प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca janā na vidurāsurāḥ |na śaucaṃ nāpi cācāro na satyaṃ teṣu vidyate ||
आसुरी स्वभाव के लोग यह नहीं जानते कि किस काम में प्रवृत्त होना चाहिए और किससे दूर रहना चाहिए। उनमें न पवित्रता होती है, न सदाचार, और न सत्य ही पाया जाता है।
व्याख्या
कृष्ण ने पिछले श्लोक में आसुरी प्रकृति का वर्णन करने को कहा था, यहाँ से वे आरंभ करते हैं। ऐसे लोग नहीं जान पाते कि क्या करना उचित है (प्रवृत्ति) और किससे दूर रहना उचित है (निवृत्ति), और उनमें पवित्रता (शौच), सदाचार (आचार) और सत्य का अभाव होता है। परंपराएँ सामान्यतः मानती हैं कि यह किसी जन्मजात वर्ग का नहीं, बल्कि कामना से चलने वाली मनोवृत्ति का वर्णन है।