इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥
idamadya mayā labdhamimaṃ prāpsye manoratham |idamastīdamapi me bhaviṣyati punardhanam ||
“यह आज मैंने पा लिया है। अब मैं इस मनोरथ को भी पूरा कर लूँगा। यह मेरे पास है, और यह धन भी फिर मुझे मिल जाएगा…”
व्याख्या
कृष्ण यहाँ आसुरी स्वभाव वाले लोगों का वर्णन कर रहे हैं, जिनका मन लोभ में डूबा रहता है। इस श्लोक में उनके मन की बातें हैं: जो पाया उसकी गिनती और आगे जो पाना है उसकी योजना। अगले श्लोक में यही अहंकार शत्रुओं और सत्ता की बात तक पहुँच जाता है।