अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥
aśraddhayā hutaṃ dattaṃ tapastaptaṃ kṛtaṃ ca yat |asadityucyate pārtha na ca tatpretya no iha ||
हे पार्थ! श्रद्धा के बिना जो कुछ हवन किया जाए, दान दिया जाए, तप किया जाए, या और कोई कर्म किया जाए, वह 'असत्' कहलाता है। वह न मरने के बाद काम आता है, न इस लोक में।
व्याख्या
अध्याय 17 के अंत में कृष्ण तीन गुणों के अनुसार धार्मिक आचरण को परखते हैं। पिछले श्लोकों में 'सत्' का अर्थ शुभ और सत्य बताया गया था; यहाँ उसका उलटा 'असत्' (व्यर्थ या अयथार्थ) बताते हैं। श्रद्धा के बिना किए गए यज्ञ, दान और तप का फल न इस लोक में मिलता है, न परलोक में।