इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
iti te jñānamākhyātaṃ guhyādguhyataraṃ mayā |vimṛśyaitadaśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru ||
इस प्रकार मैंने तुम्हें वह ज्ञान बता दिया, जो गुप्त से भी अधिक गुप्त है। इस पर पूरी तरह विचार करो, और फिर जैसा चाहो वैसा करो।
व्याख्या
कृष्ण अर्जुन को अपना उपदेश समाप्त करते हुए कहते हैं कि उन्होंने सबसे गोपनीय ज्ञान बता दिया है। वे अर्जुन पर कुछ थोपते नहीं, बल्कि उसे पूरा सोच-विचार करके स्वयं निर्णय लेने की स्वतंत्रता देते हैं। कुछ व्याख्याकार "यथेच्छसि तथा कुरु" को अर्जुन की विवेकपूर्ण स्वतंत्रता मानते हैं, तो कुछ इसे ऐसा आग्रह मानते हैं जिसका अंतिम लक्ष्य शरणागति है।