{
  "chapter": 7,
  "lang": "hi",
  "verses": [
    {
      "id": "7.1",
      "translation": "हे पार्थ, मुझमें मन लगाकर और मेरा ही आश्रय लेकर योग का अभ्यास करते हुए तुम जिस प्रकार मुझे पूर्ण रूप से और बिना किसी संदेह के जान सकोगे, वह सुनो।",
      "explanation": "यहाँ से कृष्ण अर्जुन (पार्थ, पृथा के पुत्र) को एक नया उपदेश शुरू करते हैं। वे कहते हैं कि जिसका मन उनमें लगा है (आसक्तमनाः) और जो उनका आश्रय लेकर योग, यानी अनुशासित साधना, करता है, वह उन्हें पूर्ण और निश्चित रूप से जान पाता है। अगला श्लोक इसी बात को आगे बढ़ाते हुए ज्ञान के साथ अनुभव (विज्ञान) देने का वचन देता है।"
    },
    {
      "id": "7.2",
      "translation": "मैं तुम्हें यह ज्ञान विज्ञान सहित पूरी तरह से बताऊँगा, जिसे जान लेने के बाद इस संसार में जानने योग्य और कुछ भी शेष नहीं रहता।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने वादा किया था कि अर्जुन उन्हें पूर्ण रूप से कैसे जान सकेगा, और अब वे वह शिक्षा शुरू करते हैं। यहाँ ज्ञान का अर्थ सैद्धांतिक समझ है और विज्ञान का अर्थ उसका अनुभव या गहरी विशिष्ट समझ है। शंकराचार्य विज्ञान को प्रत्यक्ष अनुभव मानते हैं, जबकि रामानुज जैसे वैष्णव आचार्य उसे ईश्वर के स्वरूप और विभूतियों की विशिष्ट समझ के रूप में लेते हैं।"
    },
    {
      "id": "7.3",
      "translation": "हज़ारों मनुष्यों में कोई एक ही सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है, और प्रयत्न करने वाले उन सिद्ध जनों में भी कोई विरला ही मुझे यथार्थ रूप से जान पाता है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी अर्जुन को ज्ञान और विज्ञान (अनुभव) पूरी तरह बताने का वचन दिया है। यहाँ वे बताते हैं कि उन्हें सच में जानना कितना दुर्लभ है: सिद्धि के लिए प्रयत्न करने वाले भी कम हैं, और उन्हें तत्त्व से जानने वाले और भी कम। सिद्धि का अर्थ परंपराएँ अलग-अलग लेती हैं, जैसे चित्त की शुद्धि, आत्मसाक्षात्कार या भक्ति; श्लोक स्वयं इसे तय नहीं करता।"
    },
    {
      "id": "7.4",
      "translation": "पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार — इस प्रकार मेरी प्रकृति आठ भागों में बँटी हुई है।",
      "explanation": "कुछ ही लोग उन्हें सचमुच जान पाते हैं, यह कहने के बाद कृष्ण अर्जुन को अपना स्वरूप समझाना शुरू करते हैं। वे अपनी अपरा प्रकृति के आठ भाग गिनाते हैं: पाँच स्थूल तत्त्व, तथा मन, बुद्धि और अहंकार (मैं-पन का भाव)। अगले श्लोक में वे अपनी परा प्रकृति, यानी जीव, की बात करते हैं, जो इस जगत को धारण करता है।"
    },
    {
      "id": "7.5",
      "translation": "यह तो अपरा (निम्न) प्रकृति है। हे महाबाहो, इससे भिन्न मेरी एक और प्रकृति को जानो, जो परा (श्रेष्ठ) है और जीव के रूप में है, जिसके द्वारा यह जगत धारण किया जाता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने अपनी जड़ प्रकृति के आठ भेद बताए: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार। यहाँ वे कहते हैं कि इससे श्रेष्ठ एक और प्रकृति है, जीव (जीवभूता), जो इस जगत को धारण करती है। अनेक व्याख्याकार इसे चेतन आत्मा मानते हैं जो जड़ से भिन्न है, जबकि कुछ इसे सब प्राणियों में प्राण भरने वाली ईश्वरीय शक्ति के रूप में समझते हैं।"
    },
    {
      "id": "7.6",
