श्रीकृष्ण
दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता । मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥
daivī sampadvimokṣāya nibandhāyāsurī matā | mā śucaḥ sampadaṃ daivīmabhijāto'si pāṇḍava ||
दैवी संपदा को मोक्ष की ओर ले जाने वाली और आसुरी संपदा को बंधन में डालने वाली माना गया है। हे पाण्डव, शोक मत करो—तुम दैवी संपदा को लेकर जन्मे हो।
व्याख्या पिछले श्लोक में कृष्ण ने दम्भ, अभिमान और क्रोध जैसे आसुरी गुण गिनाए थे। यहाँ वे बताते हैं कि दैवी गुण मोक्ष की ओर ले जाते हैं और आसुरी गुण बंधन की ओर। वे अर्जुन को आश्वस्त करते हैं कि वह शोक न करे, क्योंकि वह दैवी संपदा के साथ जन्मा है।
पिछला श्लोक 16.4 अध्याय 16 · दैवी और आसुरी स्वभाव अगला श्लोक 16.6
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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