{
  "chapter": 5,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "5.1",
      "translation": "हे कृष्ण, आप कर्मों के संन्यास की प्रशंसा करते हैं और फिर कर्मयोग की भी। इन दोनों में जो एक निश्चित रूप से अधिक कल्याणकारी हो, वही मुझे स्पष्ट बताइए।",
      "explanation": "अर्जुन उलझन में है, क्योंकि कृष्ण ने कर्मों के त्याग (संन्यास) और योग, यानी फल की आसक्ति छोड़कर किए जाने वाले कर्म, दोनों की बात की है। वह पूछता है कि इनमें से कौन-सा मार्ग सच में श्रेय (परम कल्याण) की ओर ले जाता है। कृष्ण इसका उत्तर अगले श्लोक में देते हैं।"
    },
    {
      "id": "5.2",
      "translation": "कर्मों का संन्यास और कर्मयोग, दोनों ही परम कल्याण देने वाले हैं। परंतु इन दोनों में कर्मों के संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है।",
      "explanation": "अर्जुन ने अभी पूछा था कि कर्मों का त्याग (संन्यास) श्रेष्ठ है या कर्मयोग, यानी फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करना। कृष्ण कहते हैं कि दोनों ही मोक्ष रूपी परम कल्याण (निःश्रेयस) की ओर ले जाते हैं, फिर भी वे कर्मयोग को श्रेष्ठ बताते हैं। परंपराएँ इसे अलग ढंग से समझती हैं: कुछ दोनों को एक ही लक्ष्य के दो मार्ग मानती हैं, तो कुछ कर्मयोग को संन्यास की तैयारी मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.3",
      "translation": "जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी चीज़ की कामना करता है, उसे सदा का संन्यासी जानो। हे महाबाहो, द्वंद्वों से मुक्त ऐसा मनुष्य सहज ही बंधन से छूट जाता है।",
      "explanation": "अर्जुन ने पूछा था कि संन्यास श्रेष्ठ है या कर्म। कृष्ण कहते हैं कि सच्चा संन्यास भीतर की अवस्था है: जो द्वेष और कामना से रहित है और सुख-दुःख जैसे द्वंद्वों से अप्रभावित रहता है, वह कर्म करते हुए भी संन्यासी है। ऐसा व्यक्ति बिना कठिनाई के कर्म और पुनर्जन्म के बंधन से मुक्त हो जाता है।"
    },
    {
      "id": "5.4",
      "translation": "बालबुद्धि लोग ही सांख्य और योग को अलग-अलग बताते हैं, पंडित नहीं। किसी एक में भी भली-भाँति स्थित हुआ व्यक्ति दोनों का फल पा लेता है।",
      "explanation": "अध्याय के आरंभ में अर्जुन ने पूछा था कि कर्मों का त्याग श्रेष्ठ है या कर्मयोग। उसी का उत्तर देते हुए कृष्ण कहते हैं कि सांख्य (ज्ञान और संन्यास का मार्ग) और योग (फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करने का मार्ग) को एक-दूसरे का विरोधी मानना अपरिपक्व समझ है। दोनों का फल एक ही है, यानी मुक्ति। परंपराएँ इसे अलग ढंग से पढ़ती हैं: कुछ के अनुसार कर्मयोग ज्ञान की तैयारी है और अंत में ज्ञान ही मुक्ति देता है, जबकि अन्य दोनों को समान रूप से स्वतंत्र मार्ग मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.5",
      "translation": "सांख्य को मानने वाले जिस स्थान को पाते हैं, कर्मयोग के अनुयायी भी उसी तक पहुँचते हैं। जो सांख्य और योग को एक देखता है, वही सचमुच देखता है।",
      "explanation": "अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए कृष्ण कहते हैं कि सांख्य (ज्ञान और संन्यास का मार्ग) और योग (आसक्ति छोड़कर कर्म करने का मार्ग) दोनों एक ही परम स्थान तक ले जाते हैं। इसलिए जो इन्हें एक रूप में देखता है, उसकी दृष्टि सच्ची है। परंपराएँ इसे अलग ढंग से पढ़ती हैं: कोई इन्हें एक लक्ष्य के दो रास्ते मानता है, कोई एक ही मार्ग की दो अवस्थाएँ।"
    },
    {
      "id": "5.6",