      "translation": "यह जान लो कि समस्त प्राणी इन्हीं दोनों प्रकृतियों से उत्पन्न होते हैं। मैं ही सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का कारण हूँ और उसी प्रकार उसके लय का भी।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी दो प्रकृतियाँ बताई हैं: निम्न जड़ प्रकृति और उच्च जीवरूप प्रकृति, जो जगत् को धारण करती है। यहाँ वे कहते हैं कि सभी प्राणी इन्हीं दोनों के संयोग से उत्पन्न होते हैं, और वे स्वयं जगत् के उद्गम तथा लय का कारण हैं। इन दोनों प्रकृतियों का कृष्ण से संबंध अद्वैत में उनकी माया-शक्ति के रूप में, और वैष्णव परंपराओं में सगुण ईश्वर की वास्तविक शक्तियों के रूप में समझा जाता है।"
    },
    {
      "id": "7.7",
      "translation": "हे धनञ्जय, मुझसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यह सब कुछ मुझमें वैसे ही पिरोया हुआ है, जैसे धागे में मणियाँ पिरोई होती हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में स्वयं को संसार की उत्पत्ति और प्रलय का कारण बताने के बाद कृष्ण अर्जुन (धनञ्जय) से कहते हैं कि उनसे परे कुछ नहीं है और सब कुछ उनमें धागे में मणियों की तरह पिरोया है। \"श्रेष्ठ\" के अर्थ पर परंपराएँ भिन्न हैं: अद्वैत व्याख्या में एक ही सत्ता से अलग कुछ नहीं है, जबकि वैष्णव भक्ति-परंपरा में ईश्वर परम पुरुष है जो वास्तविक जगत को धारण करता है।"
    },
    {
      "id": "7.8",
      "translation": "हे कुन्तीपुत्र, मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रभा हूँ। मैं सभी वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और मनुष्यों में पुरुषार्थ (पौरुष) हूँ।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि सब कुछ उनमें धागे में मणियों की तरह पिरोया है। अब वे अर्जुन को हर वस्तु का सार बताते हैं: जल में रस, सूर्य-चन्द्र में प्रकाश, वेदों में प्रणव (ॐ), आकाश में शब्द और मनुष्यों में पौरुष। पौरुष का अर्थ टीकाकार अलग-अलग लेते हैं: कुछ इसे पुरुषत्व या साहस मानते हैं, कुछ मनुष्य का उद्यम या सामर्थ्य।"
    },
    {
      "id": "7.9",
      "translation": "मैं पृथ्वी में पवित्र गंध हूँ और अग्नि में तेज हूँ। मैं सब प्राणियों में जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सृष्टि की हर वस्तु के सार के रूप में मौजूद हैं, ताकि अर्जुन उन्हें हर जगह पहचान सके। यहाँ वे पृथ्वी की पवित्र गंध, अग्नि का तेज (तेजस्), प्राणियों का जीवन और तपस्वियों का तप (तपस्, अनुशासित संयम) अपना रूप बताते हैं। परंपराएँ इसे अलग ढंग से समझती हैं: कोई कहता है कि ईश्वर स्वयं इन वस्तुओं का सार है, कोई कहता है कि वह इनका स्रोत और शक्ति है।"
    },
    {
      "id": "7.10",
      "translation": "हे पार्थ, मुझे सब प्राणियों का सनातन बीज जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ और तेजस्वियों का तेज हूँ।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे संसार के सार रूप में कैसे विद्यमान हैं: सब जीवों के शाश्वत बीज के रूप में, बुद्धिमानों की बुद्धि के रूप में और तेजस्वियों के तेज (तेजस्) के रूप में। अद्वैत परंपरा इसे ब्रह्म का सबमें अंतर्निहित सत्य होना समझती है, जबकि भक्ति परंपराएँ कृष्ण को सब गुणों का साक्षात् स्रोत मानने पर बल देती हैं।"
    },
    {
      "id": "7.11",
      "translation": "बलवानों में मैं वह बल हूँ जो कामना और आसक्ति से रहित है; और हे भरतश्रेष्ठ, प्राणियों में मैं वह कामना हूँ जो धर्म के विरुद्ध नहीं है।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि वे सब वस्तुओं के मूल में कैसे विद्यमान हैं: यहाँ वे कामना (काम) और आसक्ति (राग) से मुक्त शुद्ध बल हैं, और वह इच्छा हैं जो धर्म (उचित व्यवस्था और कर्तव्य) की मर्यादा में रहती है। संकेत यह है कि स्वाभाविक इच्छाएँ, जैसे जीवन-निर्वाह या परिवार की कामना, धर्म के अनुकूल हों तो दोषपूर्ण नहीं हैं। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि यह धर्मसम्मत कामना केवल संतानोत्पत्ति जैसी बातों तक सीमित है या सभी धर्मसम्मत लक्ष्यों तक, पर सभी मानते हैं कि बेलगाम लालसा इसमें शामिल नहीं है।"
