यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥
yadahaṅkāramāśritya na yotsya iti manyase |mithyaiṣa vyavasāyaste prakṛtistvāṃ niyokṣyati ||
अहंकार का सहारा लेकर तुम जो मान रहे हो कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा", तुम्हारा यह निश्चय मिथ्या है। तुम्हारी प्रकृति तुम्हें इसमें लगा ही देगी।
व्याख्या
पिछले श्लोक की चेतावनी को आगे बढ़ाते हुए कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि युद्ध न करने का उसका संकल्प अहंकार से उपजा है और इसलिए टिकेगा नहीं। अहंकार वह भाव है जिसमें व्यक्ति स्वयं को हर काम का स्वतंत्र कर्ता मान लेता है। अर्जुन की प्रकृति उसे वैसे भी कर्म में लगा देगी; यहाँ प्रकृति को कुछ परंपराएँ उसका जन्मजात क्षत्रिय स्वभाव मानती हैं, तो कुछ भौतिक प्रकृति के वे गुण जो सब कर्म कराते हैं।