{
  "chapter": 6,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "6.1",
      "translation": "जो व्यक्ति कर्म के फल का आश्रय लिए बिना अपना करने योग्य कर्म करता है, वही संन्यासी भी है और योगी भी; वह नहीं जिसने केवल अग्नि का त्याग कर दिया हो, और न वह जिसने केवल कर्म करना छोड़ दिया हो।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को कर्म करने का सही तरीका समझा रहे हैं। उनके अनुसार सच्चा संन्यास और योग (मन का अनुशासन) यह है कि अपना उचित कर्तव्य (कार्य कर्म) फल पर निर्भर हुए बिना किया जाए। केवल यज्ञाग्नि छोड़ देना या कर्म छोड़ देना पर्याप्त नहीं है। 'निरग्नि' और 'अक्रिय' को कुछ परंपराएँ विशेष आश्रमों के संन्यासी मानती हैं, तो कुछ केवल बाहरी त्याग का संकेत।"
    },
    {
      "id": "6.2",
      "translation": "जिसे लोग संन्यास कहते हैं, उसी को तुम योग समझो, हे पाण्डव। क्योंकि संकल्पों को त्यागे बिना कोई भी योगी नहीं होता।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि फल की आसक्ति छोड़कर कर्म करने वाला ही संन्यासी और योगी है। यहाँ वे अर्जुन से कहते हैं कि संन्यास और योग (कर्म का अनुशासन) भीतर से एक ही हैं। दोनों में मूल बात है स्वार्थपूर्ण योजनाओं और कामनाओं यानी संकल्पों को छोड़ देना।"
    },
    {
      "id": "6.3",
      "translation": "जो मुनि योग पर आरूढ़ होना चाहता है, उसके लिए कर्म साधन कहा गया है; और वही जब योग में आरूढ़ हो जाता है, तब उसके लिए शम (शांति) साधन कहा जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि योग (आध्यात्मिक साधना) में आगे बढ़ना कई चरणों में होता है। शुरुआत करने वाले के लिए निष्काम कर्म मन को तैयार करने का साधन है; जो योग में स्थिर हो चुका है, उसके लिए शम (भीतरी शांति) स्थिर रहने का साधन बनता है। टीकाकार इसे अलग ढंग से पढ़ते हैं: कुछ शम को कर्मों से निवृत्ति मानते हैं, तो कुछ कर्म करते हुए भी भीतर की शांति।"
    },
    {
      "id": "6.4",
      "translation": "जब मनुष्य न इन्द्रियों के विषयों में आसक्त होता है और न कर्मों में, और सभी संकल्पों का त्याग कर देता है, तब उसे योग में आरूढ़ कहा जाता है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ उस साधक का वर्णन करते हैं जो कर्म से आगे बढ़कर शान्ति की अवस्था तक पहुँच चुका है। जब इन्द्रिय-विषयों और कर्मों में आसक्ति (सङ्ग) नहीं रहती और सब संकल्प (इच्छा से बनी योजनाएँ) छूट जाते हैं, तब व्यक्ति योगारूढ़ कहलाता है। व्याख्याकारों में इस पर मतभेद है: कुछ भीतरी त्याग के साथ कर्म करते रहने पर जोर देते हैं, कुछ कर्मों से निवृत्ति पर; पर आसक्ति से मुक्ति सभी के लिए मूल बात है।"
    },
    {
      "id": "6.5",
      "translation": "अपने ही प्रयत्न से व्यक्ति स्वयं को ऊपर उठाए और स्वयं को गिरने न दे; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में योग में आरूढ़ होने की बात कही गई थी। यहाँ कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऊपर उठने या गिरने की ज़िम्मेदारी अपनी ही है, और कोई दूसरा यह काम उसके लिए नहीं कर सकता। यहाँ \"आत्मा\" शब्द का अर्थ कई परंपराओं में मन या व्यक्ति का अपना स्वरूप लिया जाता है। कुछ व्याख्याकार इसे व्यक्तिगत जीव और उसके भीतर के उच्चतर स्व के संबंध के रूप में भी पढ़ते हैं।"
    },
    {
      "id": "6.6",
      "translation": "जिसने अपने ही बल पर स्वयं को जीत लिया है, उसका अपना आप ही उसका मित्र है; पर जिसने स्वयं को नहीं जीता, उसका अपना आप ही शत्रु की तरह उसके विरुद्ध काम करता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक की बात आगे बढ़ाते हुए कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि अपना मन और स्वभाव ही मित्र भी बन सकता है और शत्रु भी। जो व्यक्ति संयम और विवेक से अपने मन और इंद्रियों को साध लेता है, उसके लिए वे सहारा बनते हैं। जो ऐसा नहीं कर पाता, उसके लिए वही मन उसे भटकाकर नुकसान पहुँचाता है। व्याख्याकार यहाँ 'आत्मा' को अलग-अलग ढंग से समझते हैं: कुछ इसे ऊँचे विवेकशील स्वरूप और निचले मन का भेद मानते हैं, और कुछ एक ही स्वयं की दो अवस्थाएँ।"
