सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ ।अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥
sukhaṃ tvidānīṃ trividhaṃ śrṛṇu me bharatarṣabha |abhyāsādramate yatra duḥkhāntaṃ ca nigacchati ||
हे भरतश्रेष्ठ, अब मुझसे तीन प्रकार के सुख के बारे में सुनो: वह सुख, जिसमें मनुष्य निरंतर अभ्यास से रम जाता है और जिससे वह दुःख के अंत तक पहुँच जाता है…
व्याख्या
कृष्ण ने अभी प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार धृति (संकल्प-शक्ति) के तीन भेद बताए हैं। अब वे सुख के भी तीन भेद बताने लगते हैं। शुरुआत उस सुख से होती है जो निरंतर अभ्यास से बढ़ता है और दुःख का अंत करता है। वाक्य अगले श्लोक में जारी रहता है, जहाँ इसे सात्त्विक सुख कहा गया है।