देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥
devadvijaguruprājñapūjanaṃ śaucamārjavam |brahmacaryamahiṃsā ca śārīraṃ tapa ucyate ||
देवताओं, द्विजों, गुरुजनों और ज्ञानियों का पूजन-सम्मान, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा — इसे शरीर का तप कहा जाता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ तप (तपस्) के तीन प्रकार बता रहे हैं, और इस श्लोक में शरीर के तप का वर्णन है। इसमें देवता, द्विज, गुरु और ज्ञानी जनों का सम्मान, शुचिता (शौच), सरलता (आर्जव), ब्रह्मचर्य और अहिंसा शामिल हैं। 'द्विज' को कुछ परंपराएँ विशेष वर्ण के लोग मानती हैं और कुछ इसे विद्वान या आध्यात्मिक व्यक्ति के अर्थ में लेती हैं; इसी तरह ब्रह्मचर्य का अर्थ पूर्ण संयम या जीवन-अवस्था के अनुसार संयम, दोनों रूपों में लिया जाता है।