    },
    {
      "id": "7.12",
      "translation": "जो भी भाव सात्त्विक हैं, जो राजस हैं और जो तामस हैं, उन्हें तुम मुझसे ही उत्पन्न जानो। फिर भी मैं उनमें नहीं हूँ; वे मुझमें हैं।",
      "explanation": "कृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि सब कुछ उन पर ही आश्रित है। प्रकृति के तीन गुणों — सत्त्व यानी प्रकाश, रजस् यानी चंचल आवेग और तमस् यानी जड़ता — से बने सभी भाव उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। वे कहते हैं कि वे इन भावों के अधीन नहीं हैं, बल्कि ये उनमें स्थित हैं; कुछ व्याख्याकार इसमें प्रकृति से ईश्वर की निर्लिप्तता पर बल देखते हैं, तो कुछ प्रकृति में उनकी गहरी उपस्थिति पर।"
    },
    {
      "id": "7.13",
      "translation": "गुणों से बने इन तीन भावों से मोहित यह सारा संसार मुझे नहीं पहचानता, जो इन सबसे परे और अविनाशी हूँ।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी कहा कि सात्त्विक, राजसिक और तामसिक सभी भाव उन्हीं से उत्पन्न होते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि फिर भी लोग उन्हें क्यों नहीं पहचानते: वे प्रकृति के तीन गुणों में उलझे रहते हैं, जो मन को बाँधते और दृष्टि को धुंधला करते हैं। इसलिए वे उन्हें गुणों से परे अपरिवर्तनीय सत्य के रूप में नहीं देख पाते।"
    },
    {
      "id": "7.14",
      "translation": "मेरी यह दैवी माया गुणों से बनी है और इसे पार करना बहुत कठिन है। जो लोग केवल मेरी ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि प्रकृति के तीन गुणों से बने भावों के कारण संसार मोहित है और उनके परम स्वरूप को नहीं पहचानता। अब वे अर्जुन से कहते हैं कि माया उनकी अपनी दिव्य शक्ति है, जो गुणों (सत्त्व, रजस् और तमस् नामक प्रकृति के तीन गुणों) से रची है, और केवल उनकी शरण से ही उसके पार जाया जा सकता है। अद्वैत परंपरा माया को भ्रम रचने वाली ईश्वर की शक्ति मानती है, जबकि वैष्णव परंपराएँ उसे ईश्वर की वास्तविक शक्ति मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "7.15",
      "translation": "बुरे कर्म करने वाले, मोहग्रस्त और नीच प्रवृत्ति के लोग मेरी शरण में नहीं आते। माया ने उनका ज्ञान हर लिया है, और वे आसुरी स्वभाव का आश्रय लिए रहते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि उनकी दैवी माया पार करना कठिन है और केवल उनकी शरण लेने वाले ही उसे पार करते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि कौन शरण नहीं लेता: जो बुरे कर्म करते हैं, मोहित हैं और जिनका विवेक माया ने हर लिया है, वे आसुरी भाव यानी अहंकार और भोग-प्रधान दृष्टि में टिके रहते हैं। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि ये स्थायी प्रकार के लोग हैं या ऐसी प्रवृत्तियाँ जो किसी में भी हो सकती हैं और बदली जा सकती हैं।"
    },
    {
      "id": "7.16",
      "translation": "हे अर्जुन, हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पुण्यात्मा लोग मेरी भक्ति करते हैं: दुखी, जानने की इच्छा रखने वाला, धन या लाभ चाहने वाला, और ज्ञानी।",
