त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥
tyājyaṃ doṣavadityeke karma prāhurmanīṣiṇaḥ |yajñadānatapaḥkarma na tyājyamiti cāpare ||
कुछ मनीषी कहते हैं कि कर्म दोष-युक्त है, इसलिए उसे त्याग देना चाहिए; और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप के कर्म नहीं त्यागने चाहिए।
व्याख्या
अर्जुन ने संन्यास (कर्म-त्याग) और त्याग (फल की आसक्ति छोड़ना) का अंतर पूछा था। उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण पहले विद्वानों के दो परस्पर विरोधी मत रखते हैं। एक मत के अनुसार हर कर्म में बंधन का दोष है, इसलिए उसे छोड़ देना चाहिए; दूसरे के अनुसार यज्ञ, दान और तप जैसे शुद्ध करने वाले कर्म कभी नहीं छोड़ने चाहिए। परंपरागत टीकाकार इन दोनों मतों को अलग-अलग दार्शनिक धाराओं से जोड़ते हैं, पर इस पर उनमें एकमत नहीं है।