संजय
व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् । योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥
vyāsaprasādācchrutavānetadguhyamahaṃ param | yogaṃ yogeśvarātkṛṣṇātsākṣātkathayataḥ svayam ||
व्यास की कृपा से मैंने यह परम गोपनीय योग स्वयं योगेश्वर कृष्ण के मुख से प्रत्यक्ष सुना, जब वे इसे कह रहे थे।
व्याख्या संजय अंधे राजा धृतराष्ट्र को युद्ध का वृत्तांत सुना रहे हैं और यहाँ बताते हैं कि उन्होंने यह संवाद कैसे सुना: ऋषि व्यास की कृपा से उन्हें यह सामर्थ्य मिली। वे इस उपदेश को परम गुह्य (गोपनीय) योग कहते हैं, यानी परमात्मा से जुड़ने की साधना, और कहते हैं कि इसे उन्होंने योगेश्वर कृष्ण से सीधे सुना।
पिछला श्लोक 18.74 अध्याय 18 · संन्यास से मोक्ष अगला श्लोक 18.76
भगवद्गीता के बारे में
भगवद्गीता, संस्कृत में श्रीमद्भगवद्गीता (Śrīmad Bhagavad Gītā ), अर्थात् “भगवान का गीत”, महाभारत के भीष्म पर्व का एक संवाद है, जिसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में, युद्ध आरंभ होने से ठीक पहले, अपने ही स्वजनों से लड़ने के विचार से अर्जुन का मन टूट जाता है, और उसके सारथी श्रीकृष्ण उसे उत्तर देते हैं: कर्तव्य पर, फल की आसक्ति के बिना कर्म करने पर, ज्ञान, ध्यान और भक्ति पर। संजय यह संवाद नेत्रहीन राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसे भगवद् गीता, भगवत गीता, श्रीमद् भगवद् गीता या श्रीमद्भगवद्गीता भी लिखा जाता है, और प्रायः केवल गीता कहा जाता है।
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