द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन् दैव आसुर एव च ।दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु ॥
dvau bhūtasargau loke'smin daiva āsura eva ca |daivo vistaraśaḥ prokta āsuraṃ pārtha me śrṛṇu ||
इस लोक में प्राणियों की सृष्टि दो प्रकार की है: दैवी और आसुरी। दैवी का विस्तार से वर्णन हो चुका है। अब हे पार्थ, आसुरी के बारे में मुझसे सुनो।
व्याख्या
कृष्ण अभी अर्जुन को आश्वस्त कर चुके हैं कि वह दैवी गुणों के साथ जन्मा है। यहाँ वे भेद बताते हैं: मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ मोटे तौर पर दो प्रकार की हैं, दैवी और आसुरी, यानी एक सद्गुणों की ओर झुकी और दूसरी उनसे दूर। दैवी गुण पहले बताए जा चुके हैं, इसलिए अब वे आसुरी स्वभाव का वर्णन करने वाले हैं। परंपराएँ आमतौर पर इन्हें स्वभाव की दो प्रवृत्तियाँ मानती हैं, लोगों की दो स्थायी जातियाँ नहीं।