      "translation": "परन्तु हे महाबाहो, योग के बिना संन्यास को पाना कठिन और दुःखदायी है। योग से युक्त मुनि शीघ्र ही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।",
      "explanation": "अर्जुन ने पूछा था कि कर्मों का त्याग (संन्यास) श्रेष्ठ है या कर्मयोग। इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए कृष्ण कहते हैं कि योग, यानी फल की आसक्ति छोड़कर समभाव से किया गया कर्म और मन का अनुशासन, अपनाए बिना संन्यास साधना कठिन है। जो मुनि (मननशील साधक) योग से युक्त होता है, वह शीघ्र ही ब्रह्म (परम सत्य) तक पहुँचता है। शंकराचार्य की परंपरा इस योग को मन को शुद्ध करने वाला साधन मानकर संन्यास और ज्ञान की ओर ले जाने वाला पढ़ती है, जबकि रामानुज जैसी परंपराएँ कर्मयोग को ही आत्मा की अनुभूति का सीधा मार्ग समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.7",
      "translation": "जो योग में स्थित है, जिसका अंतःकरण शुद्ध है, जिसने अपने मन को वश में कर लिया है और इंद्रियों को जीत लिया है, और जिसकी आत्मा सब प्राणियों की आत्मा के साथ एक हो गई है, वह कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता।",
      "explanation": "अर्जुन ने पूछा था कि कर्मसंन्यास श्रेष्ठ है या कर्मयोग (फल की चाह के बिना कर्म करने का अभ्यास); कृष्ण कर्मयोग की महिमा बताते हुए आगे कहते हैं। जो व्यक्ति शुद्ध, संयमी और सब प्राणियों में अपने को देखने वाला है, वह कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता, यानी कर्मों का बंधन उस पर नहीं लगता। टीकाकार इसे कर्मयोगी का वर्णन भी मानते हैं और आत्मज्ञानी का भी; श्लोक स्वयं इसका निर्णय नहीं करता।"
    },
    {
      "id": "5.8",
      "translation": "“मैं कुछ भी नहीं करता,” — ऐसा तत्त्व को जानने वाला योग में स्थित व्यक्ति मानता है, चाहे वह देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, सोता और साँस लेता हो…",
      "explanation": "कृष्ण योग में स्थित उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो आत्मा के सत्य (तत्त्व) को जानता है। देखने, खाने, साँस लेने जैसे सामान्य कर्म करते हुए भी वह स्वयं को कर्ता नहीं मानता। यह वाक्य अगले श्लोक तक चलता है, जहाँ बताया गया है कि इन्द्रियाँ ही अपने विषयों में व्यवहार करती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.9",
      "translation": "…बोलते, छोड़ते, पकड़ते, यहाँ तक कि आँखें खोलते और मूँदते हुए भी, वह यही समझता है कि इंद्रियाँ ही अपने विषयों के बीच बरत रही हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ पिछले श्लोक में शुरू हुआ वाक्य पूरा करते हैं। योग में स्थित तत्त्वज्ञानी (युक्त तत्त्ववित्) बोलने, पकड़ने या पलक झपकाने जैसे साधारण कर्मों में भी स्वयं को कर्ता नहीं मानता। वह देखता है कि इंद्रियाँ ही अपने विषयों (इंद्रियार्थ) के बीच काम कर रही हैं। टीकाकार इसे अलग ढंग से पढ़ते हैं: कुछ इसे आत्मा की अकर्तृता में स्थित पुरुष का अनुभव मानते हैं, और कुछ कर्मयोगी के लिए अनासक्ति का व्यावहारिक भाव।"
    },
    {
      "id": "5.10",
      "translation": "जो व्यक्ति अपने कर्मों को ब्रह्म में अर्पित करके और आसक्ति को छोड़कर कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता, जैसे कमल का पत्ता जल से लिप्त नहीं होता।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि कोई व्यक्ति संसार में पूरी तरह कर्म करते हुए भी भीतर से मुक्त कैसे रह सकता है। ऐसा व्यक्ति आसक्ति (सङ्ग) छोड़कर कर्म करता है और उन्हें ब्रह्म, यानी परम सत्य, को अर्पित कर देता है, इसलिए पाप उससे चिपकता नहीं, जैसे कमल के पत्ते पर जल नहीं ठहरता। टीकाकार यहाँ \"ब्रह्म\" का अर्थ अलग-अलग लेते हैं: कुछ इसे परमेश्वर मानते हैं जिन्हें कर्म समर्पित होते हैं, और कुछ सर्वव्यापी परम तत्त्व, जिसमें सारे कर्म घटित होते हैं।"
