…वे नासमझ लोग शरीर में स्थित तत्वों के समूह को कष्ट देते हैं, और शरीर के भीतर रहने वाले मुझको भी; उन्हें तुम आसुरी निश्चय वाले जानो।
व्याख्या
कृष्ण पिछले श्लोक में बताए उन लोगों की बात आगे बढ़ाते हैं जो घमंड और कामना से प्रेरित होकर शास्त्र-विरुद्ध कठोर तप करते हैं। ऐसे लोग शरीर के तत्वों के समूह (भूतग्राम) को कष्ट देते हैं और शरीर के भीतर रहने वाले कृष्ण को भी; कृष्ण कहते हैं कि इन्हें आसुरी निश्चय वाला समझो। यहाँ "मुझको" का अर्थ कुछ टीकाकार सब प्राणियों में स्थित अंतर्यामी परमात्मा लेते हैं, तो कुछ इसे भीतर के साक्षी के रूप में कृष्ण की उपस्थिति मानते हैं।