इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥
ityahaṃ vāsudevasya pārthasya ca mahātmanaḥ |saṃvādamimamaśrauṣamadbhutaṃ romaharṣaṇam ||
इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा पार्थ का यह संवाद सुना, जो अद्भुत है और जिसे सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
व्याख्या
संजय, जो अंधे राजा धृतराष्ट्र को युद्ध का वृत्तांत सुना रहे हैं, यहाँ अपना समापन-कथन आरंभ करते हैं। वासुदेव श्रीकृष्ण हैं और पार्थ (पृथा यानी कुन्ती के पुत्र) अर्जुन हैं। संजय कहते हैं कि यह संवाद इतना अद्भुत था कि सुनकर उनके रोंगटे खड़े हो गए (रोमहर्षण), जो गहरे विस्मय का पारंपरिक चिह्न है।