चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥
cintāmaparimeyāṃ ca pralayāntāmupāśritāḥ |kāmopabhogaparamā etāvaditi niścitāḥ ||
मृत्यु के क्षण तक चलने वाली अनगिनत चिंताओं में डूबे हुए, वे कामनाओं की पूर्ति और भोग को ही सबसे बड़ा लक्ष्य मानते हैं और निश्चय कर लेते हैं कि "बस यही सब कुछ है।"
व्याख्या
पिछले श्लोक की तरह श्रीकृष्ण यहाँ आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन कर रहे हैं, जो कभी न भरने वाली कामना से चलते हैं। उनकी चिंता मृत्यु या प्रलय तक समाप्त नहीं होती, और वे भोग (कामोपभोग) को ही जीवन का परम लक्ष्य मान लेते हैं। उन्हें दृढ़ विश्वास होता है कि इससे ऊँचा कुछ नहीं है।