सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
sattvānurūpā sarvasya śraddhā bhavati bhārata |śraddhāmayo'yaṃ puruṣo yo yacchraddhaḥ sa eva saḥ ||
हे भारत! हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतःकरण के स्वरूप के अनुसार होती है। मनुष्य श्रद्धा से ही बना है; जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।
व्याख्या
अर्जुन ने इस अध्याय के आरंभ में पूछा था कि शास्त्र-विधि छोड़कर श्रद्धा से पूजा करने वालों की निष्ठा कैसी होती है। उसी के उत्तर में कृष्ण बताते हैं कि श्रद्धा, यानी भीतर का विश्वास और झुकाव, हर व्यक्ति के अंतःकरण और स्वभाव के अनुसार ढलती है। इसलिए जैसी किसी की श्रद्धा है, वैसा ही उसका स्वरूप माना जाता है। यहाँ 'सत्त्व' को अधिकतर भाष्यकार मन या अंतःकरण के अर्थ में लेते हैं, जबकि कुछ इसे गुणों के संदर्भ में समझते हैं।