निर्भयता, अंतःकरण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, इंद्रियों का संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता…
व्याख्या
कृष्ण यहाँ "दैवी संपदा" यानी मुक्ति की ओर झुके लोगों के भीतरी गुण गिनाना शुरू करते हैं, जिनके विपरीत वे आगे आसुरी प्रवृत्तियाँ बताएँगे। यह सूची अगले श्लोक में भी चलती है। यज्ञ का अर्थ पवित्र अर्पण या निःस्वार्थ कर्तव्य है, स्वाध्याय का अर्थ शास्त्र और स्वयं का अध्ययन, और तप का अर्थ अनुशासित साधना। "ज्ञानयोग" को टीकाकार अलग-अलग पढ़ते हैं: कोई इसे ज्ञान का मार्ग मानता है, तो कोई आत्मज्ञान में स्थिर निष्ठा।