श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः ।सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥
śraddhāvānanasūyaśca śrṛṇuyādapi yo naraḥ |so'pi muktaḥ śubhām̐llokānprāpnuyātpuṇyakarmaṇām ||
जो मनुष्य श्रद्धा के साथ और बिना दोष निकाले इसे केवल सुन भी ले, वह भी मुक्त होकर पुण्य कर्म करने वालों के शुभ लोकों को प्राप्त करता है।
व्याख्या
गीता का उपदेश समाप्त करते हुए कृष्ण अर्जुन से इसे सुनने के फल की बात कहते हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा से और बिना दोष-दृष्टि (असूया) के केवल सुनता है, वह भी बंधन से मुक्त होकर पुण्यात्माओं को मिलने वाले शुभ लोकों को पाता है। टीकाकार 'मुक्त' का अर्थ अलग-अलग लेते हैं: कुछ पापों और कर्मबंधन से छूटना, तो कुछ अंतिम मोक्ष।