या अनुचित कर्म) और अकर्म। साथ ही वे कहते हैं कि कर्म की गति गहन और सूक्ष्म है। अकर्म का अर्थ परंपराओं में भिन्न है; कहीं इसे कर्म का अभाव माना गया है, तो कहीं फल की आसक्ति के बिना किया गया कर्म।"
    },
    {
      "id": "4.18",
      "translation": "जो कर्म में अकर्म को देखता है और अकर्म में कर्म को देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है। वही योग में स्थित है और सम्पूर्ण कर्म करने वाला है।",
      "explanation": "कृष्ण कर्म की गहन गति को समझा रहे हैं। \"कर्म में अकर्म\" का अर्थ है कि फल की आसक्ति (सङ्ग) के बिना किया गया कर्म व्यक्ति को बाँधता नहीं; \"अकर्म में कर्म\" का अर्थ है कि केवल निष्क्रिय बैठना भी इच्छा और अहंकार से प्रेरित हो सकता है। परंपराओं में थोड़ा भेद है: अद्वैत व्याख्या आत्मा के अकर्ता होने पर बल देती है, जबकि कर्मयोग और भक्ति की व्याख्याएँ अनासक्त भाव से कर्म करने पर।"
    },
    {
      "id": "4.19",
      "translation": "जिसके सारे कार्य कामना और संकल्प से रहित होते हैं, और जिसके कर्म ज्ञान की अग्नि में जल चुके हैं, उसे ज्ञानीजन पंडित कहते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन आगे बढ़ाते हैं जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है। वह कर्म करता है, पर कामना (काम) और फल की स्वार्थपूर्ण योजना (संकल्प) के बिना। ज्ञान की अग्नि में कर्म \"जल जाते\" हैं, यानी वे बाँधते नहीं। टीकाकार इस ज्ञान को आत्मबोध या विवेकपूर्ण आचरण के रूप में अलग-अलग ढंग से समझते हैं, पर सब मानते हैं कि यह कर्म को आसक्ति से मुक्त करता है।"
    },
    {
      "id": "4.20",
      "translation": "कर्म के फल की आसक्ति छोड़कर, सदा तृप्त और किसी आश्रय पर निर्भर न रहने वाला मनुष्य कर्म में पूरी तरह लगा हुआ होने पर भी वास्तव में कुछ नहीं करता।",
      "explanation": "कृष्ण उस ज्ञानी का वर्णन जारी रखते हैं जो कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं। वह फल की आसक्ति (फलासङ्ग) छोड़ चुका है, भीतर से सदा संतुष्ट (नित्यतृप्त) है और किसी बाहरी सहारे पर निर्भर नहीं (निराश्रय) है। निराश्रय का अर्थ कुछ टीकाकार संसार के सहारों से मुक्ति लेते हैं, तो कुछ कर्तापन या फल के दावे पर टिके न रहना। दोनों ही अर्थों में वह कर्म करता है, पर कर्म उसे बाँधता नहीं।"
    },
    {
      "id": "4.21",
      "translation": "जो आशाओं से मुक्त है, जिसने मन और अपने आप को वश में कर लिया है और सब संग्रह त्याग दिया है, उसे केवल शरीर से कर्म करते हुए कोई दोष नहीं लगता।",
      "explanation": "कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं। उसमें फल की कामना (आशी) नहीं होती, मन संयमित रहता है और वह वस्तुओं के संग्रह (परिग्रह) से चिपकता नहीं। \"केवल शरीर से कर्म\" का अर्थ कुछ टीकाकार शरीर-निर्वाह के लिए आवश्यक क्रियाएँ मानते हैं, तो कुछ कर्तापन के भाव के बिना किया गया कर्म। दोनों ही मतों में उसे पाप या बंधन (किल्बिष) नहीं लगता।"
    },
    {
      "id": "4.22",
      "translation": "जो अपने आप मिल जाने वाली चीज़ से संतुष्ट रहता है, द्वंद्वों से परे है, ईर्ष्या से रहित है, और सफलता तथा असफलता में समान रहता है, वह कर्म करते हुए भी बंधन में नहीं पड़ता।",
      "explanation": "कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो कर्म करते हुए भी उससे बँधता नहीं। वह बिना माँगे जो मिले उसमें संतुष्ट (यदृच्छा-लाभ) रहता है, सुख-दुख जैसे द्वंद्वों से अप्रभावित रहता है और सफलता-असफलता में समभाव रखता है। उसके कर्म के पीछे ईर्ष्या या लालसा नहीं होती, इसलिए कर्म उसे बाँधने वाला फल नहीं देता।"
    },
    {
      "id": "4.23",
