anudvegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat |svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate ||
ऐसी वाणी जो किसी को कष्ट न दे, जो सत्य, प्रिय और हितकारी हो, और शास्त्रों के स्वाध्याय का नियमित अभ्यास — इसे वाणी का तप कहा जाता है।
व्याख्या
कृष्ण तीन गुणों के संदर्भ में तप (आत्म-अनुशासन) के तीन रूप बता रहे हैं। शरीर के तप के बाद वे वाणी के तप की बात करते हैं: बोल ऐसे हों जो किसी में उद्वेग पैदा न करें, सत्य, प्रिय और हितकारी हों, और साथ में शास्त्रों का नियमित स्वाध्याय हो। यहाँ केवल सत्य नहीं, बल्कि सत्य के साथ मधुरता और हित, तीनों का होना आवश्यक माना गया है।