      "explanation": "अभी पिछले श्लोक में कृष्ण ने उन लोगों की बात की जो उनकी शरण नहीं लेते। अब वे उनकी बात करते हैं जो भक्ति करते हैं, जिन्हें वे पुण्यात्मा (सुकृतिन्) कहते हैं, और चार प्रकार बताते हैं: दुखी (आर्त), जिज्ञासु, धन या लाभ चाहने वाला (अर्थार्थी) और ज्ञानी। अगले श्लोक में बताया गया है कि वे ज्ञानी को विशेष क्यों मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "7.17",
      "translation": "उनमें ज्ञानी श्रेष्ठ है, जो सदा मुझमें युक्त रहता है और जिसकी भक्ति एकनिष्ठ है। क्योंकि ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ, और वह भी मुझे प्रिय है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने भजने वाले चार प्रकार के लोग बताए: दुखी, जिज्ञासु, धन या लाभ चाहने वाला और ज्ञानी। यहाँ वे कहते हैं कि इनमें ज्ञानी सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह सदा युक्त (नित्ययुक्त) रहता है और उसकी भक्ति एकनिष्ठ (एकभक्ति) है, उसे और कुछ नहीं चाहिए। दोनों का प्रेम परस्पर है।"
    },
    {
      "id": "7.18",
      "translation": "ये सभी भक्त श्रेष्ठ हैं, पर ज्ञानी तो मेरी अपनी आत्मा ही है, ऐसा मेरा मत है। क्योंकि स्थिर चित्त वाला वह ज्ञानी मुझ सर्वोत्तम गति का ही आश्रय लिए रहता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि ज्ञानी भक्त उन्हें अत्यंत प्रिय है; यहाँ वे उसका कारण बताते हैं। उनकी शरण आने वाले सभी भक्त श्रेष्ठ (उदार) हैं, पर जिसने ज्ञान से उन्हें सचमुच पहचान लिया है और जिसका चित्त स्थिर है, उसे कृष्ण अपनी आत्मा कहते हैं, क्योंकि वह उन्हीं को परम लक्ष्य मानकर उनमें टिका रहता है। 'आत्मैव' को अद्वैत परंपरा ज्ञानी और ईश्वर की अभिन्नता के रूप में पढ़ती है, जबकि भक्ति-परंपराएँ इसे अत्यंत निकटता और प्रेम का भाव मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "7.19",
      "translation": "अनेक जन्मों के अंत में ज्ञानवान मनुष्य मेरी शरण में आता है, यह जानकर कि यह सब कुछ वासुदेव ही है। ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।",
      "explanation": "कृष्ण ने अभी चार प्रकार के भक्तों की बात की और ज्ञानी को विशेष बताया। यहाँ वे कहते हैं कि ऐसा ज्ञान अनेक जन्मों बाद पकता है, जब मनुष्य देखता है कि वासुदेव, यानी सबमें व्याप्त परमात्मा के रूप में कृष्ण, ही सब कुछ हैं। ऐसा महात्मा बहुत दुर्लभ है। अद्वैत परंपरा इस दर्शन को परम तत्त्व से एकता मानती है, जबकि भक्ति परंपराएँ इसे सर्वव्यापी प्रभु के प्रति प्रेममय समर्पण के रूप में पढ़ती हैं।"
    },
    {
      "id": "7.20",
      "translation": "जिनका विवेक अलग-अलग कामनाओं ने हर लिया है, वे अपने-अपने स्वभाव से बंधे हुए, तरह-तरह के नियमों का पालन करते हुए अन्य देवताओं की शरण में जाते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि सब कुछ परमात्मा रूप देखने वाला ज्ञानी दुर्लभ है। यहाँ वे उन लोगों की बात करते हैं जिनका विवेक (ज्ञान) अनेक कामनाओं से ढक गया है और जो अपने स्वभाव (प्रकृति) के अनुसार अन्य देवताओं की उपासना करते हैं। कुछ व्याख्याकार \"अन्य देवता\" को परमेश्वर से भिन्न छोटे देव मानते हैं, तो कुछ उन्हें उसी एक परमात्मा के सीमित उद्देश्य से पूजे गए रूप मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "7.21",
