जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए, और दिखावे के साथ किया जाता है, उसे यहाँ राजसिक कहा गया है। वह डगमगाने वाला और अस्थिर होता है।
व्याख्या
सत्रहवें अध्याय में कृष्ण श्रद्धा और कर्मों को तीन गुणों के अनुसार बाँट रहे हैं। पिछले श्लोक में सात्त्विक तप बताया गया था, और यहाँ वे राजसिक तप बताते हैं, जो रजोगुण यानी महत्त्वाकांक्षा और चाह से प्रेरित होता है। ऐसा तप दूसरों से आदर और प्रशंसा पाने के लिए दिखावे से किया जाता है, इसलिए उसका फल अनिश्चित और टिकने वाला नहीं माना गया है।