    },
    {
      "id": "6.7",
      "translation": "जिसने स्वयं को जीत लिया है और जो पूरी तरह शांत है, उसके भीतर परमात्मा सर्दी और गर्मी में, सुख और दुख में, तथा मान और अपमान में भी स्थिर रूप से विद्यमान रहता है।",
      "explanation": "कृष्ण बताते हैं कि मन को जीतने पर वही मन मित्र बन जाता है। जिसने स्वयं पर विजय पाई है (जितात्मा) और जो शांत (प्रशांत) है, वह सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और मान-अपमान जैसे द्वंद्वों में स्थिर रहता है। 'समाहित' को दो तरह से समझा गया है: ऐसे व्यक्ति में परमात्मा पूर्ण रूप से प्रकट है, या वह स्वयं परमात्मा में पूर्णतः स्थित है। दोनों अर्थ एक ही आंतरिक स्थिरता की ओर संकेत करते हैं।"
    },
    {
      "id": "6.8",
      "translation": "जिसकी आत्मा ज्ञान और विज्ञान से तृप्त है, जो निर्विकार भाव से अडिग रहता है और जिसने इन्द्रियों को जीत लिया है, ऐसा योगी 'युक्त' कहलाता है। उसके लिए मिट्टी का ढेला, पत्थर और सोना एक समान हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ बताते हैं कि योग में सचमुच स्थित व्यक्ति कैसा होता है। वह ज्ञान और उसके अनुभव (विज्ञान) से तृप्त रहता है, कूटस्थ यानी निहाई की तरह अविचल रहता है और इन्द्रियों को वश में रखता है, इसलिए सोना और मिट्टी उसके लिए समान हैं। ज्ञान और विज्ञान को कुछ परंपराएँ शास्त्र-ज्ञान और अपना अनुभव मानती हैं, कुछ आत्म-ज्ञान और जगत में उसकी अभिव्यक्ति का ज्ञान।"
    },
    {
      "id": "6.9",
      "translation": "जो हितैषियों, मित्रों, शत्रुओं, उदासीनों, मध्यस्थों, अप्रिय लोगों और संबंधियों के प्रति, तथा सज्जनों और पापियों के प्रति भी समान बुद्धि रखता है, वह श्रेष्ठ है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने उस योगी (योग में स्थित साधक) का वर्णन किया जो तृप्त और अचल है और मिट्टी, पत्थर तथा सोने को एक-सा देखता है। यहाँ वे यही समता वस्तुओं से बढ़ाकर लोगों तक ले जाते हैं। समबुद्धि का अर्थ है कि पसंद या नापसंद दूसरों के बारे में उसके विवेक को न बिगाड़े। टीकाकारों में मतभेद है: कोई इसे पहले वर्णित योगी से भी श्रेष्ठ मानता है, कोई उसी योगी की पूर्ण अवस्था।"
    },
    {
      "id": "6.10",
      "translation": "योगी को चाहिए कि वह एकांत स्थान में अकेला रहकर, मन और शरीर को संयम में रखते हुए, आशाओं और संग्रह से मुक्त होकर निरंतर अपने को ध्यान-योग में लगाए।",
      "explanation": "समबुद्धि की बात के बाद कृष्ण अब अर्जुन को ध्यान-साधना का तरीका बताना शुरू करते हैं। योगी (ध्यान-योग का अभ्यास करने वाले) को यह अभ्यास निरंतर, एकांत में, संयमित मन और शरीर (यतचित्तात्मा) के साथ, इच्छा (आशीः) और संग्रह-भाव (परिग्रह) से मुक्त होकर करना है। टीकाकारों में मतभेद है कि 'एकाकी' और 'रहसि' का अर्थ शाब्दिक एकांत है या मुख्य रूप से भीतरी अनासक्ति।"
    },
    {
      "id": "6.11",
      "translation": "किसी शुद्ध स्थान में अपने लिए एक स्थिर आसन बिछाकर, जो न बहुत ऊँचा हो और न बहुत नीचा, और जिस पर वस्त्र, मृगचर्म और कुश एक के ऊपर एक बिछे हों…",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को ध्यान-योग का अभ्यास समझा रहे हैं, और यहाँ बैठने की तैयारी बताते हैं। स्थान स्वच्छ हो, आसन स्थिर हो और न बहुत ऊँचा हो न बहुत नीचा, तथा उस पर कुश, मृगचर्म और वस्त्र बिछे हों। परतों का क्रम श्लोक में थोड़ा खुला है, और बात अगले श्लोक में बैठने की विधि तक जारी रहती है।"
    },
    {
      "id": "6.12",
      "translation": "उस आसन पर बैठकर, मन को एकाग्र करके और चित्त तथा इंद्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, वह आत्मा की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में आसन का वर्णन करने के बाद कृष्ण अर्जुन को ध्यान के अभ्यास की विधि बता रहे हैं। उस आसन पर बैठकर मन को एकाग्र, यानी एक ही बिंदु पर टिका हुआ, करना चाहिए और चित्त तथा इंद्रियों की चंचल हलचल को वश में रखना चाहिए। योग, यानी अनुशासित ध्यान, का उद्देश्य आत्म-शुद्धि है। इस शुद्धि को कुछ टीकाकार मन और अंतःकरण की सफ़ाई मानते हैं, तो कुछ आत्मा का अशुद्धि से मुक्त होना।"