      "translation": "जो-जो भक्त जिस-जिस देवरूप की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, उस-उस भक्त की उसी श्रद्धा को मैं अडिग बना देता हूँ।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि अलग-अलग कामनाओं से प्रेरित लोग अन्य देवताओं की शरण लेते हैं। यहाँ वे कहते हैं कि जो भक्त किसी विशेष रूप (तनु) की पूजा श्रद्धा से करना चाहता है, उसकी श्रद्धा को वे स्थिर कर देते हैं। व्याख्याकार इसे अलग ढंग से पढ़ते हैं: कुछ मानते हैं कि हर सच्ची उपासना के पीछे एक ही परमेश्वर का सहारा है, जबकि कुछ का ज़ोर है कि इससे केवल सीमित फल मिलते हैं, जैसा आगे के श्लोकों में संकेत है।"
    },
    {
      "id": "7.22",
      "translation": "उस श्रद्धा से युक्त होकर वह उस देवता की आराधना में लगता है और उसी से अपनी मनचाही वस्तुएँ पाता है, पर वास्तव में उनका विधान मैंने ही किया होता है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि जो भक्त जिस देवरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उसकी श्रद्धा को वे उसी में स्थिर कर देते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि ऐसा साधक उसी श्रद्धा से उस देवता की उपासना करता है और उसे मनचाहे फल मिलते हैं, पर उन फलों का विधान कृष्ण स्वयं करते हैं। अद्वैत और विशिष्टाद्वैत जैसी परंपराएँ इसे इस तरह समझती हैं कि सभी देवताओं के पीछे एक ही परमेश्वर फल देने वाला है, और टीकाकार इस पर अलग-अलग बल देते हैं कि अन्य देवों की उपासना कितनी सीमित है।"
    },
    {
      "id": "7.23",
      "translation": "परंतु अल्प समझ वाले इन लोगों को मिलने वाला फल नाशवान होता है। देवताओं की उपासना करने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, और मेरे भक्त मुझे ही प्राप्त होते हैं।",
      "explanation": "कृष्ण यहाँ उन लोगों की बात आगे बढ़ा रहे हैं जो इच्छाओं की पूर्ति के लिए अन्य देवताओं की उपासना करते हैं। वे कहते हैं कि ऐसे फल सीमित और नश्वर होते हैं, क्योंकि फल चाहने वाले की दृष्टि अल्प होती है। देवताओं के उपासक देवताओं के लोक को पाते हैं, जबकि कृष्ण के भक्त स्वयं कृष्ण को पाते हैं। परंपराओं में इस पर मतभेद है कि अन्य देवता एक ही परमेश्वर के रूप हैं या अलग सत्ताएँ, पर सभी इसे नश्वर और स्थायी फल के अंतर के रूप में पढ़ते हैं।"
    },
    {
      "id": "7.24",
      "translation": "बुद्धिहीन लोग मुझ अव्यक्त को व्यक्त रूप में आया हुआ मानते हैं, क्योंकि वे मेरे परम स्वरूप को नहीं जानते, जो अविनाशी और सर्वोत्तम है।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि अन्य देवताओं की उपासना का फल सीमित होता है। यहाँ वे कहते हैं कि अल्प समझ वाले (अबुद्धयः) लोग उन्हें, जो वास्तव में अव्यक्त हैं, केवल एक साधारण देहधारी समझते हैं जो अभी-अभी प्रकट हुआ हो, और उनके परम, अविनाशी स्वरूप (परं भाव) को नहीं पहचानते। परंपराओं में भेद है: अद्वैत में अव्यक्त का अर्थ निराकार ब्रह्म लिया जाता है, जबकि भक्ति परंपराएँ कृष्ण के रूप को ही नित्य और दिव्य मानती हैं।"
    },
    {
      "id": "7.25",
      "translation": "मैं सबके सामने प्रकट नहीं होता, क्योंकि योगमाया से ढका रहता हूँ। यह मोहग्रस्त संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं पहचान पाता।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा था कि अज्ञानी लोग उन्हें केवल साधारण देहधारी समझते हैं। यहाँ वे अर्जुन को बताते हैं कि इसका कारण उनकी योगमाया है, यानी उनकी दिव्य शक्ति, जो उनके वास्तविक स्वरूप को लोगों की दृष्टि से ढक देती है। इसी कारण मोहित लोग उन्हें जन्म और नाश से परे नहीं जान पाते। अद्वैत परंपरा इसे ईश्वर की माया-शक्ति मानती है, जबकि वैष्णव परंपराएँ इसे भगवान की अपनी दिव्य शक्ति मानती हैं, जो उन्हें बाँधती नहीं।"
    },
    {
      "id": "7.26",
