yajñe tapasi dāne ca sthitiḥ saditi cocyate |karma caiva tadarthīyaṃ sadityevābhidhīyate ||
यज्ञ, तप और दान में दृढ़ स्थिति भी "सत्" कही जाती है, और इन्हीं के निमित्त किया गया कर्म भी निश्चय ही "सत्" कहलाता है।
व्याख्या
श्रीकृष्ण "ॐ तत् सत्" इस त्रिविध ब्रह्म-नाम की व्याख्या जारी रखे हुए हैं। यहाँ वे "सत्" (यानी यथार्थ, शुभ) शब्द को यज्ञ, तप और दान में स्थिर निष्ठा पर, तथा इनके लिए किए गए हर कर्म पर लागू करते हैं। "तदर्थीय" का अर्थ टीकाकार कहीं इन तीनों साधनों के लिए किया गया कर्म और कहीं परमात्मा के लिए किया गया कर्म लेते हैं; श्लोक दोनों अर्थों की गुंजाइश रखता है।