    },
    {
      "id": "6.13",
      "translation": "शरीर, सिर और गर्दन को सीधा और अचल रखते हुए, स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए और किसी भी दिशा में इधर-उधर न देखते हुए…",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को ध्यानयोग (मन को स्थिर करने का अभ्यास) के लिए बैठने की विधि बता रहे हैं। यहाँ वे आसन समझाते हैं: पीठ, सिर और गर्दन एक सीध में और स्थिर हों, तथा दृष्टि टिकी रहे, इधर-उधर न भटके। कुछ परंपराएँ \"नासिका का अग्रभाग\" को शाब्दिक रूप में लेती हैं, जबकि अन्य इसे अधखुली दृष्टि का उसी ओर होना या भौंहों के बीच ध्यान लगाना मानती हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में भी चलता है।"
    },
    {
      "id": "6.14",
      "translation": "शांत और निर्भय मन से, ब्रह्मचारी के व्रत में दृढ़ रहकर, मन को वश में करके और चित्त को मुझमें लगाकर, वह मुझे ही अपना परम लक्ष्य मानते हुए योग में स्थिर होकर बैठे।",
      "explanation": "कृष्ण ध्यान में बैठने की विधि बताते हुए अर्जुन को अब भीतरी अवस्था समझाते हैं: शांत और निर्भय मन, संयमित आचरण (ब्रह्मचर्य, जिसे कई लोग यौन-संयम और कई व्यापक आत्मसंयम मानते हैं) और ध्यान का लक्ष्य कृष्ण। 'मुझे' का अर्थ कुछ परंपराएँ व्यक्तिगत भगवान कृष्ण लेती हैं और कुछ भीतर स्थित परमात्मा; श्लोक में दोनों अर्थ संभव हैं।"
    },
    {
      "id": "6.15",
      "translation": "इस प्रकार सदा अपने आपको योग में लगाता हुआ, संयत मन वाला योगी उस शांति को प्राप्त करता है जो निर्वाण में परिपूर्ण होती है और मुझमें स्थित है।",
      "explanation": "पिछले श्लोकों में कृष्ण ने अर्जुन को ध्यान की विधि बताई थी: शांत मन, निर्भय होकर, मन को वश में रखकर और चित्त को उनमें लगाकर बैठना। यहाँ वे उसका फल बताते हैं। नियमित अभ्यास करने वाला योगी (योग का अर्थ है मन को ईश्वर या आत्मा में जोड़ना) परम शांति पाता है, जिसकी पराकाष्ठा निर्वाण, यानी संसार के बंधन और दुख का शांत हो जाना है। 'मुझमें स्थित' का अर्थ अद्वैत परंपरा आत्मा की कृष्ण के स्वरूप से एकता के रूप में लेती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे भगवान में या भगवान के साथ स्थित होने के रूप में समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.16",
      "translation": "हे अर्जुन! योग न तो बहुत अधिक खाने वाले के लिए है, न बिल्कुल न खाने वाले के लिए; न बहुत सोने के स्वभाव वाले के लिए है, और न ही अत्यधिक जागने वाले के लिए।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को ध्यानयोग (मन को स्थिर करने के अभ्यास) का तरीका समझा रहे हैं। यहाँ वे खाने और सोने में अति और अभाव, दोनों के विरुद्ध चेताते हैं, क्योंकि इनसे शरीर और मन अशांत होते हैं। अगला श्लोक संयम की बात कहकर इसी विचार को पूरा करता है।"
    },
    {
      "id": "6.17",
      "translation": "जो व्यक्ति आहार और विहार में संयमित है, कर्मों में जिसकी चेष्टा संतुलित है, और जिसका सोना-जागना नियमित है, उसके लिए योग दुःख को मिटाने वाला हो जाता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि बहुत अधिक या बहुत कम खाने-सोने वाले के लिए योग संभव नहीं है। यहाँ वे सकारात्मक बात कहते हैं: भोजन, विश्राम, कर्म, नींद और जागरण में संतुलित जीवन। ऐसे व्यक्ति के लिए योग (मन को आत्मा में स्थिर करने का अभ्यास) दुःख का नाश करने वाला बनता है। 'युक्त' का अर्थ है उचित और नपा-तुला, कठोर तपस्या नहीं।"
    },
    {
      "id": "6.18",
