अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥
aśāstravihitaṃ ghoraṃ tapyante ye tapo janāḥ |dambhāhaṅkārasaṃyuktāḥ kāmarāgabalānvitāḥ ||
जो लोग शास्त्रों में न बताई गई कठोर तपस्या करते हैं, जो दंभ और अहंकार से भरे हैं, और कामना तथा आसक्ति के बल से प्रेरित हैं…
व्याख्या
कृष्ण यहाँ बता रहे हैं कि प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार लोगों की श्रद्धा कैसे अलग-अलग होती है। इस श्लोक में वे उन लोगों की बात करते हैं जो शास्त्र-विरुद्ध कठोर तप (तपस्या) करते हैं, और जिनके पीछे दिखावा (दम्भ), अहंकार, कामना और आसक्ति (राग) होती है। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ बताया गया है कि ऐसे लोग वास्तव में क्या कर रहे हैं।