यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
yaḥ śāstravidhimutsṛjya vartate kāmakārataḥ |na sa siddhimavāpnoti na sukhaṃ na parāṃ gatim ||
जो मनुष्य शास्त्र की विधि को छोड़कर अपनी इच्छा के वश में होकर चलता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सुख, और न परम गति।
व्याख्या
कृष्ण दैवी और आसुरी स्वभाव की चर्चा समाप्त कर रहे हैं। काम, क्रोध और लोभ को विनाश के तीन द्वार बताने के बाद वे कहते हैं कि जो शास्त्र के मार्गदर्शन को छोड़कर मनमाने ढंग से (कामकार) चलता है, उसे न सिद्धि मिलती है, न सच्चा सुख और न परम लक्ष्य। 'शास्त्र' का अर्थ परंपराएँ अलग-अलग लेती हैं: कुछ वैदिक विधियों पर जोर देती हैं, कुछ व्यापक नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा पर।