हे कुन्तीपुत्र! जो मनुष्य अंधकार के इन तीनों द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण के मार्ग पर चलता है और उसी से परम गति को प्राप्त होता है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने काम, क्रोध और लोभ को नरक के तीन द्वार बताकर इन्हें छोड़ने को कहा। यहाँ वे कहते हैं कि इन तीन तमस् (अंधकार) के द्वारों से मुक्त मनुष्य अपने सच्चे कल्याण (श्रेयस्) के अनुसार चलता है और परम गति पाता है। यह परम गति मोक्ष है या ईश्वर से मिलन, इस पर परंपराओं में भिन्न मत हैं, पर सब इसे सर्वोच्च लक्ष्य मानती हैं।