      "translation": "जब पूरी तरह वश में किया हुआ चित्त आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और मनुष्य सभी कामनाओं की लालसा से मुक्त हो जाता है, तब वह 'युक्त' कहलाता है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन से योग के अभ्यासी की पहचान बता रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने संतुलित जीवन की बात कही थी। यहाँ वे बताते हैं कि जब अनुशासित मन बाहर भटकना छोड़कर आत्मा में टिक जाता है और किसी भी कामना की प्यास नहीं रहती, तब व्यक्ति 'युक्त' है, यानी योग में स्थित है। 'आत्मा में' का अर्थ अद्वैत परंपरा में अपना परम स्वरूप माना जाता है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे जीवात्मा का ईश्वर की ओर स्थिर होना भी समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.19",
      "translation": "जैसे हवा से रहित स्थान में रखा दीपक नहीं डगमगाता, वैसी ही उपमा उस योगी के लिए कही गई है, जिसका चित्त वश में है और जो आत्मा के योग का अभ्यास कर रहा है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि जब चित्त अपने भीतर स्थिर हो जाता है और इच्छाओं से मुक्त होता है, तब व्यक्ति \"युक्त\" कहलाता है। यहाँ वे अर्जुन को समझाने के लिए ऐसे स्थिर मन की तुलना हवा-रहित जगह की अचल दीपशिखा से करते हैं। योग का अर्थ है ध्यान और संयम के अभ्यास से मन को साधना और आत्मा से जुड़ना। \"आत्मा का योग\" को अद्वैत परंपरा आत्मस्वरूप में स्थिति मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे आत्मा के माध्यम से ईश्वर में मन लगाना समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.20",
      "translation": "योग के अभ्यास से रोका हुआ चित्त जब पूरी तरह शांत हो जाता है, और जब मनुष्य स्वयं से ही अपनी आत्मा को देखता हुआ आत्मा में ही संतुष्ट रहता है…",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को योग (ध्यान द्वारा मन को आत्मा में जोड़ना) की पूर्ण अवस्था बता रहे हैं; इससे पहले उन्होंने स्थिर मन की उपमा वायुरहित स्थान के दीपक से दी थी। अभ्यास से संयमित चित्त जब शांत हो जाता है, तब साधक आत्मा में ही तृप्ति पाता है और उसे बाहर कुछ नहीं चाहिए। अद्वैत परंपरा 'आत्मा द्वारा आत्मा को देखना' का अर्थ शुद्ध चेतना का अपने स्वरूप को जानना लेती है, जबकि भक्ति परंपराएँ प्रायः इसे जीवात्मा का अपने भीतर परमात्मा को देखना मानती हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।"
    },
    {
      "id": "6.21",
      "translation": "जहाँ वह उस असीम सुख को जान लेता है, जिसे केवल बुद्धि ग्रहण कर सकती है और जो इंद्रियों की पहुँच से परे है, और जहाँ स्थित होकर वह फिर तत्त्व से विचलित नहीं होता…",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक से आगे उस योगी की अवस्था बता रहे हैं जिसका चित्त योग के अभ्यास से शांत हो गया है। यह सुख असीम (आत्यन्तिक) है; इसे शुद्ध बुद्धि जानती है, इंद्रियों से इसका अनुभव नहीं होता। 'तत्त्वतः' पर टीकाकार भिन्न हैं: कुछ इसे 'अपने सच्चे स्वरूप (आत्मा) से नहीं डिगता' पढ़ते हैं, तो कुछ 'सचमुच विचलित नहीं होता'। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है।"
    },
    {
      "id": "6.22",
      "translation": "जिसे पा लेने पर मनुष्य उससे बढ़कर कोई और लाभ नहीं मानता, और जिसमें स्थित रहकर वह बड़े से बड़े दुःख से भी विचलित नहीं होता…",
      "explanation": "कृष्ण ध्यान से शांत हुए योगी की उस अवस्था का वर्णन जारी रखे हुए हैं, जिसका असीम सुख पिछले श्लोक में बताया गया था। यहाँ वे कहते हैं कि यह अवस्था इतनी पूर्ण है कि उससे बड़ा कोई लाभ नहीं लगता, और भारी दुःख भी उसे डिगा नहीं पाता। यह वाक्य अगले श्लोक में आगे बढ़ता है, जहाँ इस अवस्था को योग कहा गया है।"
    },
    {
      "id": "6.23",
      "translation": "उस अवस्था को, जिसमें दुःख का संयोग छूट जाता है, 'योग' जानना चाहिए। इस योग का अभ्यास दृढ़ निश्चय के साथ, बिना उकताए मन से करना चाहिए।",
      "explanation": "कृष्ण ध्यान से प्राप्त उस अवस्था का वर्णन समाप्त कर रहे हैं जिसमें बड़ा दुःख भी व्यक्ति को डिगा नहीं पाता। यहाँ वे योग (साधना या मिलन) की परिभाषा दुःख के संयोग से वियोग (दुःखसंयोगवियोग) के रूप में देते हैं। फिर वे बिना निराश हुए (अनिर्विण्णचेतस्) दृढ़ अभ्यास करने की प्रेरणा देते हैं। टीकाकार इस मुक्ति को कहीं आत्मा का देह-मन से तादात्म्य छूटना मानते हैं, तो कहीं ध्यान की गहन समाधि-अवस्था।"