      "translation": "जिसकी आसक्ति मिट चुकी है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थिर है और जो यज्ञ के भाव से कर्म करता है, उसके सारे कर्म पूरी तरह विलीन हो जाते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो फल से बँधे बिना कर्म करता है। ऐसा व्यक्ति आसक्ति (सङ्ग) से मुक्त, ज्ञान में स्थिर होता है और कर्म को यज्ञ, यानी स्वार्थ रहित अर्पण, की तरह करता है। उसके कर्म बंधन नहीं बनते और विलीन हो जाते हैं। परंपराओं में मतभेद है कि यहाँ यज्ञ कर्मकांडीय कर्तव्य है या कोई भी निःस्वार्थ कर्म; अगला श्लोक इसी विचार को आगे बढ़ाता है।"
    },
    {
      "id": "4.24",
      "translation": "अर्पण ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है, और ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्म द्वारा ही आहुति दी गई है। जो कर्म को ब्रह्म मानकर उसमें समाधिस्थ है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त करता है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा कि जो आसक्ति से मुक्त होकर यज्ञ के भाव से कर्म करता है, उसके कर्म उसे बाँधते नहीं। यहाँ वे उस यज्ञ का स्वरूप बताते हैं: अर्पण का साधन, हवि, अग्नि और आहुति देने वाला, सब ब्रह्म (परम सत्य) ही हैं। जो कर्म में इसी दृष्टि से लीन रहता है, वह ब्रह्म को पाता है। अद्वैत परंपरा इसे सब कुछ की अभेदता के रूप में पढ़ती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे सबको परमात्मा का और उसी पर आश्रित मानने के रूप में देखती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.25",
      "translation": "कुछ योगी केवल देवताओं के लिए किए जाने वाले यज्ञ में ही लगे रहते हैं। दूसरे लोग ब्रह्म की अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ की आहुति देते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी ऐसा यज्ञ बताया जिसमें कर्म का हर अंग ब्रह्म ही माना जाता है। अब वे साधकों के अलग-अलग यज्ञ गिनाते हैं, पहले देवताओं के लिए किया जाने वाला कर्मकांड और फिर एक सूक्ष्म यज्ञ। दूसरी पंक्ति की व्याख्या अलग-अलग है: अद्वैत परंपरा इसे आत्मा को ब्रह्म में अर्पित करना मानती है, जबकि अन्य परंपराएँ इसे एक उपासना-कर्म द्वारा परमात्मा की उपासना मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.26",
      "translation": "कुछ लोग कान आदि इंद्रियों को संयम की अग्नियों में आहुति के रूप में अर्पित करते हैं। दूसरे लोग शब्द आदि विषयों को इंद्रियों की अग्नियों में अर्पित करते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यज्ञ के अनेक प्रकार गिनाते हुए यहाँ बाहरी अग्नि-कर्म के बजाय आंतरिक साधनाओं का वर्णन करते हैं। पहले प्रकार में साधक इंद्रियों पर संयम रखता है, ताकि वे बाहर न भागें। दूसरे में शब्द जैसे विषय इंद्रियों तक आते हैं, पर साधक उन्हें आहुति मानकर राग-द्वेष से प्रतिक्रिया नहीं करता। टीकाकार इन दोनों के संबंध को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं, जैसे एक को इंद्रिय-निग्रह और दूसरे को अनासक्त भाव से विषय-सेवन, पर दोनों को आत्म-अनुशासन का रूप मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "4.27",
      "translation": "दूसरे लोग इन्द्रियों के सारे कर्मों को और प्राण के कर्मों को भी ज्ञान से प्रज्वलित आत्म-संयम रूपी योग की अग्नि में अर्पित कर देते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ अलग-अलग प्रकार के यज्ञ गिना रहे हैं, यानी ऐसी साधनाएँ जो साधक को शुद्ध करती हैं। इस श्लोक में इन्द्रियों के सभी कार्य और प्राण की सभी क्रियाएँ ज्ञान से जगी हुई आत्म-संयम की भीतरी अग्नि में अर्पित की जाती हैं। टीकाकार इसे ध्यान में इन्द्रियों और प्राण को समेट लेने की साधना भी मानते हैं और पूरे जीवन के आंतरिक अनुशासन के रूप में भी पढ़ते हैं।"
