अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥
ahaṅkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ |māmātmaparadeheṣu pradviṣanto'bhyasūyakāḥ ||
अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, दूसरों में दोष देखने वाले ये लोग अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित मुझसे द्वेष करते हैं…
व्याख्या
कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन जारी रखते हैं। ऐसे लोग अहंकार, बल, दर्प, काम और क्रोध के सहारे जीते हैं और हर बात में दोष खोजते हैं। 'मुझसे द्वेष' को कुछ टीकाकार सब शरीरों में बसे अंतर्यामी ईश्वर के प्रति तिरस्कार समझते हैं, तो कुछ इसमें कृष्ण के उपदेश और शास्त्र की अवज्ञा पर बल देते हैं। यह वाक्य अगले श्लोक में पूरा होता है, जहाँ बताया गया है कि ऐसे लोगों का क्या होता है।