एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥
etānyapi tu karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā phalāni ca |kartavyānīti me pārtha niścitaṃ matamuttamam ||
हे पार्थ, इन कर्मों को भी आसक्ति और फलों की चाह छोड़कर करना चाहिए। यही मेरा निश्चित और सर्वोत्तम मत है।
व्याख्या
कृष्ण ने अभी कहा कि यज्ञ, दान और तप बुद्धिमानों को पवित्र करते हैं और इन्हें छोड़ना नहीं चाहिए। यहाँ वे बताते हैं कि इन्हें कैसे करना है: आसक्ति (सङ्ग) और फल की इच्छा छोड़कर। यही निष्काम कर्म की उनकी मूल शिक्षा है, जिसे वे अपना निश्चित और सर्वोत्तम मत कहते हैं।