हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और मुझे अपनी स्मृति वापस मिल गई है। मेरे सारे संदेह दूर हो गए हैं और मैं स्थिर खड़ा हूँ। अब मैं आपके वचन के अनुसार कार्य करूँगा।
व्याख्या
पिछले श्लोक में कृष्ण ने पूछा था कि क्या अर्जुन का अज्ञान-जनित मोह मिट गया; यह उसी का उत्तर है। अर्जुन कहता है कि उसका मोह दूर हो गया है और उसे अपने स्वरूप तथा अपने धर्म (कर्तव्य) की स्मृति लौट आई है। अब उसे कोई संदेह नहीं है और वह कृष्ण के उपदेश के अनुसार कार्य करने को तैयार है। टीकाकार इस 'स्मृति' का अर्थ अलग-अलग लेते हैं, जैसे आत्मज्ञान या अपने कर्तव्य का बोध, पर सब मानते हैं कि अर्जुन अब कर्म के लिए तैयार है।