    },
    {
      "id": "5.11",
      "translation": "योगीजन आसक्ति छोड़कर, शरीर, मन, बुद्धि और यहाँ तक कि केवल इंद्रियों से भी, आत्मशुद्धि के लिए कर्म करते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण बता रहे हैं कि मनुष्य बंधन में पड़े बिना कैसे कर्म कर सकता है। योगी शरीर, मन, बुद्धि और इंद्रियों से कर्म करते हैं, पर आसक्ति (सङ्ग) के बिना, और उनका लक्ष्य निजी लाभ नहीं, अंतःकरण की शुद्धि (आत्मशुद्धि) होता है। \"केवलैः\" को कुछ व्याख्याकार \"केवल इंद्रियों से\", यानी मन की आसक्ति के बिना होने वाले सहज शारीरिक कर्म के अर्थ में लेते हैं; अन्य इसे \"शुद्ध\", यानी \"मैं और मेरा\" के भाव से रहित साधनों के अर्थ में समझते हैं।"
    },
    {
      "id": "5.12",
      "translation": "जो व्यक्ति योग में स्थिर है, वह कर्मों के फल की आसक्ति छोड़कर स्थिर और परम शांति पाता है। जो योग में स्थिर नहीं है, वह कामना से प्रेरित होकर फल में आसक्त रहता है और बंधन में पड़ जाता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि योगी आसक्ति छोड़कर कर्म करते हैं; यहाँ वे अर्जुन को दो स्थितियों का अंतर समझाते हैं। योग में स्थिर (युक्त) व्यक्ति फल की चाह छोड़कर शांति पाता है, जबकि अस्थिर (अयुक्त) व्यक्ति इच्छा से प्रेरित होकर फल से बँधा रहता है। \"नैष्ठिकी शांति\" का अर्थ कुछ परंपराओं में ज्ञान में पूर्ण स्थिति से मिलने वाली शांति है, और कुछ में कर्मयोग की निष्ठा से मिलने वाली शांति।"
    },
    {
      "id": "5.13",
      "translation": "जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, वह देहधारी सब कर्मों को मन से त्यागकर नौ द्वारों वाले नगर में सुखपूर्वक टिका रहता है; न वह स्वयं कुछ करता है, न किसी से करवाता है।",
      "explanation": "कृष्ण उस साधक का वर्णन जारी रखते हैं जो फल की आसक्ति छोड़कर संयमित रहता है। \"नौ द्वारों वाला नगर\" शरीर है, जिसमें नौ छिद्र माने गए हैं। ऐसा व्यक्ति भीतर से कर्तापन (कर्तृत्व) छोड़ देता है, इसलिए शरीर के कार्य करते रहने पर भी वह शांत रहता है। इस आंतरिक संन्यास को कुछ परंपराएँ बाहरी कर्म के साथ संभव मानती हैं और कुछ औपचारिक संन्यास की ओर संकेत मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.14",
      "translation": "प्रभु लोगों के लिए न कर्तापन रचता है, न कर्मों को, और न कर्म तथा उसके फल के संयोग को। यह तो स्वभाव ही है जो अपना काम करता रहता है।",
      "explanation": "कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन आगे बढ़ा रहे हैं जिसने कर्तापन का भाव छोड़ दिया है। प्रभु हमारे भीतर \"मैं कर्ता हूँ\" का भाव (कर्तृत्व), विशेष कर्म, या कर्म और फल का संबंध नहीं रचते; ये सब स्वभाव, यानी प्रकृति और उसके गुणों की क्रिया से उठते हैं। कुछ व्याख्याकार \"प्रभु\" को देह की स्वामिनी आत्मा मानते हैं, जो स्वयं कुछ नहीं करती, तो कुछ उसे ईश्वर मानते हैं, जो जीवों के कर्मों के लिए उत्तरदायी नहीं है। दोनों इस पर सहमत हैं कि कर्तापन ऊपर से थोपा हुआ नहीं है।"
    },
    {
      "id": "5.15",
