न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥
na dveṣṭyakuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate |tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ ||
सत्त्वगुण से भरा हुआ, बुद्धिमान और संशय से मुक्त त्यागी न अप्रिय कर्म से द्वेष करता है, न प्रिय कर्म में आसक्त होता है।
व्याख्या
कृष्ण सात्त्विक त्यागी का वर्णन आगे बढ़ाते हैं, जिसमें सत्त्व (प्रकृति के तीन गुणों में स्पष्टता और संतुलन का गुण) प्रधान है। ऐसा व्यक्ति कठिन या अप्रिय कर्तव्य से द्वेष नहीं करता और सुखद कर्म में आसक्ति (सङ्ग) नहीं रखता। यहाँ 'कुशल-अकुशल' को सरल रूप में प्रिय-अप्रिय समझा गया है; कुछ टीकाकार इन्हें शुभ-अशुभ, या मोक्ष देने वाला और बंधन देने वाला कर्म भी मानते हैं।