परन्तु जो दान बदले में उपकार पाने की आशा से, या किसी फल को लक्ष्य करके, या फिर अनिच्छा और कष्ट के साथ दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार दान के तीन भेद बता रहे हैं। पिछले श्लोक में सात्त्विक दान था, जो केवल कर्तव्य समझकर दिया जाता है। यहाँ राजस दान है, जो बदले में उपकार, फल या प्रतिष्ठा पाने की इच्छा से, या मन मारकर दिया जाता है। 'परिक्लिष्टम्' का अर्थ 'अनिच्छा से' और 'पछतावे या कष्ट के साथ' दोनों तरह से लिया जाता है।