    },
    {
      "id": "6.24",
      "translation": "संकल्प से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूरी तरह छोड़कर, और मन के द्वारा ही इन्द्रियों के समूह को सब ओर से भलीभाँति रोककर…",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को ध्यान-योग का अभ्यास बता रहे हैं, जिसे उन्होंने अभी दुःख के संयोग से मुक्ति कहा है। यहाँ दो साधन हैं: संकल्प (मन की कल्पना या ठान) से उपजी सभी कामनाओं (काम) का त्याग, और मन से ही इन्द्रियों को सब ओर से संयमित करना। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ धीरे-धीरे शान्त होने की बात आती है।"
    },
    {
      "id": "6.25",
      "translation": "धीरे-धीरे, धैर्य से थामी हुई बुद्धि के द्वारा, साधक भीतर से शांत होता जाए। मन को आत्मा में स्थिर करके वह किसी भी चीज़ का चिंतन न करे।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को ध्यानयोग का अभ्यास समझा रहे हैं। इच्छाओं को छोड़ने और इन्द्रियों को वश में करने के बाद साधक धैर्य (धृति) से स्थिर की गई बुद्धि के द्वारा मन को धीरे-धीरे शांत करता है। \"आत्मसंस्थ\" का अर्थ कई परंपराएँ आत्मा में स्थित होना मानती हैं, जबकि कुछ इसे केवल अपने भीतर एकाग्र मन के रूप में भी समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.26",
      "translation": "यह चंचल और अस्थिर मन जहाँ-जहाँ भटकता है, वहाँ-वहाँ से इसे रोककर अपने भीतर आत्मा में ही वश में ले आए।",
      "explanation": "कृष्ण ध्यानयोग का अभ्यास समझा रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने मन को आत्मा में स्थिर करने की बात कही थी, और यहाँ बताते हैं कि मन के बार-बार भटकने पर साधक को हर बार उसे लौटाकर वश में करना है। 'आत्मन्' को कुछ परंपराएँ अपने भीतर के आत्मस्वरूप के अर्थ में लेती हैं, तो कुछ इसे साधक के अपने नियंत्रण में लाने के अर्थ में पढ़ती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.27",
      "translation": "जिस योगी का मन पूरी तरह शांत हो गया है, जिसका रजोगुण शांत हो चुका है, जो निर्मल है और ब्रह्मभाव को प्राप्त हो गया है, उसे ही सर्वोच्च सुख प्राप्त होता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में भटकते मन को बार-बार आत्मा में लौटाने का अभ्यास बताया गया था; यहाँ कृष्ण उसका फल बताते हैं। जब मन शांत होता है, रजोगुण (रजस्, बेचैनी और आवेग का गुण) शांत हो जाता है और मलिनता (कल्मष) मिट जाती है, तब योगी को परम सुख (सुखम् उत्तमम्) मिलता है। \"ब्रह्मभूत\" को अद्वैत परंपराएँ ब्रह्म से एकता की अनुभूति मानती हैं, जबकि भक्ति परंपराएँ ब्रह्म के स्वभाव को पाना, पर भेद बना रहना मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.28",
      "translation": "इस प्रकार सदा अपने आपको योग में लगाए रखने वाला योगी, दोषों से मुक्त होकर, सहज ही ब्रह्म के स्पर्श का वह अनंत सुख पाता है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ योग (मन को आत्मा में एकाग्र करने का अभ्यास) करने वाले साधक का वर्णन जारी रखते हैं। निरंतर अभ्यास से दोष (कल्मष) मिट जाते हैं और योगी सहजता से ब्रह्म (परम सत्य) का स्पर्श पाता है। ब्रह्म के अर्थ पर परंपराएँ भिन्न हैं: अद्वैत इसे आत्मा और परम तत्त्व की एकता मानता है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे भगवान की निकटता के रूप में पढ़ती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.29",
      "translation": "जिसका मन योग में स्थिर हो गया है, वह आत्मा को सब प्राणियों में स्थित देखता है और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है; वह हर जगह समान दृष्टि से देखने वाला होता है।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ उस व्यक्ति का वर्णन कर रहे हैं जो योग (ध्यान-साधना द्वारा एकत्व) में स्थित हो गया है; पिछले श्लोक में ब्रह्म के संस्पर्श का सुख बताया गया था। ऐसा व्यक्ति आत्मा को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को आत्मा में देखता है, इसलिए सबके प्रति समदृष्टि (समदर्शन) रखता है। अद्वैत परंपरा इसे आत्मा की सर्वव्यापी एकता मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे हर प्राणी को ईश्वर से जुड़ा हुआ देखना समझती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.30",