    },
    {
      "id": "4.28",
      "translation": "कठोर व्रत वाले साधकों में कुछ धन-साधनों का यज्ञ करते हैं, कुछ तप का, कुछ योग का, और कुछ दूसरे स्वाध्याय और ज्ञान का यज्ञ करते हैं।",
      "explanation": "श्रीकृष्ण यहाँ अलग-अलग प्रकार के यज्ञ, यानी अनुशासित समर्पण के कर्म, गिनाते जा रहे हैं। इस श्लोक में वे द्रव्य (धन-साधन) का दान, तप, योग, तथा स्वाध्याय (शास्त्र-अध्ययन) और ज्ञान की साधना का उल्लेख करते हैं। सबमें समान बात यह है कि साधक कठोर व्रत (संशितव्रत) के साथ अपने आपको समर्पित करता है।"
    },
    {
      "id": "4.29",
      "translation": "कुछ दूसरे साधक प्राण को अपान में और अपान को प्राण में अर्पित करते हैं। वे प्राण और अपान दोनों की गति को रोककर प्राणायाम में ही लगे रहते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यज्ञ, यानी पूजा के रूप में अर्पित किए जाने वाले अनुशासित साधनों, के अलग-अलग प्रकार गिना रहे हैं। यहाँ वे प्राणायाम करने वालों का वर्णन करते हैं। ये साधक भीतर आने वाली और बाहर जाने वाली श्वास को एक-दूसरे में अर्पित करते हैं, फिर दोनों को रोककर श्वास-नियमन (प्राणायाम) में स्थिर हो जाते हैं। प्राण और अपान के अर्थ तथा श्वासों के क्रम को लेकर परंपराओं में थोड़ा मतभेद है, पर अधिकतर इसे वास्तविक योग-साधना का वर्णन मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "4.30",
      "translation": "कुछ और लोग, जो आहार को नियमित रखते हैं, प्राणों को प्राणों में ही अर्पित करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं, और यज्ञ के द्वारा इनके दोष नष्ट हो चुके हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ यज्ञ, यानी अनुशासित अर्पण के अनेक रूप गिना रहे हैं। इस श्लोक में वे उन साधकों का उल्लेख करते हैं जो भोजन पर संयम रखते हैं और प्राणों को प्राणों में अर्पित करते हैं। वे कहते हैं कि ये सब यज्ञ का मर्म जानते हैं और यज्ञ से इनके दोष (कल्मष) धुल जाते हैं। टीकाकारों में मतभेद है: कुछ इसे विशेष प्राणायाम की क्रिया मानते हैं, तो कुछ इसे संयम का सामान्य प्रतीक।"
    },
    {
      "id": "4.31",
      "translation": "जो लोग यज्ञ से बचे हुए अमृत का भोग करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ, जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं है, फिर दूसरा लोक कैसे होगा?",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ अलग-अलग प्रकार के यज्ञ (कर्तव्य के रूप में किया गया अर्पण और संयम) गिनाने के बाद निष्कर्ष कह रहे हैं। \"यज्ञ से बचा अमृत\" वह है जो अर्पण करने के बाद शेष रहता है, यानी पहले देना और फिर बचे हुए से जीना। ऐसे लोग सनातन ब्रह्म (परम सत्य) को पाते हैं, जबकि जो कुछ अर्पित नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं है, फिर परलोक की तो बात ही क्या। व्याख्याकार इस \"अमृत\" को अलग-अलग रूपों में समझते हैं: कोई इसे यज्ञ का प्रसाद मानता है, कोई ज्ञान, तो कोई निष्काम कर्म की भावना।"
    },
    {
      "id": "4.32",
      "translation": "इस प्रकार अनेक तरह के यज्ञ ब्रह्म के मुख में फैले हुए हैं। उन सबको कर्म से उत्पन्न जानो; ऐसा जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी अनेक प्रकार के यज्ञ गिनाए हैं, जैसे कर्मकांड, इंद्रिय-संयम और प्राण-साधना। यहाँ वे कहते हैं कि ये सब \"ब्रह्म के मुख\" में फैले हैं; इसे कोई वेद के अर्थ में समझता है, तो कोई ब्रह्म द्वारा आहुति स्वीकार करने के अर्थ में। ये सब कर्म से उत्पन्न हैं, और यह जान लेने से अर्जुन कर्म के बंधन से मुक्त हो जाएगा।"