      "translation": "सर्वव्यापी प्रभु न किसी के पाप को ग्रहण करता है और न किसी के पुण्य को। ज्ञान अज्ञान से ढका हुआ है, इसी कारण प्राणी मोह में पड़ जाते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि प्रभु लोगों के कर्तापन और कर्मों की रचना नहीं करता। यहाँ वे कहते हैं कि सर्वव्यापी (विभु) किसी का पाप या पुण्य (सुकृत) अपने ऊपर नहीं लेता। अज्ञान ज्ञान को ढक लेता है, इसलिए प्राणी भ्रमित होते हैं। कुछ व्याख्याकार \"विभु\" को परमेश्वर मानते हैं, तो कुछ उसे आत्मा, जो कर्म से अछूती रहती है।"
    },
    {
      "id": "5.16",
      "translation": "परन्तु जिन लोगों का वह अज्ञान आत्मा के ज्ञान से नष्ट हो गया है, उनके लिए वह ज्ञान सूर्य की तरह उस परम तत्त्व को प्रकट कर देता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि अज्ञान ज्ञान को ढक लेता है और इसी से प्राणी मोह में पड़ते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि जब आत्म-ज्ञान से यह अज्ञान मिट जाता है, तब वह ज्ञान सूर्य की तरह उस परम तत्त्व को प्रकाशित कर देता है। 'तत्परम्' यानी उस परम तत्त्व को अद्वैत परंपरा निराकार ब्रह्म के रूप में पढ़ती है, जबकि भक्ति परंपराएँ उसे परम पुरुष, यानी भगवान के रूप में समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.17",
      "translation": "जिनकी बुद्धि उसी में लगी है, जिनका आत्मभाव उसी में रमा है, जो उसी में निष्ठा रखते हैं और उसी को परम लक्ष्य मानते हैं, ज्ञान से जिनके सारे दोष धुल चुके हैं, वे उस अवस्था को प्राप्त होते हैं जहाँ से लौटना नहीं होता।",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ा रहे हैं, जहाँ आत्मज्ञान को सूर्य की तरह प्रकाशित करने वाला कहा गया है। \"तत्\" का अर्थ वह परम सत्य है, यानी ब्रह्म या आत्मा, जिसे ज्ञान से जाना जाता है। जिनकी बुद्धि, भाव, निष्ठा और लक्ष्य सब उसी में स्थित हैं, उनके दोष (कल्मष) ज्ञान से धुल जाते हैं और वे मोक्ष पाते हैं, जहाँ से पुनर्जन्म में वापसी नहीं होती (अपुनरावृत्ति)। अद्वैत व्याख्याएँ \"तत्\" को निराकार आत्मा या ब्रह्म मानती हैं, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे स्वयं भगवान मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.18",
      "translation": "ज्ञानी जन विद्या और विनय से संपन्न ब्राह्मण में, गाय में, हाथी में, कुत्ते में और चांडाल में भी समान दृष्टि रखते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण उन लोगों का वर्णन जारी रखते हैं जिनके दोष ज्ञान से धुल चुके हैं। ऐसे ज्ञानी (पण्डिताः) विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल (श्वपाक) सभी को समदृष्टि (समदर्शिनः) से देखते हैं। अधिकांश परंपराएँ इसका अर्थ सब प्राणियों में एक ही आत्मा को देखना मानती हैं, न कि सबके साथ एक जैसा व्यवहार करना।"
    },
    {
      "id": "5.19",
      "translation": "जिनका मन समभाव में टिका है, उन्होंने इसी जीवन में संसार को जीत लिया है। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सबमें सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में ज्ञानी सबको समान दृष्टि से देखते हैं; कृष्ण उसी बात को आगे बढ़ाते हैं। वे कहते हैं कि समता (साम्य) में स्थिर मन वाले लोग इसी जीवन में सर्ग यानी जन्म-मरण के चक्र पर विजय पा लेते हैं। कारण यह है कि परम सत्य ब्रह्म निर्दोष और सबमें समान है, इसलिए समदर्शी व्यक्ति ब्रह्म में ही स्थित रहता है। कुछ व्याख्याकार 'सर्ग' को जन्म-मरण का संसार मानते हैं, कुछ सांसारिक द्वंद्वों का बंधन; श्लोक दोनों अर्थों को सहारा देता है।"