      "translation": "जो मुझे सर्वत्र देखता है और सब कुछ मुझमें देखता है, उसके लिए मैं कभी ओझल नहीं होता, और वह भी मुझसे कभी ओझल नहीं होता।",
      "explanation": "कृष्ण पिछले श्लोक में बताए गए उस योगी का वर्णन आगे बढ़ाते हैं, जो सभी प्राणियों में एक ही आत्मा को देखता है। यहाँ वे स्वयं कहते हैं कि जो उन्हें सबमें और सबको उनमें देखता है, उसके लिए वियोग नहीं रहता (प्रणश्यति का अर्थ है ओझल होना या नष्ट होना)। भक्ति परंपराएँ इसे भगवान और भक्त के व्यक्तिगत संबंध के रूप में पढ़ती हैं, जबकि अद्वैत परंपरा इसे आत्मा और परमात्मा की एकता के बोध के रूप में समझती है।"
    },
    {
      "id": "6.31",
      "translation": "जो एकत्व में स्थित होकर सब प्राणियों में बसे हुए मुझको भजता है, वह योगी चाहे किसी भी प्रकार से जीवन बिता रहा हो, वह मुझमें ही रहता है।",
      "explanation": "कृष्ण उस व्यक्ति का वर्णन जारी रखते हैं जो उन्हें सर्वत्र देखता है। यहाँ योगी (परमात्मा से जुड़ने का अभ्यासी) सब प्राणियों में स्थित कृष्ण को एकत्व की दृष्टि से भजता है। ऐसा व्यक्ति बाहर से किसी भी आचरण या परिस्थिति में हो, वह कृष्ण में ही स्थित रहता है। परंपराएँ इस एकत्व को अद्वैत (अभिन्नता) या भिन्न ईश्वर से भक्तिपूर्ण मिलन, दोनों रूपों में पढ़ती हैं।"
    },
    {
      "id": "6.32",
      "translation": "हे अर्जुन! जो सबको अपने ही समान मानकर सब जगह समान दृष्टि से देखता है, चाहे सुख हो या दुःख, वही योगी सर्वश्रेष्ठ माना गया है।",
      "explanation": "कृष्ण योगी का वर्णन आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि सर्वश्रेष्ठ योगी दूसरों को अपने समान (आत्मौपम्य) मानकर देखता है। जैसे उसे सुख प्रिय और दुःख अप्रिय है, वैसे ही सब प्राणियों को है, इसलिए वह उनके सुख-दुःख को अपना ही समझता है। टीकाकारों में इस पर मतभेद है: कुछ इसे सब में एक ही आत्मा का दर्शन मानते हैं, तो कुछ इसे सबके प्रति करुणा और सहानुभूति का आचरण मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "6.33",
      "translation": "हे मधुसूदन! समता के भाव से जिस योग का आपने उपदेश दिया है, मन की चंचलता के कारण मुझे उसकी कोई स्थिर अवस्था दिखाई नहीं देती।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखने वाले को श्रेष्ठ योगी कहा था। अर्जुन यहाँ शंका करता है कि मन (मनस्) हमेशा चलायमान रहता है, इसलिए समत्व वाला यह योग (मन को आत्मा से जोड़ने की साधना) स्थिर कैसे रह सकता है। यही आपत्ति अगले श्लोक में मन की चंचलता के वर्णन तक जाती है।"
    },
    {
      "id": "6.34",
      "translation": "हे कृष्ण, मन बड़ा चंचल है, मथ डालने वाला है, बलवान और हठी है। इसे रोकना मुझे वायु को रोकने के समान अत्यंत कठिन लगता है।",
      "explanation": "कृष्ण द्वारा बताए गए योग (ध्यान के अनुशासन) के उत्तर में अर्जुन अपनी शंका रखता है कि मन (मनस्) को स्थिर करना बहुत कठिन है। वह मन को चंचल, उथल-पुथल मचाने वाला, बलवान और हठी कहता है और उसे वश में करने की तुलना वायु को पकड़ने से करता है। कृष्ण अगले श्लोक में इसका उत्तर देते हैं।"
    },
    {
      "id": "6.35",
      "translation": "हे महाबाहो, इसमें कोई संदेह नहीं कि मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है। फिर भी हे कुन्तीपुत्र, अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में अर्जुन ने कहा था कि मन वायु की तरह चंचल है और उसे रोकना बहुत कठिन है। उसी के उत्तर में कृष्ण पहले अर्जुन की बात मान लेते हैं, फिर उपाय बताते हैं। अभ्यास का अर्थ है बार-बार और निरंतर प्रयास करना, और वैराग्य का अर्थ है विषयों के प्रति आसक्ति छोड़ना। टीकाकार अभ्यास के विषय को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं: कुछ इसे आत्मचिंतन मानते हैं, तो कुछ ईश्वर का स्मरण।"