      "translation": "हे अर्जुन, जो प्राणी बीत चुके हैं, जो इस समय हैं और जो आगे होंगे, उन सबको मैं जानता हूँ; परंतु मुझे कोई नहीं जानता।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि उनकी योगमाया (दिव्य शक्ति) उन्हें अधिकांश लोगों से ढककर रखती है। यहाँ वे बताते हैं कि वे तीनों कालों के सभी प्राणियों को जानते हैं, पर उन्हें कोई नहीं जानता। 'कोई नहीं' (न कश्चन) का आशय प्रायः 'विरले ही कोई' लिया जाता है, क्योंकि 7.19 जैसे श्लोकों में दुर्लभ ज्ञानी भक्तों की चर्चा है।"
    },
    {
      "id": "7.27",
      "translation": "हे भारत, हे परंतप! इच्छा और द्वेष से पैदा हुए द्वंद्वों के मोह के कारण, इस सृष्टि में सभी प्राणी भ्रम में पड़ जाते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि कोई उन्हें सचमुच नहीं जानता; यहाँ वे अर्जुन को इसका कारण बताते हैं। द्वंद्व का अर्थ है विपरीत जोड़े, जैसे सुख-दुख या प्रिय-अप्रिय, और इनमें से एक की चाह (इच्छा) और दूसरे से द्वेष प्राणियों को मोह में डाल देता है। इसी मोह के कारण सभी प्राणी सृष्टि में आते ही भ्रम में पड़ जाते हैं। \"सर्गे\" को कुछ व्याख्याकार \"जन्म के समय\" समझते हैं और कुछ \"सृष्टि में\"।"
    },
    {
      "id": "7.28",
      "translation": "परन्तु जिन पुण्यकर्मा लोगों का पाप समाप्त हो चुका है, वे द्वन्द्वों के मोह से मुक्त होकर दृढ़ संकल्प के साथ मेरी भक्ति करते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि इच्छा और द्वेष से उपजे द्वन्द्वों (जैसे सुख-दुःख, पसंद-नापसंद) के मोह में सब प्राणी भटकते हैं। यहाँ वे अपवाद बताते हैं: जिनके कर्म पुण्य हैं और जिनका पाप क्षीण हो गया है। वे इस मोह से छूटकर दृढ़ व्रत (दृढव्रत), यानी अडिग निश्चय, के साथ उनकी भक्ति करते हैं।"
    },
    {
      "id": "7.29",
      "translation": "जो लोग मेरा आश्रय लेकर बुढ़ापे और मृत्यु से मुक्ति के लिए प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को पूर्ण रूप से जान लेते हैं, तथा अध्यात्म और समस्त कर्म को भी जान लेते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने उन लोगों की बात की जिनके पाप समाप्त हो चुके हैं और जो दृढ़ निश्चय से उनका भजन करते हैं। यहाँ वे कहते हैं कि जो लोग उनका आश्रय लेकर बुढ़ापे और मृत्यु से मोक्ष (मुक्ति) पाना चाहते हैं, वे ब्रह्म (परम सत्य), अध्यात्म (आत्मा से जुड़ा तत्त्व) और कर्म (क्रिया) को जान लेते हैं। अगला श्लोक इन्हीं शब्दों को आगे बढ़ाता है। व्याख्याकार इस पर भिन्न मत रखते हैं: कुछ कृष्ण को ही साकार परमेश्वर और ब्रह्म मानते हैं, तो कुछ उन्हें निराकार ब्रह्म का संकेत करने वाला मानते हैं।"
    },
    {
      "id": "7.30",
      "translation": "जो लोग मुझे अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के साथ जानते हैं, वे स्थिर चित्त वाले लोग मृत्यु के समय भी मुझे जानते हैं।",
      "explanation": "पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि उनका आश्रय लेने वाले ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म को जान लेते हैं। यहाँ वे तीन और शब्द जोड़ते हैं: अधिभूत (भौतिक प्राणियों का आधार), अधिदैव (देवताओं का आधार) और अधियज्ञ (यज्ञ का आधार); जो इनके साथ उन्हें जानते हैं, वे योग में स्थिर चित्त रहकर मृत्यु के समय भी उन्हें जानते हैं। इन्हीं शब्दों के बारे में अर्जुन आठवें अध्याय के आरंभ में प्रश्न पूछते हैं। इन तीन शब्दों के सटीक अर्थ पर परंपराओं में भेद है, पर सभी मानते हैं कि ऐसा ज्ञान अंतिम क्षण में भी टिका रहता है।"
    }
  ]
}
