हे कुन्तीपुत्र! सिद्धि पा चुका मनुष्य ब्रह्म को, जो ज्ञान की परम निष्ठा है, कैसे प्राप्त करता है — यह मुझसे संक्षेप में ही समझ लो।
व्याख्या
कृष्ण अब अर्जुन को संक्षेप में बताने लगते हैं कि निष्काम कर्म में सिद्धि पाने वाला मनुष्य ब्रह्म, यानी परम सत्य, को कैसे पाता है। इसी को ज्ञान की परम निष्ठा (ज्ञानस्य निष्ठा परा) कहा गया है, अर्थात आत्मज्ञान में अंतिम स्थिरता। यह श्लोक आगे के वर्णन की भूमिका है; परंपराओं में मतभेद है कि यह निष्ठा केवल ज्ञान है या ज्ञान और भक्ति का मेल, और श्लोक इसे खुला छोड़ता है।