    },
    {
      "id": "6.36",
      "translation": "जिसका मन संयमित नहीं है, उसके लिए योग को पाना कठिन है — ऐसा मेरा मत है। परंतु जिसने अपने आपको वश में कर लिया है और जो प्रयत्न करता रहता है, वह उचित उपाय से इसे प्राप्त कर सकता है।",
      "explanation": "अर्जुन ने चिंता जताई थी कि मन बहुत चंचल है। इसके उत्तर में कृष्ण अपना निश्चित मत बताते हैं: जिसमें आत्म-संयम नहीं है, उसके लिए योग यानी परम तत्त्व से जुड़ने की साधना बहुत कठिन है। पर जो मन को वश में करके प्रयत्न करता रहता है, उसके लिए यह संभव है। \"उचित उपाय\" से पिछले श्लोक के अभ्यास और वैराग्य की ओर संकेत है।"
    },
    {
      "id": "6.37",
      "translation": "हे कृष्ण! जो व्यक्ति श्रद्धा से युक्त है, पर प्रयत्नशील नहीं रह पाता और जिसका मन योग से डिग गया है, वह योग की सिद्धि पाए बिना किस गति को प्राप्त होता है?",
      "explanation": "अर्जुन ने अभी सुना कि संयम के बिना योग (मन को आत्मा में स्थिर करने का अभ्यास) कठिन है। अब वह पूछता है कि जो श्रद्धालु साधक प्रयत्न में ढीला पड़ जाए और सिद्धि (संसिद्धि) से पहले ही उसका मन भटक जाए, उसका क्या होता है। इसका उत्तर कृष्ण आगे के श्लोकों में देते हैं।"
    },
    {
      "id": "6.38",
      "translation": "हे महाबाहु, दोनों मार्गों से भ्रष्ट हुआ वह मनुष्य, जिसका कहीं कोई आधार नहीं रहा और जो ब्रह्म के मार्ग पर भ्रमित हो गया, क्या बिखरे हुए बादल की तरह नष्ट नहीं हो जाता?",
      "explanation": "अर्जुन उस व्यक्ति के बारे में पूछ रहा है जो श्रद्धा से योग (आध्यात्मिक साधना) शुरू करता है, पर सिद्धि से पहले ही डिग जाता है। उसे डर है कि ऐसा साधक सांसारिक फल और आध्यात्मिक उन्नति दोनों खो देता है, और फटे बादल की तरह बिखरकर मिट जाता है। यहाँ ब्रह्म का अर्थ परम सत्य है; 'दोनों मार्ग' को टीकाकार अलग-अलग समझते हैं, कुछ कर्म और संन्यास, तो कुछ सांसारिक जीवन और मोक्ष।"
    },
    {
      "id": "6.39",
      "translation": "हे कृष्ण, मेरे इस संशय को आप पूरी तरह मिटा दीजिए, क्योंकि आपके सिवा इस संशय को मिटाने वाला दूसरा कोई मिल ही नहीं सकता।",
      "explanation": "अर्जुन ने अभी पूछा है कि जो योग (अनुशासित साधना) शुरू करके उसे पूरा नहीं कर पाता, क्या वह बिखरे बादल की तरह दोनों ओर से भटककर नष्ट हो जाता है? यहाँ वह कृष्ण से प्रार्थना करता है कि वे इस संशय को पूरी तरह मिटा दें, क्योंकि उनके सिवा कोई और ऐसा नहीं कर सकता। कृष्ण का उत्तर अगले श्लोक से शुरू होता है।"
    },
    {
      "id": "6.40",
      "translation": "हे पार्थ, ऐसे व्यक्ति का न तो इस लोक में विनाश होता है और न परलोक में। क्योंकि हे तात, कल्याण का कार्य करने वाला कोई भी कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।",
      "explanation": "अर्जुन ने अभी पूछा था कि जो व्यक्ति श्रद्धा से योग (अनुशासित साधना) का मार्ग शुरू करता है पर लक्ष्य तक पहुँचने से पहले भटक जाता है, उसका क्या होता है। कृष्ण उसे आश्वस्त करते हैं कि ऐसा साधक न इस जीवन में नष्ट होता है, न उसके बाद। जो कल्याणकारी कर्म (कल्याणकृत्) करता है, वह कभी बुरी गति (दुर्गति) को नहीं पाता।"
    },
    {
      "id": "6.41",
      "translation": "योग से भटका हुआ साधक पुण्य करने वालों के लोकों को पाता है और वहाँ बहुत लंबे वर्षों तक रहता है। फिर वह पवित्र और समृद्ध लोगों के घर में जन्म लेता है।",
      "explanation": "अर्जुन को चिंता थी कि जो साधक योग शुरू करके उसे पूरा नहीं कर पाता, उसका क्या होता है। कृष्ण बताते हैं कि वह पहले पुण्यात्माओं के लोकों का सुख भोगता है, फिर किसी अच्छे और सुखी परिवार में जन्म लेता है। टीकाकार प्रायः \"शाश्वत वर्षों\" (शाश्वतीः समाः) का अर्थ बहुत लंबा समय मानते हैं, अनंत काल नहीं।"
    },
    {
      "id": "6.42",
      "translation": "अथवा वह बुद्धिमान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है। इस संसार में इस प्रकार का जन्म निश्चय ही और भी दुर्लभ है।",
