जो कर्म नियत (विहित) हो, आसक्ति से रहित हो, और राग-द्वेष के बिना, फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।
व्याख्या
कृष्ण यहाँ प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार कर्म के तीन प्रकार बता रहे हैं। इस श्लोक में सात्त्विक (शुद्ध, संतुलित) कर्म की परिभाषा है: ऐसा कर्तव्य जो आसक्ति (सङ्ग) के बिना, राग-द्वेष से प्रेरित हुए बिना और फल की लालसा के बिना किया जाए। ‘नियत’ का अर्थ शास्त्र-विहित कर्म भी हो सकता है और अपने स्थान के अनुसार नियत कर्तव्य भी; टीकाकार इनमें से किसी एक पर बल देते हैं, पर दोनों अर्थ यहाँ बैठते हैं।