संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥
saṃnyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum |tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdana ||
हे महाबाहु, हे हृषीकेश, हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास का तत्त्व और त्याग का तत्त्व, दोनों को अलग-अलग जानना चाहता हूँ।
व्याख्या
गीता के अंतिम अध्याय में अर्जुन कृष्ण से प्रश्न करते हैं। पिछले अध्यायों में कर्म छोड़ने और कर्म करते हुए अनासक्त रहने, दोनों की बात आई थी, इसलिए वे संन्यास (कर्मों का परित्याग) और त्याग (फल या आसक्ति का छोड़ना) का सही अर्थ और उनका भेद जानना चाहते हैं। "महाबाहु" (बलवान भुजाओं वाले), "हृषीकेश" (इंद्रियों के स्वामी) और "केशिनिषूदन" (केशी दैत्य का वध करने वाले) कृष्ण के संबोधन हैं। परंपराएँ इन दोनों शब्दों को कहीं अलग-अलग और कहीं लगभग एक ही अर्थ में पढ़ती हैं, और अगला श्लोक इनके भेद का उत्तर देना शुरू करता है।