    },
    {
      "id": "4.33",
      "translation": "हे परन्तप, द्रव्यों से किए जाने वाले यज्ञ की तुलना में ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है। क्योंकि हे पार्थ, सारे कर्म बिना किसी शेष के ज्ञान में आकर पूर्ण हो जाते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी अनेक प्रकार के यज्ञों, यानी अनुष्ठानों और साधनाओं, का वर्णन किया है, जो कर्म-जीवन का अंग हैं। यहाँ वे कहते हैं कि द्रव्यों से किए गए यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि सभी कर्म अंत में ज्ञान में ही पूर्ण होते हैं। इस ज्ञान के अर्थ पर परंपराएँ भिन्न हैं: कुछ इसे आत्म-साक्षात्कार मानती हैं, तो कुछ ऐसी समझ जो कर्म को निःस्वार्थ और भक्तिमय बनाती है।"
    },
    {
      "id": "4.34",
      "translation": "उस ज्ञान को विनम्रता से प्रणाम करके, जिज्ञासा से प्रश्न करके और सेवा करके जान लो। तत्त्व को देखने वाले ज्ञानी जन तुम्हें उस ज्ञान का उपदेश देंगे।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा कि ज्ञान-यज्ञ द्रव्यमय यज्ञ से श्रेष्ठ है। अब वे अर्जुन को बताते हैं कि यह ज्ञान कैसे मिलता है: विनम्र प्रणाम (प्रणिपात), सच्चे प्रश्न (परिप्रश्न) और सेवा द्वारा उन गुरुओं से, जिन्होंने तत्त्व को साक्षात् देखा है। ऐसे गुरु की पहचान को लेकर परंपराओं में भिन्न मत हैं, पर सभी मानते हैं कि सीखने के लिए नम्रता और ईमानदार जिज्ञासा चाहिए।"
    },
    {
      "id": "4.35",
      "translation": "हे पाण्डव, इसे जान लेने पर तुम फिर कभी इस प्रकार के मोह में नहीं पड़ोगे। इसी ज्ञान से तुम समस्त प्राणियों को बिना किसी अपवाद के अपनी आत्मा में और फिर मुझमें देखोगे।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में ज्ञानी गुरुओं से सीखने की बात कही गई थी; यहाँ कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि वह ज्ञान उसे क्या देगा। इससे मोह मिट जाएगा, वही भ्रम जिसने उसे कर्तव्य के विषय में असमंजस में डाल रखा था। तब वह सब प्राणियों को अपनी आत्मा में और कृष्ण में देखेगा। इसकी व्याख्या में परंपराएँ भिन्न हैं: कुछ इसे आत्मा और परमात्मा की एकता मानती हैं, कुछ सब प्राणियों का ईश्वर में आश्रित होना।"
    },
    {
      "id": "4.36",
      "translation": "यदि तुम सब पापियों में भी सबसे बड़े पापी हो, तब भी ज्ञान की नौका से ही तुम सारे पाप को पार कर जाओगे।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को भरोसा दिला रहे हैं कि आत्मा और परमात्मा का ज्ञान इतना सशक्त है कि कोई भी पिछला पाप उसे रोक नहीं सकता। वे ज्ञान को ऐसी नौका कहते हैं जो पाप और दुख (वृजिन) के सागर से पार ले जाती है। अद्वैत परंपरा इस ज्ञान को मुक्तिदायी आत्मबोध मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ ज्ञान के साथ कृष्ण के प्रति समर्पण पर बल देती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.37",
      "translation": "हे अर्जुन, जैसे जलती हुई आग ईंधन को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान की अग्नि सभी कर्मों को राख कर देती है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन से ज्ञान की महिमा कह रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने कहा कि ज्ञान की नौका से मनुष्य सारे पापों के पार जा सकता है। यहाँ \"कर्मों को भस्म करने\" का अर्थ है कि कर्मों के बाँधने वाले फल मिट जाते हैं। अद्वैत परंपरा इसे आत्मज्ञान से संचित कर्मफल के नष्ट होने के रूप में समझती है, जबकि भक्ति और कर्मयोग की परंपराएँ इसे ऐसे ज्ञान के रूप में पढ़ती हैं जो कर्म करते हुए भी उसके बंधन से मुक्त रखता है।"
    },
    {
      "id": "4.38",
