असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥
asatyamapratiṣṭhaṃ te jagadāhuranīśvaram |aparasparasambhūtaṃ kimanyatkāmahaitukam ||
वे कहते हैं कि यह जगत असत्य है, बिना किसी आधार का है और इसका कोई ईश्वर नहीं है; यह केवल आपसी संयोग से उत्पन्न हुआ है, और कामना के सिवा इसका कोई कारण नहीं।
व्याख्या
पिछले श्लोक से आगे, कृष्ण आसुरी स्वभाव वाले लोगों की सोच बता रहे हैं। उनके अनुसार जगत में कोई सत्य, नैतिक आधार या ईश्वर नहीं है, और सब कुछ केवल काम, यानी भोग की इच्छा, से चलता है। "अपरस्परसम्भूतम्" का अर्थ शंकराचार्य आदि स्त्री-पुरुष के आपसी संयोग से जन्म मानते हैं, जबकि कुछ व्याख्याकार इसे "बिना किसी क्रमबद्ध कारण-परंपरा के, संयोग से उत्पन्न" समझते हैं।