दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥
dambho darpo'bhimānaśca krodhaḥ pāruṣyameva ca |ajñānaṃ cābhijātasya pārtha sampadamāsurīm ||
पाखंड, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी—हे पार्थ, ये उसके लक्षण हैं जो आसुरी संपदा को लेकर जन्मा है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में दैवी गुण गिनाने के बाद कृष्ण यहाँ उसके विपरीत आसुरी संपदा के लक्षण बताते हैं: दम्भ (पाखंड), दर्प (घमंड), अभिमान, क्रोध, पारुष्य (कठोरता) और अज्ञान, यानी क्या सही है और क्या सच है, इसकी सही समझ का अभाव। यह श्लोक प्रवृत्तियों का वर्णन है; अगला श्लोक बताता है कि दोनों संपदाएँ किस ओर ले जाती हैं।