राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥
rājansaṃsmṛtya saṃsmṛtya saṃvādamimamadbhutam |keśavārjunayoḥ puṇyaṃ hṛṣyāmi ca muhurmuhuḥ ||
हे राजन्, केशव और अर्जुन के इस अद्भुत और पवित्र संवाद को बार-बार याद करके मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।
व्याख्या
संजय धृतराष्ट्र को संबोधित कर रहे हैं, जिन्हें वे युद्ध का वृत्तांत सुना रहे हैं। वे कहते हैं कि कृष्ण (केशव) और अर्जुन के संवाद को याद करने भर से उन्हें बार-बार आनंद होता है, और इसे पुण्य (पवित्र करने वाला) कहते हैं। इसमें इसे प्रत्यक्ष सुन पाने के दुर्लभ अवसर के प्रति उनकी कृतज्ञता भी झलकती है।