उन द्वेष करने वाले, क्रूर, अशुभ कर्म करने वाले और मनुष्यों में अधम लोगों को मैं संसार के चक्रों में बार-बार आसुरी योनियों में ही गिराता रहता हूँ।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने बताया कि आसुरी स्वभाव के लोग अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का सहारा लेते हैं और अपने तथा दूसरों के शरीरों में बसे परमात्मा से द्वेष करते हैं। यहाँ वे बताते हैं कि ऐसे लोग जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) में बार-बार आसुरी योनियों में ही जन्म लेते हैं, यानी उसी क्रूर और द्वेषपूर्ण प्रवृत्ति वाले जीवन में। टीकाकार इसे अलग-अलग ढंग से समझते हैं: कुछ इसे ईश्वर का सीधा निर्णय मानते हैं, तो कुछ इसे उनके अपने कर्मों का फल मानते हैं, जो ईश्वर के नियम से मिलता है।