परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल की इच्छा रखकर, या केवल दिखावे के लिए किया जाता है, उस यज्ञ को तुम राजसिक जानो।
व्याख्या
कृष्ण यज्ञ (पूजा या कर्तव्य के रूप में किया गया अनुष्ठान) के तीन प्रकार प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार बता रहे हैं। पिछले श्लोक में उन्होंने बिना फल की इच्छा के, कर्तव्य समझकर किया गया सात्त्विक यज्ञ बताया था। अब वे कहते हैं कि फल की कामना से या दिखावे (दम्भ) के लिए किया गया यज्ञ राजसिक है, यानी रजोगुण के वश, इच्छा और आवेग से प्रेरित। यहाँ वे अर्जुन को 'भरतश्रेष्ठ' कहकर पुकारते हैं।