    },
    {
      "id": "5.20",
      "translation": "प्रिय वस्तु पाकर न हर्षित हो और अप्रिय वस्तु पाकर न व्याकुल हो; जिसकी बुद्धि स्थिर है और जो मोह से मुक्त है, ऐसा ब्रह्म को जानने वाला व्यक्ति ब्रह्म में स्थित रहता है।",
      "explanation": "कृष्ण समभाव प्राप्त उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो ब्रह्म (परम सत्य) में स्थित है। उसकी बुद्धि स्थिर (स्थिरबुद्धि) है और वह मोह से मुक्त है, इसलिए सुखद या दुखद घटनाएँ उसे हर्ष और शोक के झूले में नहीं झुलातीं। ब्रह्म को निराकार परम तत्त्व मानें या अधिक व्यक्तिगत ईश्वर के रूप में, इस पर परंपराओं में मतभेद है, पर सभी इसे भीतरी स्थिरता का वर्णन मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.21",
      "translation": "जिसका मन बाहरी विषयों के स्पर्श में आसक्त नहीं होता, वह अपने भीतर जो सुख है उसे पा लेता है। ब्रह्म के साथ योग में जुड़े मन वाला वह व्यक्ति कभी न घटने वाले सुख का अनुभव करता है।",
      "explanation": "कृष्ण उस स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो ब्रह्म (परम सत्य) में स्थित है। बाहरी इंद्रिय-स्पर्शों में अनासक्त (असक्त) रहने से वह अपनी आत्मा के भीतर स्थायी आनंद पाता है। इस सुख को अक्षय कहा गया है, क्योंकि यह बाहरी वस्तुओं पर निर्भर सुखों जैसा नहीं है।"
    },
    {
      "id": "5.22",
      "translation": "जो भोग इंद्रियों और विषयों के संपर्क से उत्पन्न होते हैं, वे वास्तव में दुःख के ही स्रोत हैं। हे कुंतीपुत्र, उनका आदि भी है और अंत भी; इसलिए समझदार मनुष्य उनमें रमता नहीं।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को बाहरी सुख और भीतरी आनंद का अंतर समझा रहे हैं। इंद्रियों और विषयों के संपर्क (संस्पर्श) से मिलने वाले भोग क्षणिक हैं, और उन्हें पकड़े रखने की चाह दुःख लाती है, इसलिए विवेकी (बुध) उनमें नहीं रमते। अद्वैत परंपरा आत्मा के आनंद को ही स्थायी मानने पर बल देती है, जबकि भक्ति परंपरा इंद्रियों को ईश्वर की ओर मोड़ने पर बल देती है।"
    },
    {
      "id": "5.23",
      "translation": "जो मनुष्य यहीं, इस शरीर के छूटने से पहले, काम और क्रोध से उठने वाले वेग को सह लेने में समर्थ है, वही युक्त है और वही सुखी है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि इंद्रियों के संपर्क से जन्मे भोग आदि-अंत वाले हैं और दुःख के ही कारण बनते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि सच्चा सुखी वह है जो इसी जीवन में काम और क्रोध के वेग को बिना बहे सह लेता है। \"युक्त\" का अर्थ है योग में स्थिर, यानी आंतरिक संतुलन और एकत्व की साधना में दृढ़।"
    },
    {
      "id": "5.24",
      "translation": "जिसका सुख भीतर है, जिसका आनंद भीतर है, और जिसका प्रकाश भी भीतर ही है, वह योगी ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म में निर्वाण को प्राप्त करता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि जो काम और क्रोध के वेग को सह लेता है, वही सुखी है। अब वे ऐसे योगी का वर्णन करते हैं जो बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं रहता: उसका सुख, आनंद और ज्ञान का प्रकाश, सब अपने भीतर है। ऐसा साधक ब्रह्मभूत होकर ब्रह्मनिर्वाण पाता है, यानी इच्छाओं और बंधन की अग्नि बुझने पर परम शांति और मुक्ति। अद्वैत परंपरा इसे ब्रह्म के साथ अभेद की अनुभूति मानती है, जबकि भक्ति-परंपराएँ इसे परमात्मा के निकट शुद्ध अवस्था के रूप में समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.25",