      "translation": "इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निश्चय ही कुछ नहीं है। जो योग में सिद्ध हो चुका है, वह समय आने पर उस ज्ञान को अपने भीतर, अपनी आत्मा में स्वयं पा लेता है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी ज्ञान को ऐसी अग्नि कहा है जो कर्मों के फलों को भस्म कर देती है, और यहाँ उसे सबसे बड़ा पवित्र करने वाला बताते हैं। \"योगसंसिद्ध\" वह है जो निष्काम कर्म और ध्यान के अभ्यास में परिपक्व हो गया है; वह समय के साथ यह ज्ञान अपनी आत्मा में पा लेता है। यहाँ \"योग\" के अर्थ पर परंपराएँ भिन्न हैं: कुछ इसे ज्ञान की तैयारी के रूप में कर्मयोग मानती हैं, तो कुछ इसे जीवन और ध्यान के व्यापक अनुशासन के रूप में देखती हैं।"
    },
    {
      "id": "4.39",
      "translation": "जो श्रद्धा रखता है, ज्ञान पाने में तत्पर रहता है और अपनी इंद्रियों को वश में रखता है, वह ज्ञान पाता है; और ज्ञान पा लेने पर वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है।",
      "explanation": "कृष्ण ज्ञान की महिमा बताते हुए अर्जुन को समझा रहे हैं। वे ज्ञान पाने की तीन शर्तें गिनाते हैं: श्रद्धा, उसमें तत्परता (तत्परः), और इंद्रियों का संयम (संयतेन्द्रियः)। फल है परम शांति, जो शीघ्र मिलती है। \"तत्परः\" में \"तत्\" से गुरु, ज्ञान या ईश्वर में से क्या लिया जाए, इस पर परंपराओं में मतभेद है।"
    },
    {
      "id": "4.40",
      "translation": "जो अज्ञानी है, जिसमें श्रद्धा नहीं है और जिसका मन संशय से भरा है, वह नष्ट हो जाता है। संशय में डूबे हुए मनुष्य के लिए न यह लोक है, न परलोक और न ही सुख।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि श्रद्धावान और संयमी व्यक्ति ज्ञान पाकर परम शान्ति पाता है। यहाँ वे अर्जुन को उसके उलट स्थिति से सावधान करते हैं: अज्ञान, श्रद्धा का अभाव और संशय, जिनमें सबसे हानिकारक संशय है। संशय में डूबा मन न कर्म में स्थिर हो पाता है, न साधना में, इसलिए उसे कहीं भी सुख या आश्रय नहीं मिलता। 'नष्ट होने' को कुछ व्याख्याकार आध्यात्मिक पतन मानते हैं और कुछ जीवन के सच्चे लक्ष्य से चूक जाना।"
    },
    {
      "id": "4.41",
      "translation": "हे धनञ्जय! जिसने योग के द्वारा कर्मों का त्याग कर दिया है, जिसके संशय ज्ञान से कट चुके हैं और जो आत्मा में स्थित है, उस व्यक्ति को कर्म नहीं बाँधते।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन से कर्म और ज्ञान की अपनी शिक्षा समेट रहे हैं; इससे ठीक पहले उन्होंने कहा था कि संशय से भरा मनुष्य नष्ट हो जाता है। यहाँ वे मुक्त व्यक्ति का वर्णन करते हैं: जिसने योग (अनुशासित साधना) के द्वारा कर्मों का त्याग किया है, जिसके संशय ज्ञान से कट गए हैं और जो आत्मा में स्थित है। ऐसा व्यक्ति कर्म करता है, पर कर्म उसे बाँधते नहीं। कर्मयोग की परंपरा में इस 'त्याग' का अर्थ कर्मफल और उसकी आसक्ति का त्याग माना जाता है, जबकि अद्वैत की व्याख्या में ज्ञान के द्वारा स्वयं कर्म का त्याग।"
    },
    {
      "id": "4.42",
      "translation": "इसलिए, हे भारत, अज्ञान से उत्पन्न और हृदय में बैठे अपने इस संशय को ज्ञान की तलवार से काट डालो। योग का आश्रय लो और उठ खड़े हो।",
      "explanation": "अध्याय के अंत में कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अब जो सिखाया गया है, उसके अनुसार कर्म करो। अज्ञान से जन्मा संशय हृदय में बैठा है, और ज्ञान उसे काटने वाली तलवार है। यहाँ योग को प्रायः कर्मयोग समझा जाता है, यानी फल की आसक्ति छोड़कर किया गया अनुशासित कर्म, जबकि अद्वैत की व्याख्या में आत्मज्ञान को केंद्र में रखा जाता है। \"उठ खड़े हो\" अर्जुन के सामने खड़े युद्ध के कर्तव्य की ओर संकेत करता है।"
    }
  ]
}