      "explanation": "अर्जुन की चिंता के उत्तर में कृष्ण बता रहे हैं कि जो इस जीवन में योग (आध्यात्मिक साधना) पूरा नहीं कर पाता, उसकी क्या गति होती है। पिछले श्लोक में बताए पवित्र और संपन्न घर के अलावा वह ज्ञानी योगियों के कुल में भी जन्म ले सकता है। कृष्ण इसे अधिक दुर्लभ जन्म कहते हैं, क्योंकि वहाँ साधना फिर से शुरू करने का सबसे अनुकूल वातावरण मिलता है।"
    },
    {
      "id": "6.43",
      "translation": "वहाँ उसे पिछले जन्म में पाई हुई बुद्धि का वह जुड़ाव फिर से मिल जाता है, और हे कुरुनन्दन, वहाँ से वह पूर्ण सिद्धि के लिए फिर प्रयत्न करता है।",
      "explanation": "अर्जुन की चिंता यह थी कि जिसका योग मृत्यु के समय अधूरा रह जाए, उसका क्या होता है। कृष्ण कहते हैं कि वह योगियों के कुल में जन्म लेकर पिछले जीवन में पाई हुई आध्यात्मिक समझ (बुद्धिसंयोग) फिर पा लेता है। उसी आधार पर वह पूर्ण सिद्धि (संसिद्धि), यानी मुक्ति, के लिए फिर प्रयास करता है।"
    },
    {
      "id": "6.44",
      "translation": "उसी पहले के अभ्यास के बल से वह विवश-सा होकर भी योग की ओर खिंच जाता है। योग को केवल जानने की इच्छा रखने वाला भी शब्दब्रह्म को पार कर जाता है।",
      "explanation": "श्रीकृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दे रहे हैं कि योग के मार्ग से गिरा हुआ साधक अगले जन्म में क्या पाता है। पिछले जन्म की साधना के संस्कार उसे अपने-आप फिर योग की ओर खींच लेते हैं, और योग को जानने की जिज्ञासा ही उसे आगे बढ़ा देती है। शब्दब्रह्म का अर्थ है वेदों का शब्दरूप ज्ञान; शंकराचार्य आदि इसे वैदिक कर्मकांड और उसके फल मानते हैं, जबकि रामानुज इसे प्रकृति के क्षेत्र के अर्थ में लेते हैं।"
    },
    {
      "id": "6.45",
      "translation": "परन्तु जो योगी पूरे प्रयत्न से लगातार साधना करता है, उसके दोष धुल जाते हैं और अनेक जन्मों में वह सिद्ध होता जाता है; तब वह परम गति को प्राप्त करता है।",
      "explanation": "अर्जुन की चिंता थी कि असफल योगी नष्ट तो नहीं हो जाता; उसी के उत्तर में कृष्ण कहते हैं कि निरन्तर प्रयत्न करने वाला योगी धीरे-धीरे दोषों (किल्बिष) से शुद्ध होता है और अनेक जन्मों में परिपक्व होकर परम गति, अर्थात् मोक्ष, पाता है। इस परम गति को अद्वैत परम्परा निराकार ब्रह्म से एकता मानती है, जबकि भक्ति परम्पराएँ भगवान की प्राप्ति; यह श्लोक इसका निर्णय नहीं करता।"
    },
    {
      "id": "6.46",
      "translation": "योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, ज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है, और कर्मकांड करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है। इसलिए हे अर्जुन, तुम योगी बनो।",
      "explanation": "ध्यान-साधना और योगी के प्रयास के फल की चर्चा समाप्त करते हुए कृष्ण यहाँ अर्जुन को योगी की श्रेष्ठता समझाते हैं। वे योगी (साधना के द्वारा परमात्मा से निरंतर जुड़े साधक) को तपस्वियों (तपस्विन्), ज्ञानियों (ज्ञानिन्) और कर्मकांडियों (कर्मिन्) से श्रेष्ठ बताते हैं। 'ज्ञानी' का अर्थ कुछ परंपराएँ शास्त्र के विद्वान लेती हैं, तो कुछ आत्मज्ञानी। किसी भी अर्थ में, अंत में कृष्ण अर्जुन से सीधे कहते हैं कि तुम योगी बनो।"
    },
    {
      "id": "6.47",
      "translation": "सभी योगियों में भी जो श्रद्धा से युक्त होकर, मुझमें लगे हुए अन्तःकरण से मेरा भजन करता है, वह मेरे मत में सबसे श्रेष्ठ योगी है।",
      "explanation": "यह छठे अध्याय का अंतिम श्लोक है। पिछले श्लोक में कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि योगी (योग के अभ्यास से परमात्मा से जुड़ने वाला) तपस्वियों, ज्ञानियों और कर्मकांडियों से श्रेष्ठ है। अब वे सर्वश्रेष्ठ योगी का लक्षण बताते हैं: जो श्रद्धा के साथ, पूरी तरह उनमें डूबे हुए अंतःकरण से उनका भजन करता है। भक्ति-परंपराएँ यहाँ 'मुझ' को साकार भगवान मानती हैं, जबकि अद्वैत-परंपराएँ इसे परम आत्मा के अर्थ में पढ़ती हैं।"
    }
  ]
}