      "translation": "जिनके दोष क्षीण हो चुके हैं, जिनकी द्विधा (संशय) कट चुकी है, जिनका मन संयम में है और जो सब प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, ऐसे ऋषि ब्रह्मनिर्वाण को प्राप्त करते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने भीतर ही सुख और प्रकाश पाने वाले योगी की बात कही थी; यहाँ वे बताते हैं कि ब्रह्मनिर्वाण, यानी ब्रह्म में लीन होकर मिलने वाली परम शांति और मुक्ति, किन्हें मिलती है। ऐसे साधक के भीतर की मलिनता मिट चुकी होती है, मन स्थिर और संयमित होता है, और वह सभी प्राणियों की भलाई में लगा रहता है। 'छिन्नद्वैधा' को कुछ व्याख्याकार संशयों का कट जाना समझते हैं, तो कुछ भेद-बुद्धि या द्वैत-भाव का मिट जाना।"
    },
    {
      "id": "5.26",
      "translation": "जो संन्यासी काम और क्रोध से मुक्त हैं, जिनका चित्त संयमित है और जिन्होंने आत्मा को जान लिया है, उनके लिए ब्रह्मनिर्वाण चारों ओर निकट ही रहता है।",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि मुक्ति किन्हें मिलती है। जो साधक (यति) काम और क्रोध पर विजय पाकर मन को स्थिर कर लेते हैं और आत्मा को जान लेते हैं, उनके लिए ब्रह्मनिर्वाण, यानी ब्रह्म में मिलने वाली परम शांति और मुक्ति, पास ही होती है। परंपराओं में मतभेद है कि यह जीवित रहते प्राप्त होती है या देह-त्याग पर, और यह ब्रह्म में लय है या ईश्वर से मिलन।"
    },
    {
      "id": "5.27",
      "translation": "बाहरी विषयों के स्पर्शों को बाहर ही छोड़कर, दृष्टि को दोनों भौंहों के बीच टिकाकर, और नासिका के भीतर चलने वाले प्राण और अपान को सम करके…",
      "explanation": "कृष्ण मोक्ष चाहने वालों के लिए ध्यान की साधना बता रहे हैं, और यह वाक्य अगले श्लोक तक चलता है। वे बाहरी विषयों के स्पर्श से मन को हटाने, दृष्टि को भौंहों के बीच टिकाने, और भीतर आने वाली श्वास (प्राण) तथा बाहर जाने वाली श्वास (अपान) को सम करने की बात करते हैं। कुछ परंपराएँ दृष्टि को शाब्दिक अभ्यास मानती हैं, जबकि अन्य इसे भीतर एकाग्रता का संकेत समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "5.28",
      "translation": "जिसने इन्द्रियों, मन और बुद्धि को वश में कर लिया है, जो मोक्ष को ही परम लक्ष्य मानता है और जो इच्छा, भय तथा क्रोध से मुक्त हो चुका है, वह मुनि सदा मुक्त ही है।",
      "explanation": "यह श्लोक पिछले श्लोक में शुरू हुआ वाक्य पूरा करता है, जहाँ कृष्ण ने ध्यान की विधि बताई थी। ऐसे ध्यान में लगा मुनि, जिसकी इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि संयमित हैं, जिसका लक्ष्य मोक्ष है और जो इच्छा, भय तथा क्रोध से परे है, सदा मुक्त ही है। ऐसे व्यक्ति को इसी जीवन में मुक्त (जीवन्मुक्त) माना गया है।"
    },
    {
      "id": "5.29",
      "translation": "मुझे यज्ञों और तपों का भोक्ता, सभी लोकों का महान ईश्वर और सब प्राणियों का हितैषी मित्र जानकर मनुष्य शांति को प्राप्त होता है।",
      "explanation": "यह पाँचवें अध्याय का अंतिम श्लोक है। पिछले श्लोक में इच्छा, भय और क्रोध से मुक्त साधक का वर्णन है; अब कृष्ण कहते हैं कि ऐसा साधक उन्हें तीन रूपों में जानकर शांति पाता है: यज्ञ और तप को स्वीकार करने वाले, सब लोकों के परम ईश्वर, और हर प्राणी के हितैषी। \"मुझे\" का अर्थ भक्ति-परंपराएँ साकार परमेश्वर मानती हैं, जबकि अद्वैत की व्याख्या इसे सबमें स्थित परम आत्मा के रूप में पढ़ती है।"
    }
  ]
}
