अपने ही मुँह से अपनी बड़ाई करने वाले, अकड़ में रहने वाले, धन और मान के मद में चूर वे लोग दिखावे के साथ, शास्त्रविधि का पालन किए बिना, केवल नाम के यज्ञ करते हैं।
व्याख्या
श्रीकृष्ण इस अध्याय में आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन जारी रखे हुए हैं। ऐसे लोग स्वयं को श्रेष्ठ मानते हैं और धन व प्रतिष्ठा के नशे में रहते हैं। उनके यज्ञ (हवन-पूजन जैसे अनुष्ठान) भी श्रद्धा से या उचित विधि से नहीं, बल्कि दिखावे (दम्भ) के लिए होते हैं, इसलिए वे केवल नाम के यज्ञ हैं।