नरक के ये तीन द्वार हैं, जो आत्मा का नाश करने वाले हैं: काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।
व्याख्या
कृष्ण अभी-अभी आसुरी प्रवृत्ति वाले लोगों का वर्णन कर चुके हैं, जो बार-बार नीची योनियों में गिरते हैं। यहाँ वे उस पतन के तीन मूल कारण बताते हैं: काम (तीव्र इच्छा), क्रोध और लोभ। नरक को कुछ परंपराएँ मृत्यु के बाद का स्थान मानती हैं और कुछ इसी जीवन में दुख और अधोगति की अवस्था। इसी तरह "आत्मा का नाश" को कुछ लोग मनुष्य के आध्यात्मिक पतन के रूप में समझते हैं, तो कुछ उसके सच्चे कल्याण की हानि के रूप में, क्योंकि आत्मा स्वयं अविनाशी है।