ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः ।तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥
ye śāstravidhimutsṛjya yajante śraddhayā'nvitāḥ |teṣāṃ niṣṭhā tu kā kṛṣṇa sattvamāho rajastamaḥ ||
हे कृष्ण, जो लोग शास्त्र की विधि को छोड़कर श्रद्धा के साथ यज्ञ-पूजा करते हैं, उनकी निष्ठा किस प्रकार की होती है? सत्त्व की, रजस की या तमस की?
व्याख्या
यहाँ अर्जुन कृष्ण से प्रश्न कर रहे हैं। पिछले अध्याय में कृष्ण ने कहा था कि जो शास्त्र की विधि छोड़कर इच्छा के अनुसार चलता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती; इस पर अर्जुन पूछते हैं कि जिनमें श्रद्धा तो है, पर वे शास्त्र-विधि नहीं मानते, उनकी स्थिति क्या है। सत्त्व, रजस और तमस प्रकृति के तीन गुण हैं, यानी स्वभाव के तीन घटक: सत्त्व शुद्धता और प्रकाश का, रजस आवेग और क्रियाशीलता का, तमस जड़ता और अज्ञान का। टीकाकार इस पर भिन्न मत रखते हैं कि “शास्त्रविधि छोड़ने” का अर्थ जानबूझकर उपेक्षा करना है या केवल शास्त्र का ज्ञान न होना।