तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥
tasmācchāstraṃ pramāṇaṃ te kāryākāryavyavasthitau |jñātvā śāstravidhānoktaṃ karma kartumihārhasi ||
इसलिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इसका निर्णय करने में शास्त्र ही तुम्हारे लिए प्रमाण है। शास्त्र के विधान में जो कहा गया है, उसे जानकर तुम्हें इस लोक में वही कर्म करना चाहिए।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि केवल इच्छा (काम) के अनुसार चलने वाले को न सिद्धि मिलती है, न सुख। उसी से निष्कर्ष निकालकर वे अर्जुन से कहते हैं कि उचित और अनुचित कर्म तय करने में शास्त्र को आधार बनाओ। 'शास्त्र' का अर्थ कुछ व्याख्याकार वैदिक विधियों और कर्तव्य-नियमों तक सीमित मानते हैं, जबकि अन्य इसे गीता की धर्म-शिक्षा या व्यापक नैतिक मार्गदर्शन के रूप में भी पढ़ते हैं।