दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥
dātavyamiti yaddānaṃ dīyate'nupakāriṇe |deśe kāle ca pātre ca taddānaṃ sāttvikaṃ smṛtam ||
"देना ही चाहिए" ऐसा सोचकर, ऐसे व्यक्ति को जो बदले में कुछ न कर सके, उचित स्थान और समय पर तथा योग्य पात्र को जो दान दिया जाता है, वह दान सात्त्विक माना गया है।
व्याख्या
पिछले श्लोक में तामसिक तप बताने के बाद कृष्ण यहाँ तीन गुणों के अनुसार दान के प्रकार बता रहे हैं, और पहले सात्त्विक (शुद्ध, संतुलित) दान को समझाते हैं। यह दान कर्तव्य-भाव से, बदले की आशा के बिना, और उचित देश, काल तथा योग्य पात्र का ध्यान रखकर दिया जाता है। "योग्य पात्र" कौन है, इस पर टीकाकारों में भेद है, जैसे विद्वान व्यक्ति या सचमुच ज़रूरतमंद, पर सभी इस पर सहमत हैं कि दान स्वार्थ से मुक्त होना चाहिए।